Tuesday, June 30, 2026

रूमी और शम्स: वह प्रेम जिसने एक विद्वान को कवि बना दिया

"कुछ प्रेम कहानियाँ दो लोगों के मिलन की नहीं होतीं। वे एक आत्मा के जागने की कहानी होती हैं। रूमी और शम्स की कहानी भी ऐसी ही है।"

कल्पना कीजिए — एक आदमी जिसके पास सब कुछ है। ज्ञान, सम्मान, हज़ारों शिष्य, एक पूरे शहर की श्रद्धा। और फिर एक दिन, फटे कपड़ों में एक अजनबी बाज़ार से गुज़रता है... और उस आदमी की पूरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल जाती है।

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। यह रूमी और शम्स-ए-तबरीज़ की सच्ची कहानी है — एक ऐसी कहानी जिसने आठ सौ साल बाद भी दुनिया भर के करोड़ों दिलों को छुआ है।

तेरहवीं शताब्दी का कोन्या: जहाँ से कहानी शुरू होती है

तेरहवीं शताब्दी का दौर था। आज के तुर्की के शहर कोन्या में एक महान इस्लामी विद्वान रहते थे — मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद रूमी। दूर-दूर से लोग उनके प्रवचन सुनने आते थे। वे धर्मशास्त्र के गहरे ज्ञाता थे, सम्मानित शिक्षक थे, और हज़ारों शिष्यों के गुरु थे।

उनके पास ज्ञान था। प्रतिष्ठा थी। सम्मान था।

लेकिन उनके भीतर कहीं एक ऐसी प्यास थी, जिसका उन्हें खुद भी पता नहीं था। उन्हें लगता था कि उन्होंने जीवन को समझ लिया है — पर जीवन अभी उन्हें प्रेम का असली अर्थ सिखाने वाला था।

पहला अध्याय: एक अजनबी का आगमन

एक ठंडी दोपहर थी। बाज़ार में लोगों की चहल-पहल थी। उसी भीड़ में, फटे कपड़ों वाला एक दरवेश शहर में दाख़िल हुआ। उसका चेहरा धूप से तपा हुआ था, आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।

वह था — शम्स-ए-तबरीज़

शम्स किसी किताब का आदमी नहीं था। वह अनुभव का आदमी था। उसने संसार देखा था — राजाओं के दरबार भी, और फ़कीरों की झोपड़ियाँ भी। उसे किसी पद, सम्मान या प्रसिद्धि से कोई लगाव नहीं था। वह बस एक ऐसे इंसान की तलाश में था, जिसके भीतर प्रेम की आग जलाने की क्षमता हो।

लोगों ने पूछा, "तुम किसे खोज रहे हो?"

शम्स ने जवाब दिया, "एक ऐसे दिल को, जो ईश्वर को जानता नहीं, बल्कि उससे प्रेम करता हो।"

वह पहली मुलाकात जिसने सब कुछ बदल दिया

जब शम्स की मुलाकात रूमी से हुई, तो कहा जाता है कि उसने एक सीधा सवाल पूछा — "मोहम्मद बड़े हैं या बायज़ीद बस्तामी?"

लोग यह सवाल सुनकर चौंक गए। रूमी ने जवाब दिया, "निस्संदेह, पैग़म्बर मुहम्मद।"

शम्स मुस्कुराए और बोले, "फिर ऐसा क्यों कि पैग़म्बर ने कहा — 'मैं तुझे वैसा नहीं जान पाया जैसा जानना चाहिए था।' और बायज़ीद ने कहा — 'मैं महान हूँ।'"

रूमी मौन हो गए।

शम्स ने समझाया, "जिसने ईश्वर को सचमुच जाना, वह स्वयं को छोटा समझने लगा। जिसने अपने अनुभव को ही अंतिम मान लिया, वह वहीं रुक गया।"

उस एक संवाद ने रूमी के भीतर वर्षों से बनी दीवारों में पहली दरार डाल दी।

दूसरा अध्याय: ज्ञान से प्रेम तक का सफ़र

उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया। रूमी ने अपने नियमित प्रवचन कम कर दिए। वे घंटों शम्स के साथ बैठते — कभी बात करते, कभी चुप रहते, कभी रोते, कभी हँसते।

शम्स ने उन्हें सिखाया — "ईश्वर को किताबों में मत खोजो। उसे अपने टूटे हुए दिल में खोजो।"

रूमी पहली बार समझ रहे थे कि प्रेम सिर्फ़ एक भावना नहीं, बल्कि आत्मा का संपूर्ण परिवर्तन है। उन्होंने लिखा — "जब तक तुम स्वयं को नहीं खोते, तब तक स्वयं को नहीं पाते।"

तीसरा अध्याय: दुनिया की नाराज़गी

लेकिन दुनिया प्रेम को कहाँ समझती है?

