Tuesday, July 7, 2026

सूफी- कागा कागा रे

 कागा कागा रे

मोरी अरज तोसे

चुन चुन खइयो मास

कागा कागा रे


मोरी अरज तोसे

चुन चुना खाइयोमाच

अरजिया रे खाइयाँ ना तू नैना मोरे

खाइयाँ ना तू नैना मोहे


पिया के मिलन की

आस खाइयो ना तू नैना

मोहे पिया के मिलन की आस

खाइयो ना तू नैना मोरे खाइयो ना तू नैना मो रे बाकी की पूरी बॉडी खा ले लेकिन मेरे नैना मत खाना क्योंकि मुझे पिया के मिलन की आस हैं ,मुझे आस है, उम्मीद है कि मेरा पिया मुझसे मिलने आएगा और उस टाइम में उसका दीदार कर सकूं इसके लिए मुझे अपनी आंखें चाहिए और यहां पे पिया मतलब कोई गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड की बात नहीं चल रही है ये लाइंस ओरिजनली लिखी थी बाबा फरीद ने जो एक पंजाबी सूफी थे उनकी कुछ लाइन गुरु ग्रंथ साहिब में भी लिखी गई हैं,तो उसने लिखा था कि कागा सब तन खाइयो चुनचुन खाइयो मास दो नैनों को मत खाइयो पिया मिलन की आस सूफिज्म में पिया मतलब ईश्वर रब अल्लाह खुदा को बोला जाता है जैसे हम बोलते हैं ना पिया हाजी अली पिया हाजी अली तो इन लाइंस में भी उसी पिया का जिक्र है उसके दीदार की बात कर रही है कि भले ही मैं मर जाऊं मेरी पूरी बॉडी खा ले लेकिन आंखें मत खाना हो सकता है कि मरने के बाद जब वो मेरे सामने आए तो मैं उसका दीदार कर सकूं इसलिए मेरी आंखें छोड़ देना।

Monday, July 6, 2026

गुप्तगामिनी – वह जो रात्रि की रेखा पर चलती है

 

वह चलती नहीं वह सरकती है, जैसे चंद्रमा की रेखा सरकती हो शांत जल पर। उसकी गति में कोई शब्द नहीं, कोई संकोच नहीं वह स्त्री है, पर कोई साधारण नारी नहीं, वह गुप्तगामिनी है जो अपने देह को वस्त्र नहीं, मंत्र की भाँति पहनती है। उसकी देह कोई उद्घोष नहीं करती, वह मौन की मृदुलता से सजी है। वह लज्जा की रेखा पर नहीं, गर्व की गहराई पर खड़ी है एक ऐसी स्त्री, जो प्रेम को छिपाकर नहीं रखती, बल्कि उसे सहेजकर अपने भीतर जलाती है जैसे कोई अखंड दीप। उसके बालों में रात उलझी रहती है वे केशगुच्छ नहीं, तिमिर की तांत्रिक रस्सियाँ हैं। हर लट जैसे कोई रात्रिचर मंत्र, हर जूड़ा जैसे किसी प्रेम-पूजा की गांठ। वह जब चलती है, तो धरती पर कोई पदचिन्ह नहीं पड़ते क्योंकि वह केवल धरती पर नहीं, प्रेमी की स्मृति में चलती है। उसके अधर कोई निमंत्रण नहीं देते, किंतु उन्हें देख लेना ही किसी समाधि का प्रथम सोपान है। वह बोलती नहीं, पर उसके मौन में असंख्य आलिंगनों की आकांक्षा होती है। वह किसी अट्टहास की स्त्री नहीं वह उस मौन हँसी की नायिका है, जो रात्रि के तीसरे प्रहर में किसी प्रिय की नींद में उतर जाती है, जैसे कोई अनाम सुगंध। उसकी आँखें वे कोई दृष्टि नहीं देतीं, बल्कि स्पर्श का संकेत देती हैं। हर कटाक्ष किसी गुप्त ऋतु की पुकार, हर पलकपात कोई प्रणव है। वह वासना नहीं वह विरह के बाद का विशुद्ध स्पर्श है। वह रति में नहीं, रति से पहले की प्रतीक्षा में सुंदर है। वह मिलन की क्षणिक आह नहीं, बल्कि मिलन की पूर्णाहुति है। उसकी नाभि में कोई आभूषण नहीं, फिर भी वह नाभि कोई ज्योतिरलिंग है जहाँ एक ब्रह्मांड स्त्री होकर घूमता है। उसकी कटि वह वह घाट है, जहाँ कोई प्रेयसी होकर नहाता नहीं, बल्कि देह को त्यागता है। वह स्वप्न नहीं, स्वप्नों की वह रेखा है जो जागते समय भी आँखों में जलती है। उसकी जंघाएँ कोई श्रृंगार नहीं, चेतना की सीढ़ियाँ हैं, जिनसे चढ़कर कोई प्रिय उसके भीतर के देवालय में प्रवेश करता है। वह कोई रूपवती नहीं, क्योंकि उसका रूप कोई रंग नहीं एक अर्थ है। वह नायिका नहीं, क्योंकि नायिका होना केवल अभिनय है वह तो अधिनायिका है, जो स्वयं अपनी कथा रचती है, निभाती है, और विसर्जित कर देती है। वह जल में उतरती है, तो जल में गंध आ जाती है। वह चंदन नहीं लगाती, फिर भी देह से कोई अग्नि का सुवास उठता है। वह मंदिर नहीं जाती क्योंकि वह स्वयं एक चलायमान देवालय है। उसकी चाल में चित्त चंचल नहीं होता, बल्कि स्थिर हो जाता है जैसे किसी योगी को सहसा साक्षात्कार हो जाए। वह गुप्त है क्योंकि उसका प्रेम सस्ता नहीं, उसकी देह उपलब्ध नहीं, और उसकी आत्मा अशांत नहीं। वह वह स्त्री है, जिसे पाना संभव नहीं, और जिसमें विलीन होना अपरिहार्य। गुप्तगामिनी कोई नाम नहीं, कोई उपाधि नहीं वह एक स्त्री के भीतर की वह शाश्वत रात्रि है, जो हर युग में, हर देह में, हर प्रणय में अस्तित्व का सबसे सुंदर रहस्य बनकर उतरती है| -अजेष्ठ

