दुनिया में एक पुरानी कहावत है कि इंसान उन्हीं बातों पर सबसे अधिक प्रतिक्रिया देता है जिनसे वह स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करता है। शायद इसी कारण शब्दों की ताकत इतनी बड़ी होती है कि वे कभी प्रेरणा बन जाते हैं, तो कभी पहचान।
आज के भारत में "युवा" शब्द का ही उदाहरण ले लीजिए। सरकारी परिभाषाओं के अनुसार एक निश्चित उम्र तक का व्यक्ति युवा माना जाता है, लेकिन राजनीति में अक्सर पचास-पचपन वर्ष के नेताओं को भी युवा नेता कहा जाता है। ऐसे में युवापन अब उम्र नहीं, बल्कि एक सुविधाजनक विशेषण बन गया है।
इसी बीच सार्वजनिक जीवन में एक नया प्रतीक उभरकर सामने आया है—"कॉकरोच"। कहते हैं कि गधे का भी एक दिन आता है, तो शायद आजकल कॉकरोच का समय चल रहा है। किसी ने राष्ट्रीय मंच पर यह शब्द उछाल दिया। किसी दूसरे ने उसमें अवसर देख लिया और उसके नाम पर एक समूह खड़ा कर दिया। फिर देखते ही देखते ऐसे लोग, जो कल तक स्वयं को विचारशील और स्वतंत्र नागरिक मानते थे, उस पहचान को अपनाने लगे।
सबसे दिलचस्प बात यह नहीं कि किसी ने यह नाम दिया। असली प्रश्न यह है कि लोग उसे स्वीकार करने के लिए इतने उत्सुक क्यों हो गए?
यदि कोई आपको हाथी कह दे, तो क्या आप स्वयं को हाथी समझने लगेंगे? यदि कोई आपको शेर कहे, तो क्या आपके भीतर दहाड़ने की इच्छा जाग उठेगी? सामान्यतः ऐसा नहीं होना चाहिए। क्योंकि एक व्यक्ति की पहचान उसके विवेक, अनुभव और विचारों से बनती है, किसी और के दिए हुए लेबल से नहीं।
लेकिन राजनीति और जन-मन के खेल में लेबल बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इतिहास बताता है कि बड़े समूहों को प्रभावित करने के लिए अक्सर प्रतीकों, नारों और पहचानों का सहारा लिया जाता है। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने स्वतंत्र विचारों को किनारे रखकर उस पहचान का हिस्सा बन जाता है। वह सवाल पूछना छोड़ देता है और केवल प्रतिक्रिया देना सीख जाता है।
यही वह बिंदु है जहाँ भीड़ और नागरिक में अंतर पैदा होता है। नागरिक सोचता है, प्रश्न करता है, असहमति व्यक्त करता है और अपने निष्कर्ष स्वयं बनाता है। भीड़ केवल अनुसरण करती है।
संभव है कि कुछ प्रभावशाली लोग जानबूझकर ऐसी पहचानों को गढ़ते हों। संभव है कि उनका उद्देश्य समाज को विभाजित करना हो, या लोगों की ऊर्जा को किसी विशेष दिशा में मोड़ना हो। यह भी संभव है कि यह केवल एक राजनीतिक खेल हो। लेकिन जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह है कि क्या हम स्वयं सोच रहे हैं या केवल किसी और की बनाई हुई कहानी का हिस्सा बन रहे हैं।
हर इंसान के भीतर तर्क और विवेक का एक स्वतंत्र तंत्र होता है। वही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जब तक वह सक्रिय रहता है, तब तक व्यक्ति किसी भी भीड़, किसी भी नारे और किसी भी कृत्रिम पहचान का अंधानुकरण करने से बच सकता है।
लोकतंत्र की असली शक्ति भी यही है स्वतंत्र सोच। किसी समूह का हिस्सा बनना गलत नहीं है, लेकिन बिना सोचे-समझे किसी पहचान को अपना लेना निश्चित रूप से चिंताजनक है।
अंततः चुनाव हमारा अपना है। हम स्वयं को क्या मानते हैं, किस विचार के साथ खड़े होते हैं और किन बातों पर विश्वास करते हैं यह निर्णय हमें करना है। क्योंकि जब इंसान सोचना छोड़ देता है, तब वह नागरिक नहीं रह जाता, केवल भीड़ का एक हिस्सा बनकर रह जाता है।
बाकी आपकी मर्ज़ी है। आप स्वयं को जो चाहें समझ सकते हैं। लेकिन यह याद रखिए कि पहचान का सबसे मजबूत आधार किसी और का दिया हुआ नाम नहीं, बल्कि आपका अपना विवेक होता है।
Rinki