रूमी के शिष्य नाराज़ होने लगे। उन्हें लगा कि शम्स ने उनके गुरु को बदल दिया है। लोग फुसफुसाने लगे — "यह दरवेश जादूगर है," "इसने रूमी को हमसे दूर कर दिया।"

रूमी को इसकी कोई परवाह नहीं थी। वे कहते — "जिस प्रेम में लोग पागलपन न देखें, वह प्रेम अभी अधूरा है।"

चौथा अध्याय: बिछड़ने का दर्द

एक दिन शम्स अचानक चले गए। रूमी बेचैन हो उठे। उन्होंने हर शहर में उन्हें खोजा, दमिश्क तक गए, वर्षों तलाशते रहे।

कहते हैं, वे लौटे भी। लेकिन फिर एक दिन शम्स हमेशा के लिए ग़ायब हो गए। इतिहास आज तक यह नहीं बता पाया कि उनके साथ आख़िर क्या हुआ। कुछ कहते हैं उनकी हत्या हुई, कुछ कहते हैं वे स्वयं चले गए। सच शायद सिर्फ़ ईश्वर जानता है।

पाँचवाँ अध्याय: सबसे बड़ी खोज

शम्स के जाने के बाद रूमी टूट गए। दिनों तक रोते रहे। फिर एक रात उन्होंने महसूस किया — जिसे वे बाहर खोज रहे हैं, वह तो उनके भीतर ही जीवित है।

शम्स अब कोई व्यक्ति नहीं रहे थे। वे रूमी की चेतना बन चुके थे।

रूमी ने कहा — "मैंने अपने पहले प्रेमी को खोया नहीं। वह मेरी आत्मा बन गया।"

उस दिन के बाद उनकी कविताएँ जन्म लेने लगीं। उनके आँसू शब्द बन गए। उनकी तन्हाई संगीत बन गई।

छठा अध्याय: घूमता हुआ दरवेश

एक दिन रूमी बाज़ार से गुज़र रहे थे। किसी सुनार की दुकान से हथौड़े की लयबद्ध आवाज़ आ रही थी। उस लय में उन्हें लगा मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर का नाम जप रहा हो।

वे अचानक घूमने लगे — धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर और तेज़। एक हाथ आसमान की ओर, दूसरा धरती की ओर।

यहीं से सूफ़ियों का प्रसिद्ध घूमता हुआ नृत्य (समा) शुरू हुआ। उनके लिए यह नृत्य मनोरंजन नहीं, आत्मा की प्रार्थना था।

सातवाँ अध्याय: प्रेम का अंतिम अर्थ

रूमी ने कहा — प्रेम किसी को पा लेना नहीं है। प्रेम अपने भीतर के अहंकार को खो देना है। जिस दिन "मैं" समाप्त हो जाता है, उसी दिन प्रेम जन्म लेता है।

उन्होंने लिखा — "घाव वही स्थान है जहाँ से प्रकाश तुम्हारे भीतर प्रवेश करता है।"

और सचमुच — यदि रूमी शम्स से न मिले होते, तो शायद वे सिर्फ़ एक महान विद्वान बनकर रह जाते। लेकिन शम्स ने उन्हें कवि बना दिया, और उनकी कविताओं ने उन्हें अमर कर दिया।

रूमी की कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ (हिंदी भावानुवाद)

1. घाव घाव से मत डरो। वहीं से प्रकाश तुम्हारे भीतर प्रवेश करता है।

2. खोज मैं बुद्धिमान बनना चाहता था, इसलिए मैंने दुनिया बदलनी चाही। फिर प्रेम ने मुझे छुआ। अब मैं स्वयं को बदल रहा हूँ।

3. प्रेम प्रेम कोई भावना नहीं। प्रेम वह आग है, जिसमें 'मैं' जल जाता है और केवल 'तुम' बचते हो।

4. मौन मौन ही ईश्वर की भाषा है। बाकी सब केवल उसका कमजोर अनुवाद है।

5. आओ आओ... चाहे तुमने सौ बार अपने वचन तोड़े हों। चाहे तुम थके हुए हो, चाहे तुम निराश हो — यह प्रेम का द्वार है। यहाँ किसी से उसका अतीत नहीं पूछा जाता।