तुम्हें प्रेम नहीं करना चाहिए

ऐसी स्त्री से

जो बाहर से शांत, पर भीतर से तूफानों से घिरी हो जिसकी आंखों में ठहरी हुई नमी किसी अधूरी दास्तान की गवाही देती हो उसकी मुस्कान के पीछे एक लंबी, गहरी चुप्पी छिपी रहती हो जिसने हर हंसी से पहले अपने आंसुओं को रोका हो। तुम्हें प्रेम नहीं करना चाहिए ऐसी स्त्री से क्योंकि अगर उसने तुम्हें चाह लिया, उसकी चाहत साधारण नहीं रहेगी तुम्हें अपना संपूर्ण आकाश बना लेगी, और खुद एक नक्षत्र की तरह तुम्हारी परिक्रमा करती रहेगी वो अपनी टूटी किरचियों को तुम्हारे स्पर्श से जोड़ने लगेगी, हर अधूरी दुआ में तुम्हारा नाम बुन देगी, तुम्हारे हर शब्द में एक ब्रह्मांड खोज लेगी। वो तुम्हें सिर्फ चाहेगी नहीं वो तुम्हें जीने लगेगी, तुम्हारे मौन में भी संवाद सुनेगी तुमसे दूर होकर भी तुम्हारे पास होने का भ्रम पाल लेगी। वो भूल जाएगी सब कुछ अपने जख्मों की सभी वजह को और तुम्हें अपना मरहम मान लेगी तुम उसकी अंधेरी दुनिया के सूरज बन जाओगे वह रौशनी से जगमगा उठेगी अगर तुमने, उस प्रेम की गहराई को न समझा उसके समर्पण की भाषा न पढ़ सके, तो याद रखना इस संसार में तुमसे बड़ा अभागा कोई नहीं!! ~ सदफ इक़बाल

Tuesday, June 30, 2026

रूमी और शम्स: वह प्रेम जिसने एक विद्वान को कवि बना दिया

"कुछ प्रेम कहानियाँ दो लोगों के मिलन की नहीं होतीं। वे एक आत्मा के जागने की कहानी होती हैं। रूमी और शम्स की कहानी भी ऐसी ही है।"

