Monday, April 13, 2026

जो जीते हैं, वही-न-ख़ुद का दफ्तर है मुश्किल में कहीं का दफ्तर है-जौन एलिया

 पढ़ रहा हूँ मैं कागज़ों-बसूदा

और नहीं और है का दफ्तर है

कोई सोचे तो सोचे कैसे जीएँ
सारा दफ्तर ग़मों का दफ्तर है

हमसे कोई तो करे इशारा
कि ज़मीं, आसमाँ का दफ्तर है

हुए तालों-जैसे-जैसे जीएँ
वक्त, जिस्म और जाँ का दफ्तर है

जो जो दफ्तर है आसमानी तरह
वो मियाँ जी यहाँ का दफ्तर है

जो हक़ीक़त है, हम उसे क्यों ढूँढ़ें
वो तो इन बातों का दफ्तर है

जो रहा है ज़िंदगी भर का हिसाब
वो अदाओं का दफ्तर है

Thursday, April 9, 2026

अहमद फ़राज़

 एक दिन ऐसा हुआ,

वफ़ा पर बहस छिड़ गई।

मैंने इश्क़ को अमर कहा,
वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई।

मैं इश्क़ का क़ैदी था,
वो इश्क़ को एक क़ैदखाना कहती रही।

कि उम्र भर का साथ भी,
उसे चाहत से बदतर लगा।

पेड़ पत्थर नहीं होते…

Monday, March 30, 2026

जौन एलिया

 

जौन एलिया

एक एहसास हैं—जहाँ इंसान अपने ही विचारों में उलझा रहता है, रिश्तों की सच्चाई को समझने की कोशिश करता है, और भीतर से खुद को खोजता रहता है।

1.
मैं भी बहुत अजीब हूँ, इतना अजीब हूँ कि बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।

 

2.
इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ,
वर्ना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने।

 

3.
बहुत नज़दीक आती जा रही हो,
बिछड़ने का इरादा कर लिया है क्या?”

 

4.
शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई,
लेकिन यक़ीन सबको दिलाता रहा हूँ मैं।

 

5.
कौन इस घर की देखभाल करे,
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है।

 

6.
अब नहीं कोई बात ख़तरे की,
अब सभी को सभी से ख़तरा है।

 

7.
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो,
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो।

 

8.
हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ,
हैं कई हिज्र दरमियाँ जानाँ।

 

थोड़ा रुक जाओ- जौन एलिया

 थोड़ा रुक जाओ, अपने दिल की बात सुनो।

जल्दी मत करो, अभी समय है समझने का।

जैसे कच्चे आम को धीरे-धीरे चखते हैं,
वैसे ही जीवन को आराम से महसूस करो।

डरो मत कि तुम डूब जाओगे,
बस खुद में झाँको और ठहर जाओ।

अब तक तुम बाहर की दुनिया में उलझे रहे,
थोड़ा अपने अंदर भी देखो।

अपने दिल को अपने ही नाम कर दो,
और खुद को समझने की कोशिश करो।

जो लोग तुम्हें परेशान करते हैं, उनसे छिपने की जरूरत नहीं,
बस थोड़ा रुककर खुद को संभालो।

Sunday, January 18, 2026

यह बगुलों का शहर है-जौन एलिया

 ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है

जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं।
यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग।

धरती धूल से भरी है,
आसमान धुँधला है।
सच्चा रूप कहीं दिखाई नहीं देता।
यह बगुलों का शहर है।

हम धूल जैसे हालातों में
अपनी सीमाएँ खोते जा रहे हैं।
यहाँ इंसान की पहचान भी धूल में मिल जाती है।
यह बगुलों का शहर है।

इस एक पल में ही सब आमने-सामने है,
फिर न मैं बचता हूँ, न तुम।
यहाँ किए गए वादे भी खोखले हैं।
यह बगुलों का शहर है।

जो अभी है और जो पहले था,
सब स्वार्थ में डूबा हुआ है।
यहाँ किसके लिए और क्या जीना है,
कुछ साफ़ नहीं।
यह बगुलों का शहर है।

अगर बस अपना ही स्वार्थ सही,
और वही लालसा सही,
तो रिश्ते भी बस दिखावे के रह जाते हैं।
यह बगुलों का शहर है।

यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।

यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।

जो जीते हैं, वही-न-ख़ुद का दफ्तर है मुश्किल में कहीं का दफ्तर है-जौन एलिया

 पढ़ रहा हूँ मैं कागज़ों-बसूदा और नहीं और है का दफ्तर है कोई सोचे तो सोचे कैसे जीएँ सारा दफ्तर ग़मों का दफ्तर है हमसे कोई तो करे इशारा ...