6. भीतर की यात्रा कल मैं चतुर था, इसलिए दुनिया बदलना चाहता था। आज मैं बुद्धिमान हूँ, इसलिए स्वयं को बदल रहा हूँ।

7. आत्मा तुम समुद्र की एक बूँद नहीं हो। तुम एक बूँद में समाया हुआ पूरा समुद्र हो।

उपसंहार: विवाह की रात

रूमी की मृत्यु 17 दिसंबर 1273 को हुई। उनके अनुयायी उस दिन को "शब-ए-अरूस" यानी "विवाह की रात" कहते हैं। उनका विश्वास था कि यह मृत्यु नहीं, बल्कि आत्मा का अपने प्रियतम — ईश्वर — से मिलन था।

आज, लगभग आठ सौ वर्षों बाद भी, रूमी की कविताएँ दुनिया की अनेक भाषाओं में पढ़ी जाती हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम केवल दो लोगों के बीच का संबंध नहीं होता — वह एक ऐसी अग्नि है जो मनुष्य के भीतर के अहंकार को भस्म कर देती है और उसे उसके वास्तविक स्वरूप से मिला देती है।

शायद इसीलिए रूमी की पूरी जीवन-यात्रा एक ही वाक्य में समा जाती है —

"जिसे तुम प्रेम समझते हो, वह केवल शुरुआत है; सच्चा प्रेम वह है जो तुम्हें बदल दे।"


अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो इसे उन लोगों के साथ ज़रूर साझा करें जो सच्चे प्रेम और आध्यात्मिक जागृति की कहानियाँ पसंद करते हैं।

साक्षात् के दर्शन — बाबा नीब करौरी महाराज


कैंची धाम, सिप्रा नदी के किनारे बसा बाबा का घर। जैसे ही नजर कैंची धाम पर पड़ी, ऐसा लगा जैसे बरसों बाद अपने दादा के घर लौट आई हूँ। आँखें भर आईं — किसी बिछड़े अपने से लंबे अरसे बाद मिलने जैसा एहसास था। मंदिर के सामने से गुजरी तो सुबह की आरती हो रही थी। मन में था कि जल्दी से नहा-धोकर बाबा के दर्शन कर लूँगी, पर ऐसा हो न सका। होटल चेक-इन में ही दो घंटे लग गए, क्योंकि मैं तय समय से चार घंटे पहले ही पहुँच गई थी।

दर्शन यात्रा शुरू हुई। गाइड ने कहा — पहले भूमियाधार हनुमान मंदिर चलते हैं, फिर हनुमान गढ़ी, उसके बाद ककड़ीघाट और अंत में कैंची धाम। मैं सहर्ष राजी हो गई। सुबह कैंची धाम को देखकर ही मानो बाबा के दर्शन हो चुके थे, मन वहीं अटका था।

हमारी सवारी कुमाऊँ की घाटियों से होकर गुजरी — कहीं भीड़ से टकराते, कहीं गाड़ियों के जाम से जूझते। सबसे पहले पहुँचे भूमियाधार हनुमान मंदिर, जो बाबा द्वारा स्थापित है और हाईवे किनारे बना है। ज़्यादा भीड़ नहीं थी, मंदिर खाली था। हनुमान जी को प्रणाम किया — वैसे उनसे मेरी बहुत नहीं बनती, पता नहीं क्यों।

फिर सवारी पहुँची हनुमान गढ़ी, जो बाबा द्वारा स्थापित दूसरा हनुमान मंदिर है। यहाँ कुछ भीड़ थी और बारिश भी डराने लगी थी। अंदर मंदिर में हनुमान जी के हृदय में राम-सीता विराजमान बहुत बड़ी मूर्ति है — मंदिर बेहद सुंदर। दर्शन किए, एक बार हनुमान चालीसा का पाठ किया, और मन में सोचा — "हनुमान जी, अब से हम दोस्त हैं, हमारी दोस्ती हो गई है, अब सब ठीक है।" थोड़ी देर ध्यान में बैठी ही थी कि तेज बारिश शुरू हो गई। बारिश की आवाज़ कानों को सुकून दे रही थी, मानो कोई कह रहा हो — "अभी मत जाओ... रुक जाओ।" मैं रुकी, बारिश रुकी, और फिर आगे का सफर शुरू हुआ।