कल्पना कीजिए — एक आदमी जिसके पास सब कुछ है। ज्ञान, सम्मान, हज़ारों शिष्य, एक पूरे शहर की श्रद्धा। और फिर एक दिन, फटे कपड़ों में एक अजनबी बाज़ार से गुज़रता है... और उस आदमी की पूरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल जाती है।

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। यह रूमी और शम्स-ए-तबरीज़ की सच्ची कहानी है — एक ऐसी कहानी जिसने आठ सौ साल बाद भी दुनिया भर के करोड़ों दिलों को छुआ है।

तेरहवीं शताब्दी का कोन्या: जहाँ से कहानी शुरू होती है

तेरहवीं शताब्दी का दौर था। आज के तुर्की के शहर कोन्या में एक महान इस्लामी विद्वान रहते थे — मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद रूमी। दूर-दूर से लोग उनके प्रवचन सुनने आते थे। वे धर्मशास्त्र के गहरे ज्ञाता थे, सम्मानित शिक्षक थे, और हज़ारों शिष्यों के गुरु थे।

उनके पास ज्ञान था। प्रतिष्ठा थी। सम्मान था।

लेकिन उनके भीतर कहीं एक ऐसी प्यास थी, जिसका उन्हें खुद भी पता नहीं था। उन्हें लगता था कि उन्होंने जीवन को समझ लिया है — पर जीवन अभी उन्हें प्रेम का असली अर्थ सिखाने वाला था।

पहला अध्याय: एक अजनबी का आगमन

एक ठंडी दोपहर थी। बाज़ार में लोगों की चहल-पहल थी। उसी भीड़ में, फटे कपड़ों वाला एक दरवेश शहर में दाख़िल हुआ। उसका चेहरा धूप से तपा हुआ था, आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।

वह था — शम्स-ए-तबरीज़

शम्स किसी किताब का आदमी नहीं था। वह अनुभव का आदमी था। उसने संसार देखा था — राजाओं के दरबार भी, और फ़कीरों की झोपड़ियाँ भी। उसे किसी पद, सम्मान या प्रसिद्धि से कोई लगाव नहीं था। वह बस एक ऐसे इंसान की तलाश में था, जिसके भीतर प्रेम की आग जलाने की क्षमता हो।

लोगों ने पूछा, "तुम किसे खोज रहे हो?"

शम्स ने जवाब दिया, "एक ऐसे दिल को, जो ईश्वर को जानता नहीं, बल्कि उससे प्रेम करता हो।"

वह पहली मुलाकात जिसने सब कुछ बदल दिया

जब शम्स की मुलाकात रूमी से हुई, तो कहा जाता है कि उसने एक सीधा सवाल पूछा — "मोहम्मद बड़े हैं या बायज़ीद बस्तामी?"

लोग यह सवाल सुनकर चौंक गए। रूमी ने जवाब दिया, "निस्संदेह, पैग़म्बर मुहम्मद।"

शम्स मुस्कुराए और बोले, "फिर ऐसा क्यों कि पैग़म्बर ने कहा — 'मैं तुझे वैसा नहीं जान पाया जैसा जानना चाहिए था।' और बायज़ीद ने कहा — 'मैं महान हूँ।'"

रूमी मौन हो गए।

शम्स ने समझाया, "जिसने ईश्वर को सचमुच जाना, वह स्वयं को छोटा समझने लगा। जिसने अपने अनुभव को ही अंतिम मान लिया, वह वहीं रुक गया।"

उस एक संवाद ने रूमी के भीतर वर्षों से बनी दीवारों में पहली दरार डाल दी।

दूसरा अध्याय: ज्ञान से प्रेम तक का सफ़र

उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया। रूमी ने अपने नियमित प्रवचन कम कर दिए। वे घंटों शम्स के साथ बैठते — कभी बात करते, कभी चुप रहते, कभी रोते, कभी हँसते।

शम्स ने उन्हें सिखाया — "ईश्वर को किताबों में मत खोजो। उसे अपने टूटे हुए दिल में खोजो।"

रूमी पहली बार समझ रहे थे कि प्रेम सिर्फ़ एक भावना नहीं, बल्कि आत्मा का संपूर्ण परिवर्तन है। उन्होंने लिखा — "जब तक तुम स्वयं को नहीं खोते, तब तक स्वयं को नहीं पाते।"

तीसरा अध्याय: दुनिया की नाराज़गी

लेकिन दुनिया प्रेम को कहाँ समझती है?

