एक दिन ऐसा हुआ,
वफ़ा पर बहस छिड़ गई।
मैंने इश्क़ को अमर कहा,
वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई।
मैं इश्क़ का क़ैदी था,
वो इश्क़ को एक क़ैदखाना कहती रही।
कि उम्र भर का साथ भी,
उसे चाहत से बदतर लगा।
पेड़ पत्थर नहीं होते…
Everyone does have a book in them. Here is few pages of my life, read it through by my stories,poetry and articles.
एक दिन ऐसा हुआ,
वफ़ा पर बहस छिड़ गई।
मैंने इश्क़ को अमर कहा,
वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई।
मैं इश्क़ का क़ैदी था,
वो इश्क़ को एक क़ैदखाना कहती रही।
कि उम्र भर का साथ भी,
उसे चाहत से बदतर लगा।
पेड़ पत्थर नहीं होते…
एक एहसास हैं—जहाँ इंसान अपने ही विचारों में उलझा रहता है, रिश्तों की सच्चाई को समझने की कोशिश करता है, और भीतर से खुद को खोजता रहता है।
1.
“मैं भी बहुत अजीब हूँ, इतना अजीब हूँ कि बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।”
2.
“इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ,
वर्ना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने।”
3.
“बहुत नज़दीक आती जा रही हो,
बिछड़ने का इरादा कर लिया है क्या?”
4.
“शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई,
लेकिन यक़ीन सबको दिलाता रहा हूँ मैं।”
5.
“कौन इस घर की देखभाल करे,
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है।”
6.
“अब नहीं कोई बात ख़तरे की,
अब सभी को सभी से ख़तरा है।”
7.
“तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो,
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो।”
8.
“हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ,
हैं कई हिज्र दरमियाँ जानाँ।”
थोड़ा रुक जाओ, अपने दिल की बात सुनो।
जल्दी मत करो, अभी समय है समझने का।
जैसे कच्चे आम को धीरे-धीरे चखते हैं,
वैसे ही जीवन को आराम से महसूस करो।
डरो मत कि तुम डूब जाओगे,
बस खुद में झाँको और ठहर जाओ।
अब तक तुम बाहर की दुनिया में उलझे रहे,
थोड़ा अपने अंदर भी देखो।
अपने दिल को अपने ही नाम कर दो,
और खुद को समझने की कोशिश करो।
जो लोग तुम्हें परेशान करते हैं, उनसे छिपने की जरूरत नहीं,
बस थोड़ा रुककर खुद को संभालो।
ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है
जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं।
यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग।
धरती धूल से भरी है,
आसमान धुँधला है।
सच्चा रूप कहीं दिखाई नहीं देता।
यह बगुलों का शहर है।
हम धूल जैसे हालातों में
अपनी सीमाएँ खोते जा रहे हैं।
यहाँ इंसान की पहचान भी धूल में मिल जाती है।
यह बगुलों का शहर है।
इस एक पल में ही सब आमने-सामने है,
फिर न मैं बचता हूँ, न तुम।
यहाँ किए गए वादे भी खोखले हैं।
यह बगुलों का शहर है।
जो अभी है और जो पहले था,
सब स्वार्थ में डूबा हुआ है।
यहाँ किसके लिए और क्या जीना है,
कुछ साफ़ नहीं।
यह बगुलों का शहर है।
अगर बस अपना ही स्वार्थ सही,
और वही लालसा सही,
तो रिश्ते भी बस दिखावे के रह जाते हैं।
यह बगुलों का शहर है।
यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।
यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।
कैंची धाम, उत्तराखंड में स्थित एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल है, जो बाबा नीब करोरी महाराज की कृपा और चमत्कारों से जुड़ा हुआ है। यह धाम आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
कहा जाता है कि बाबा नीब करोरी महाराज नैनीताल–अल्मोड़ा मार्ग पर एक स्थान पर आकर रुके, जहाँ दो पहाड़ी रास्ते कैंची के आकार में एक-दूसरे को काटते हैं। इसी कारण इस स्थान का नाम कैंची धाम पड़ा।
उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था और पूरी तरह सुनसान था। बाबा यहाँ ध्यान में लीन रहते और हनुमान जी की भक्ति में मग्न रहते थे। बाबा ने अपने भक्तों से कहा कि इसी स्थान पर हनुमान जी का मंदिर बनाया जाएगा।
मंदिर निर्माण आसान नहीं था। दुर्गम पहाड़ी रास्ते, संसाधनों की कमी और मौसम की कठिनाइयाँ बार-बार सामने आईं। लेकिन भक्तों का विश्वास बाबा पर अडिग था। कहा जाता है कि जब भी कोई बाधा आती, बाबा की कृपा से समाधान अपने आप हो जाता।
वर्ष 1964 में कैंची धाम में हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इस ऐतिहासिक अवसर पर बाबा नीब करोरी महाराज स्वयं उपस्थित थे। तभी से यह धाम आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र बन गया।
बाबा नीब करोरी महाराज ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन यहाँ इतनी भीड़ होगी कि रास्ते छोटे पड़ जाएंगे। आज हर वर्ष 15 जून को स्थापना दिवस के अवसर पर लाखों श्रद्धालु कैंची धाम पहुँचते हैं, और बाबा की भविष्यवाणी सच साबित होती दिखती है।
आज कैंची धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और विश्वास का प्रतीक है। भक्तों का मानना है कि यहाँ सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य पूरी होती है।
कैंची धाम हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति, सेवा और विश्वास से असंभव भी संभव हो सकता है। बाबा नीब करोरी महाराज की कृपा आज भी भक्तों के जीवन को दिशा दिखा रही है।
जय श्री राम। जय हनुमान।
एक दिन ऐसा हुआ, वफ़ा पर बहस छिड़ गई। मैंने इश्क़ को अमर कहा, वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई। मैं इश्क़ का क़ैदी था, वो इश्क़ को एक क़ैदख...