अब बारी थी कैंची धाम की। जब पहुँचे तो देखा भीड़ कम है। दर्शन के लिए उतरी, लोगों से पूछा — क्या मंदिर में पूजा होती है? पता चला, कोई पूजा नहीं होती, प्रसाद भी सिर्फ बाबा को दूर से दिखाकर वापस ले जाना होता है। न कोई प्रसाद खरीदा, सीधे दर्शन के लिए पंक्ति में लग गई। सब पंक्ति में चलते जा रहे थे, पीछे से आवाज़ आ रही थी — "जल्दी चलो, जल्दी चलो" — जैसे मैं कोई भीड़ का हिस्सा भर हूँ। मंदिर प्रशासन बस यही चाहता था कि भीड़ जल्दी-जल्दी निकल जाए।

सबसे पहले माँ वैष्णो देवी के दर्शन हुए, वहाँ हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। आगे हनुमान जी का मंदिर, और फिर सामने बाबा की विशाल पालथी मारे हुए मूर्ति दिखी। एक पंडा और सुरक्षाकर्मी बोले जा रहे थे — "जल्दी करो, जल्दी करो" — वहाँ एक पल रुककर बाबा से बात भी नहीं कर सकते, न मंदिर में बैठकर पाठ कर सकते।

आगे बढ़ने पर माँ विंध्यवासिनी का मंदिर है। बाबा का वह आसन भी सजाया गया था, जहाँ वे बैठा करते थे। मंदिर से बाहर निकलते ही पास में एक खुली जगह है, जहाँ लोग मंदिर की तस्वीरें खींचते मिलते हैं। मैं भी वहीं चली गई। सामने से बाबा की मूर्ति के दर्शन हुए, और मैं रेलिंग पकड़कर धीरे-धीरे बाबा से बातें करने लगी — जो भी मन में था, सब कह डाला, जो शायद किसी और से नहीं कह सकती थी। और फिर रोने लगी... कुछ देर रोने के बाद, मैं आगे के सफर के लिए चल पड़ी।

बाबा के चौथे धाम, ककड़ीघाट पहुँची — शांत नदी के किनारे बना मंदिर, जहाँ हनुमान जी स्थापित हैं। यहाँ लोग ध्यान कर सकते हैं, बैठकर पाठ किया जाता है। मैं भी ध्यान में बैठ गई। वैसे मैं ध्यान में अच्छी नहीं हूँ, पर चिड़ियों की आवाज़ के सिवा सब कुछ बहुत शांत था।

मेरी यह यात्रा मेरे लिए सब कुछ से भागकर कुछ नया करने की कोशिश थी — बहुत सारा स्वार्थ भी साथ था, जैसा अक्सर सुना है कि जब सब कुछ खत्म-सा लगे तो बाबा के दर्शन कर आओ, सब ठीक हो जाएगा। मैं भी स्वार्थ और इच्छाओं से भरकर बाबा से मिली। बाबा के घर में बिताए कुछ पल ऐसे लगे कि भीतर सब शांत हो गया है। पर मेरा स्वार्थ और इच्छा अब भी बाबा के चमत्कार को संदेह की नज़र से देखती है।

मैंने तय कर लिया है — यह आखिरी बार था किसी देव-देवता या भगवान से कुछ माँगना। अगर यह यात्रा फलित नहीं हुई, तो अब मैं रुक जाऊँगी — माँगने और उम्मीद करने की उस चाहत से, जो बार-बार मुझे खाली हाथ लौटा देती है।

घर आकर फिर से वही सब शुरू हो गया — ज़िंदगी और जीना।

Friday, June 19, 2026

इसी से पहले अँधेरा मेरे अंदर से ख़त्म कर दे मुझे- Rinki

मेरी रूह के वीरान कमरों में कोई सहर भर दे मुझे।

तुम मुझे चाँद की तरह देखो, बेदाग़ न सही मगर अपना,
मेरी ख़ामोशियों को लफ़्ज़ दो, मेरी नज़रों को सपना।

ये दर्द मेरा घर बन जाए, तो फिर शिकायत भी कैसी,
हर ज़ख़्म में तेरी आहट हो, हर धड़कन रौशनी जैसी।
तुम क़ुबूल हुई दुआ बन जाओ मेरी तन्हा रातों की,
मैं सजदे में झुका रहूँ और उम्र गुज़र जाए बातों की।