रूमी के शिष्य नाराज़ होने लगे। उन्हें लगा कि शम्स ने उनके गुरु को बदल दिया है। लोग फुसफुसाने लगे — "यह दरवेश जादूगर है," "इसने रूमी को हमसे दूर कर दिया।"

रूमी को इसकी कोई परवाह नहीं थी। वे कहते — "जिस प्रेम में लोग पागलपन न देखें, वह प्रेम अभी अधूरा है।"

चौथा अध्याय: बिछड़ने का दर्द

एक दिन शम्स अचानक चले गए। रूमी बेचैन हो उठे। उन्होंने हर शहर में उन्हें खोजा, दमिश्क तक गए, वर्षों तलाशते रहे।

कहते हैं, वे लौटे भी। लेकिन फिर एक दिन शम्स हमेशा के लिए ग़ायब हो गए। इतिहास आज तक यह नहीं बता पाया कि उनके साथ आख़िर क्या हुआ। कुछ कहते हैं उनकी हत्या हुई, कुछ कहते हैं वे स्वयं चले गए। सच शायद सिर्फ़ ईश्वर जानता है।

पाँचवाँ अध्याय: सबसे बड़ी खोज

शम्स के जाने के बाद रूमी टूट गए। दिनों तक रोते रहे। फिर एक रात उन्होंने महसूस किया — जिसे वे बाहर खोज रहे हैं, वह तो उनके भीतर ही जीवित है।

शम्स अब कोई व्यक्ति नहीं रहे थे। वे रूमी की चेतना बन चुके थे।

रूमी ने कहा — "मैंने अपने पहले प्रेमी को खोया नहीं। वह मेरी आत्मा बन गया।"

उस दिन के बाद उनकी कविताएँ जन्म लेने लगीं। उनके आँसू शब्द बन गए। उनकी तन्हाई संगीत बन गई।

छठा अध्याय: घूमता हुआ दरवेश

एक दिन रूमी बाज़ार से गुज़र रहे थे। किसी सुनार की दुकान से हथौड़े की लयबद्ध आवाज़ आ रही थी। उस लय में उन्हें लगा मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर का नाम जप रहा हो।

वे अचानक घूमने लगे — धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर और तेज़। एक हाथ आसमान की ओर, दूसरा धरती की ओर।

यहीं से सूफ़ियों का प्रसिद्ध घूमता हुआ नृत्य (समा) शुरू हुआ। उनके लिए यह नृत्य मनोरंजन नहीं, आत्मा की प्रार्थना था।

सातवाँ अध्याय: प्रेम का अंतिम अर्थ

रूमी ने कहा — प्रेम किसी को पा लेना नहीं है। प्रेम अपने भीतर के अहंकार को खो देना है। जिस दिन "मैं" समाप्त हो जाता है, उसी दिन प्रेम जन्म लेता है।

उन्होंने लिखा — "घाव वही स्थान है जहाँ से प्रकाश तुम्हारे भीतर प्रवेश करता है।"

और सचमुच — यदि रूमी शम्स से न मिले होते, तो शायद वे सिर्फ़ एक महान विद्वान बनकर रह जाते। लेकिन शम्स ने उन्हें कवि बना दिया, और उनकी कविताओं ने उन्हें अमर कर दिया।

रूमी की कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ (हिंदी भावानुवाद)

1. घाव घाव से मत डरो। वहीं से प्रकाश तुम्हारे भीतर प्रवेश करता है।

2. खोज मैं बुद्धिमान बनना चाहता था, इसलिए मैंने दुनिया बदलनी चाही। फिर प्रेम ने मुझे छुआ। अब मैं स्वयं को बदल रहा हूँ।

3. प्रेम प्रेम कोई भावना नहीं। प्रेम वह आग है, जिसमें 'मैं' जल जाता है और केवल 'तुम' बचते हो।