मैं दर-दर, शहर-शहर फिरा हूँ तेरी तलाश में,
कई चेहरे मिले मगर कोई ठहरा नहीं साँस में।
ये तन्हाई मेरे साथ साया बनकर रही हमेशा,
तुम अगर हमसफ़र बन जाओ, मुकम्मल हो ये किस्सा।

तेरा नाम आज सूरज की रौशनी के साथ आया याद बनकर,
दिन भर मेरी रगों में बहता रहा कोई फ़रियाद बनकर।
मगर रात ढली तो वही नाम तन्हाई का लिबास पहन गया,
मेरे सीने से लिपटकर एक अधूरी दास्ताँ कह गया।

अब आ भी जाओ कि सफ़र थक चुका है मंज़िल की राह में,
मेरी आँखें बिछी हैं बरसों से तेरी एक निगाह में।
जो मुहब्बत है तो उसे ख़ुदा की रहमत की तरह उतरने दो,
और जो मैं हूँ, मुझे तेरे दिल में उम्र भर ठहरने दो।

Rinki Raut

Monday, June 15, 2026

नीम करौली बाबा: समाधि लेने के बाद भी आज तक हो रहे हैं ये हैरान कर देने वाले चमत्कार!

 

भारत में कुछ संतों की कहानियां सिर्फ उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके जाने के बाद भी श्रद्धालुओं के अनुभवों के ज़रिए जिंदा रहती हैं। नीम करौली बाबा (बाबा नीब करौरी महाराज) उन्हीं संतों में से एक हैं, जिनके बारे में आज भी लाखों लोगों का मानना है कि उनकी कृपा अब भी उतनी ही जीवंत है, जितनी उनके जीवित रहते थी। आइए जानते हैं ऐसी कुछ कहानियां, जो आज भी सुनकर रोमांच पैदा कर देती हैं।

कैंची धाम - वो जगह जहां आज भी महसूस होती है बाबा की मौजूदगी

उत्तराखंड के नैनीताल से कुछ ही दूरी पर बसा कैंची धाम, नीम करौली बाबा की सबसे प्रसिद्ध तपस्थली है। 1973 में बाबा के देहावसान के बाद भी यह आश्रम कभी सुना-सुना नहीं रहा। हर साल हज़ारों श्रद्धालु, चाहे वो भारत के हों या विदेश के, यहां सिर्फ दर्शन के लिए नहीं, बल्कि किसी अनकही "ऊर्जा" को महसूस करने के लिए आते हैं। कई भक्तों का कहना है कि जैसे ही वे आश्रम के मुख्य द्वार से अंदर कदम रखते हैं, उन्हें एक अजीब-सी शांति और सुकून का अनुभव होता है, जैसे कोई अदृश्य हाथ उनके सिर पर रखा गया हो।

चमत्कार नंबर 1: सपने में आकर बचाई एक भक्त की जान

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी कई कहानियां सुनने को मिलती हैं, जिनमें भक्तों का दावा है कि मुसीबत के समय बाबा सपने में आकर उन्हें चेतावनी दे गए। एक चर्चित कहानी के अनुसार, एक परिवार लंबी यात्रा पर निकलने वाला था और सब कुछ तय हो चुका था। यात्रा से एक रात पहले परिवार के मुखिया को सपने में बाबा दिखे और उन्होंने साफ शब्दों में कहा - "कल यात्रा मत करना।" सुबह उठकर परिवार ने योजना बदल दी। बाद में पता चला कि जिस रास्ते से उन्हें जाना था, वहां उस दिन एक बड़ा सड़क हादसा हुआ था। यह कहानी आज भी कैंची धाम के आसपास सुनाई जाती है, और भक्त इसे बाबा की "अदृश्य सुरक्षा" का प्रमाण मानते हैं।

चमत्कार नंबर 2: जब स्टीव जॉब्स भारत आए, मगर बाबा से मिल न सके

यह कहानी अध्यात्म और टेक्नोलॉजी की दुनिया को जोड़ने वाली एक अनोखी कड़ी है। कहा जाता है कि एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स अपनी युवावस्था में आध्यात्मिक खोज में भारत आए थे, और उनका लक्ष्य था नीम करौली बाबा से मिलना। लेकिन जब वे कैंची धाम पहुंचे, तब तक बाबा देह त्याग चुके थे। फिर भी, जॉब्स ने आश्रम में कुछ समय बिताया और जो शांति व स्पष्टता उन्हें वहां मिली, उसका असर बाद में उनकी सोच और जीवन-दर्शन में साफ झलकता रहा। आज भी बहुत से विदेशी श्रद्धालु इसी प्रेरणा से कैंची धाम की यात्रा पर निकलते हैं, यह मानते हुए कि बाबा की ऊर्जा अब भी वहां मौजूद है।