4. मौन मौन ही ईश्वर की भाषा है। बाकी सब केवल उसका कमजोर अनुवाद है।

5. आओ आओ... चाहे तुमने सौ बार अपने वचन तोड़े हों। चाहे तुम थके हुए हो, चाहे तुम निराश हो — यह प्रेम का द्वार है। यहाँ किसी से उसका अतीत नहीं पूछा जाता।

6. भीतर की यात्रा कल मैं चतुर था, इसलिए दुनिया बदलना चाहता था। आज मैं बुद्धिमान हूँ, इसलिए स्वयं को बदल रहा हूँ।

7. आत्मा तुम समुद्र की एक बूँद नहीं हो। तुम एक बूँद में समाया हुआ पूरा समुद्र हो।

उपसंहार: विवाह की रात

रूमी की मृत्यु 17 दिसंबर 1273 को हुई। उनके अनुयायी उस दिन को "शब-ए-अरूस" यानी "विवाह की रात" कहते हैं। उनका विश्वास था कि यह मृत्यु नहीं, बल्कि आत्मा का अपने प्रियतम — ईश्वर — से मिलन था।

आज, लगभग आठ सौ वर्षों बाद भी, रूमी की कविताएँ दुनिया की अनेक भाषाओं में पढ़ी जाती हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम केवल दो लोगों के बीच का संबंध नहीं होता — वह एक ऐसी अग्नि है जो मनुष्य के भीतर के अहंकार को भस्म कर देती है और उसे उसके वास्तविक स्वरूप से मिला देती है।

शायद इसीलिए रूमी की पूरी जीवन-यात्रा एक ही वाक्य में समा जाती है —

"जिसे तुम प्रेम समझते हो, वह केवल शुरुआत है; सच्चा प्रेम वह है जो तुम्हें बदल दे।"


अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो इसे उन लोगों के साथ ज़रूर साझा करें जो सच्चे प्रेम और आध्यात्मिक जागृति की कहानियाँ पसंद करते हैं।

साक्षात् के दर्शन — बाबा नीब करौरी महाराज


कैंची धाम, सिप्रा नदी के किनारे बसा बाबा का घर। जैसे ही नजर कैंची धाम पर पड़ी, ऐसा लगा जैसे बरसों बाद अपने दादा के घर लौट आई हूँ। आँखें भर आईं — किसी बिछड़े अपने से लंबे अरसे बाद मिलने जैसा एहसास था। मंदिर के सामने से गुजरी तो सुबह की आरती हो रही थी। मन में था कि जल्दी से नहा-धोकर बाबा के दर्शन कर लूँगी, पर ऐसा हो न सका। होटल चेक-इन में ही दो घंटे लग गए, क्योंकि मैं तय समय से चार घंटे पहले ही पहुँच गई थी।

दर्शन यात्रा शुरू हुई। गाइड ने कहा — पहले भूमियाधार हनुमान मंदिर चलते हैं, फिर हनुमान गढ़ी, उसके बाद ककड़ीघाट और अंत में कैंची धाम। मैं सहर्ष राजी हो गई। सुबह कैंची धाम को देखकर ही मानो बाबा के दर्शन हो चुके थे, मन वहीं अटका था।

हमारी सवारी कुमाऊँ की घाटियों से होकर गुजरी — कहीं भीड़ से टकराते, कहीं गाड़ियों के जाम से जूझते। सबसे पहले पहुँचे भूमियाधार हनुमान मंदिर, जो बाबा द्वारा स्थापित है और हाईवे किनारे बना है। ज़्यादा भीड़ नहीं थी, मंदिर खाली था। हनुमान जी को प्रणाम किया — वैसे उनसे मेरी बहुत नहीं बनती, पता नहीं क्यों।

फिर सवारी पहुँची हनुमान गढ़ी, जो बाबा द्वारा स्थापित दूसरा हनुमान मंदिर है। यहाँ कुछ भीड़ थी और बारिश भी डराने लगी थी। अंदर मंदिर में हनुमान जी के हृदय में राम-सीता विराजमान बहुत बड़ी मूर्ति है — मंदिर बेहद सुंदर। दर्शन किए, एक बार हनुमान चालीसा का पाठ किया, और मन में सोचा — "हनुमान जी, अब से हम दोस्त हैं, हमारी दोस्ती हो गई है, अब सब ठीक है।" थोड़ी देर ध्यान में बैठी ही थी कि तेज बारिश शुरू हो गई। बारिश की आवाज़ कानों को सुकून दे रही थी, मानो कोई कह रहा हो — "अभी मत जाओ... रुक जाओ।" मैं रुकी, बारिश रुकी, और फिर आगे का सफर शुरू हुआ।