चमत्कार नंबर 3: मुश्किल वक्त में अनजान मदद का मिलना

कई भक्तों का अनुभव यह भी है कि जब वे आर्थिक तंगी, बीमारी या किसी बड़े संकट से गुजर रहे होते हैं, और मन से बाबा को याद करते हैं, तो किसी अनजान व्यक्ति या अनदेखे ज़रिए से मदद आ जाती है। एक प्रचलित किस्से में, एक व्यक्ति अपने बच्चे के ऑपरेशन के लिए पैसों का इंतज़ाम नहीं कर पा रहा था। उसने रात में बाबा की तस्वीर के सामने बस इतना कहा - "महाराज, अब आप ही कुछ करो।" अगली सुबह एक पुराने परिचित का फोन आया, जिसने बिना किसी मांगे ही ज़रूरत की रकम का इंतज़ाम कर दिया। ऐसी घटनाएं भक्तों के बीच "बाबा की लीला" के नाम से जानी जाती हैं।

चमत्कार नंबर 4: कैंची धाम में आज भी होने वाले अनुभव

आज भी हर साल 15 जून को कैंची धाम में स्थापना दिवस के मौके पर भारी भीड़ जुटती है। कई भक्त बताते हैं कि इस दौरान उन्हें अचानक आंखों में आंसू आ जाते हैं, बिना किसी वजह के मन भारी हो जाता है, या फिर अचानक किसी पुरानी समस्या का हल अपने आप मिल जाता है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि आश्रम परिसर में मौजूद हनुमान मंदिर के पास बैठते ही उनके मन की उलझनें शांत हो जाती हैं, जैसे कोई गुरु बिना बोले ही रास्ता दिखा गया हो।

निष्कर्ष - श्रद्धा का सफर अब भी जारी है

ये सभी कहानियां भक्तों की श्रद्धा और अनुभवों पर आधारित हैं, और पीढ़ियों से मुंह-ज़बानी एक-दूसरे तक पहुंचती रही हैं। चाहे कोई इन्हें चमत्कार माने या संयोग, सच्चाई यह है कि नीम करौली बाबा का नाम आज भी लाखों दिलों में उतनी ही श्रद्धा के साथ ज़िंदा है, जितना उनके जीवित रहते था। यही वजह है कि कैंची धाम जैसी जगहें सिर्फ "तीर्थ स्थल" नहीं, बल्कि उम्मीद और विश्वास का केंद्र बनी हुई हैं।

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Rinki

ये मोहब्बत नहीं होती साकी

 खुद को मिटा कर जीना, ये मोहब्बत नहीं होती साकी,

अपनी ही परछाई से डरना, ये चाहत नहीं होती साकी,
जिसको चाहो दिल से चाहो, मगर खुद को न भूल जाना,
वरना ये उल्फ़त भी, इक आदत बन जाती है साकी।

किसी के इंतज़ार में, उमर गुज़ार देना आसान नहीं साकी,
पर खुद को भी वक़्त देना, ये कोई गुनाह नहीं साकी,
जो तुम्हारे बिना चल सके, उसे चलने दो ख़ुशी से,
तुम्हारा वजूद किसी के जाने से, कम नहीं साकी।

गिरना सबके नसीब में है, पर सम्भलना भी ज़रूरी है साकी,
खुद को धूल बनाने से पहले, खुद की क़ीमत समझो साकी,
जो लोग तुम्हारी एहमियत न समझें, उनके पीछे क्या भागना,
अपनी क़द्र खुद करो, किसी का मोहताज नहीं साकी।

इश्क़ करो दिल खोल कर, पर अपनी शान न गँवाओ साकी,
ख़्वाबों में खो जाओ, मगर होश न भुलाओ साकी,
जिसे जाना है उसे जाने दो, ये ज़िंदगी का दस्तूर है,
जो तुमसे वफ़ा करे वही, तुम्हारा सच्चा सहारा है साकी।


Rinki

रूमी और शम्स: वह प्रेम जिसने एक विद्वान को कवि बना दिया

"कुछ प्रेम कहानियाँ दो लोगों के मिलन की नहीं होतीं। वे एक आत्मा के जागने की कहानी होती हैं। रूमी और शम्स की कहानी भी ऐसी ही है।" ...