अब बारी थी कैंची धाम की। जब पहुँचे तो देखा भीड़ कम है। दर्शन के लिए उतरी, लोगों से पूछा — क्या मंदिर में पूजा होती है? पता चला, कोई पूजा नहीं होती, प्रसाद भी सिर्फ बाबा को दूर से दिखाकर वापस ले जाना होता है। न कोई प्रसाद खरीदा, सीधे दर्शन के लिए पंक्ति में लग गई। सब पंक्ति में चलते जा रहे थे, पीछे से आवाज़ आ रही थी — "जल्दी चलो, जल्दी चलो" — जैसे मैं कोई भीड़ का हिस्सा भर हूँ। मंदिर प्रशासन बस यही चाहता था कि भीड़ जल्दी-जल्दी निकल जाए।

सबसे पहले माँ वैष्णो देवी के दर्शन हुए, वहाँ हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। आगे हनुमान जी का मंदिर, और फिर सामने बाबा की विशाल पालथी मारे हुए मूर्ति दिखी। एक पंडा और सुरक्षाकर्मी बोले जा रहे थे — "जल्दी करो, जल्दी करो" — वहाँ एक पल रुककर बाबा से बात भी नहीं कर सकते, न मंदिर में बैठकर पाठ कर सकते।

आगे बढ़ने पर माँ विंध्यवासिनी का मंदिर है। बाबा का वह आसन भी सजाया गया था, जहाँ वे बैठा करते थे। मंदिर से बाहर निकलते ही पास में एक खुली जगह है, जहाँ लोग मंदिर की तस्वीरें खींचते मिलते हैं। मैं भी वहीं चली गई। सामने से बाबा की मूर्ति के दर्शन हुए, और मैं रेलिंग पकड़कर धीरे-धीरे बाबा से बातें करने लगी — जो भी मन में था, सब कह डाला, जो शायद किसी और से नहीं कह सकती थी। और फिर रोने लगी... कुछ देर रोने के बाद, मैं आगे के सफर के लिए चल पड़ी।

बाबा के चौथे धाम, ककड़ीघाट पहुँची — शांत नदी के किनारे बना मंदिर, जहाँ हनुमान जी स्थापित हैं। यहाँ लोग ध्यान कर सकते हैं, बैठकर पाठ किया जाता है। मैं भी ध्यान में बैठ गई। वैसे मैं ध्यान में अच्छी नहीं हूँ, पर चिड़ियों की आवाज़ के सिवा सब कुछ बहुत शांत था।

मेरी यह यात्रा मेरे लिए सब कुछ से भागकर कुछ नया करने की कोशिश थी — बहुत सारा स्वार्थ भी साथ था, जैसा अक्सर सुना है कि जब सब कुछ खत्म-सा लगे तो बाबा के दर्शन कर आओ, सब ठीक हो जाएगा। मैं भी स्वार्थ और इच्छाओं से भरकर बाबा से मिली। बाबा के घर में बिताए कुछ पल ऐसे लगे कि भीतर सब शांत हो गया है। पर मेरा स्वार्थ और इच्छा अब भी बाबा के चमत्कार को संदेह की नज़र से देखती है।

मैंने तय कर लिया है — यह आखिरी बार था किसी देव-देवता या भगवान से कुछ माँगना। अगर यह यात्रा फलित नहीं हुई, तो अब मैं रुक जाऊँगी — माँगने और उम्मीद करने की उस चाहत से, जो बार-बार मुझे खाली हाथ लौटा देती है।

घर आकर फिर से वही सब शुरू हो गया — ज़िंदगी और जीना।

सूफी- कागा कागा रे

  कागा कागा रे मोरी अरज तोसे चुन चुन खइयो मास कागा कागा रे मोरी अरज तोसे चुन चुना खाइयोमाच अरजिया रे खाइयाँ ना तू नैना मोरे खाइयाँ ना तू नैन...