Monday, July 27, 2026

"हम देखेंगे"

हम देखेंगे,

ज़रूर देखेंगे।

वह दिन ज़रूर आएगा,
जिसका वादा किया गया है,
जो समय की शुरुआत से ही तय है।

जब अत्याचार और ज़ुल्म के
बड़े-बड़े पहाड़
रूई की तरह उड़ जाएँगे।

जब शोषित और दबे हुए लोगों के कदमों से
धरती ज़ोर-ज़ोर से काँपेगी।

और सत्ता में बैठे लोगों के सिर पर
बिजली गरजेगी।

जब ईश्वर के घर से
हर तरह की झूठी पूजा और अन्याय के प्रतीक
हटा दिए जाएँगे।

जो लोग अब तक ठुकराए गए थे,
वही सम्मान के स्थान पर बैठाए जाएँगे।

सभी ताज उछाल दिए जाएँगे,
सभी सिंहासन गिरा दिए जाएँगे।

केवल सत्य और ईश्वर का नाम रहेगा,
जो हर जगह मौजूद है,
जिसे देखा भी नहीं जा सकता,
लेकिन जो सबको देखता है।

तब सच्चाई का नारा गूँजेगा—
"मैं ही सत्य हूँ।"

उस सत्य में मैं भी हूँ,
और तुम भी हो।

और इस धरती पर
जनता का राज होगा—
जिसमें मैं भी हूँ,
और तुम भी हो।

Sunday, July 26, 2026

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - "बोल"

 बोल, क्योंकि तुम्हारे होंठ अभी भी आज़ाद हैं।

बोल, क्योंकि तुम्हारी ज़ुबान अभी भी तुम्हारी अपनी है।

तुम्हारा यह सीधा और मज़बूत शरीर तुम्हारा है,
तुम्हारी जान भी अभी तुम्हारे पास है।

देखो, लोहार की भट्ठी में
आग की लपटें तेज़ हैं और लोहा लाल होकर तप रहा है।

अब ताले खुलने लगे हैं,
हर ज़ंजीर ढीली पड़ने लगी है।

बोल, यह थोड़ा-सा समय भी बहुत कीमती है,
इससे पहले कि शरीर और आवाज़ दोनों हमेशा के लिए शांत हो जाएँ।

बोल, क्योंकि सच अभी भी ज़िंदा है।
जो कुछ कहना है, निडर होकर कह डालो।

Tuesday, July 7, 2026

सूफी- कागा कागा रे

 कागा कागा रे

मोरी अरज तोसे

चुन चुन खइयो मास

कागा कागा रे


मोरी अरज तोसे

चुन चुना खाइयोमाच

अरजिया रे खाइयाँ ना तू नैना मोरे

खाइयाँ ना तू नैना मोहे


पिया के मिलन की

आस खाइयो ना तू नैना

मोहे पिया के मिलन की आस

खाइयो ना तू नैना मोरे खाइयो ना तू नैना मो रे बाकी की पूरी बॉडी खा ले लेकिन मेरे नैना मत खाना क्योंकि मुझे पिया के मिलन की आस हैं ,मुझे आस है, उम्मीद है कि मेरा पिया मुझसे मिलने आएगा और उस टाइम में उसका दीदार कर सकूं इसके लिए मुझे अपनी आंखें चाहिए और यहां पे पिया मतलब कोई गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड की बात नहीं चल रही है ये लाइंस ओरिजनली लिखी थी बाबा फरीद ने जो एक पंजाबी सूफी थे उनकी कुछ लाइन गुरु ग्रंथ साहिब में भी लिखी गई हैं,तो उसने लिखा था कि कागा सब तन खाइयो चुनचुन खाइयो मास दो नैनों को मत खाइयो पिया मिलन की आस सूफिज्म में पिया मतलब ईश्वर रब अल्लाह खुदा को बोला जाता है जैसे हम बोलते हैं ना पिया हाजी अली पिया हाजी अली तो इन लाइंस में भी उसी पिया का जिक्र है उसके दीदार की बात कर रही है कि भले ही मैं मर जाऊं मेरी पूरी बॉडी खा ले लेकिन आंखें मत खाना हो सकता है कि मरने के बाद जब वो मेरे सामने आए तो मैं उसका दीदार कर सकूं इसलिए मेरी आंखें छोड़ देना।

Monday, July 6, 2026

गुप्तगामिनी – वह जो रात्रि की रेखा पर चलती है

 

वह चलती नहीं वह सरकती है, जैसे चंद्रमा की रेखा सरकती हो शांत जल पर। उसकी गति में कोई शब्द नहीं, कोई संकोच नहीं वह स्त्री है, पर कोई साधारण नारी नहीं, वह गुप्तगामिनी है जो अपने देह को वस्त्र नहीं, मंत्र की भाँति पहनती है। उसकी देह कोई उद्घोष नहीं करती, वह मौन की मृदुलता से सजी है। वह लज्जा की रेखा पर नहीं, गर्व की गहराई पर खड़ी है एक ऐसी स्त्री, जो प्रेम को छिपाकर नहीं रखती, बल्कि उसे सहेजकर अपने भीतर जलाती है जैसे कोई अखंड दीप। उसके बालों में रात उलझी रहती है वे केशगुच्छ नहीं, तिमिर की तांत्रिक रस्सियाँ हैं। हर लट जैसे कोई रात्रिचर मंत्र, हर जूड़ा जैसे किसी प्रेम-पूजा की गांठ। वह जब चलती है, तो धरती पर कोई पदचिन्ह नहीं पड़ते क्योंकि वह केवल धरती पर नहीं, प्रेमी की स्मृति में चलती है। उसके अधर कोई निमंत्रण नहीं देते, किंतु उन्हें देख लेना ही किसी समाधि का प्रथम सोपान है। वह बोलती नहीं, पर उसके मौन में असंख्य आलिंगनों की आकांक्षा होती है। वह किसी अट्टहास की स्त्री नहीं वह उस मौन हँसी की नायिका है, जो रात्रि के तीसरे प्रहर में किसी प्रिय की नींद में उतर जाती है, जैसे कोई अनाम सुगंध। उसकी आँखें वे कोई दृष्टि नहीं देतीं, बल्कि स्पर्श का संकेत देती हैं। हर कटाक्ष किसी गुप्त ऋतु की पुकार, हर पलकपात कोई प्रणव है। वह वासना नहीं वह विरह के बाद का विशुद्ध स्पर्श है। वह रति में नहीं, रति से पहले की प्रतीक्षा में सुंदर है। वह मिलन की क्षणिक आह नहीं, बल्कि मिलन की पूर्णाहुति है। उसकी नाभि में कोई आभूषण नहीं, फिर भी वह नाभि कोई ज्योतिरलिंग है जहाँ एक ब्रह्मांड स्त्री होकर घूमता है। उसकी कटि वह वह घाट है, जहाँ कोई प्रेयसी होकर नहाता नहीं, बल्कि देह को त्यागता है। वह स्वप्न नहीं, स्वप्नों की वह रेखा है जो जागते समय भी आँखों में जलती है। उसकी जंघाएँ कोई श्रृंगार नहीं, चेतना की सीढ़ियाँ हैं, जिनसे चढ़कर कोई प्रिय उसके भीतर के देवालय में प्रवेश करता है। वह कोई रूपवती नहीं, क्योंकि उसका रूप कोई रंग नहीं एक अर्थ है। वह नायिका नहीं, क्योंकि नायिका होना केवल अभिनय है वह तो अधिनायिका है, जो स्वयं अपनी कथा रचती है, निभाती है, और विसर्जित कर देती है। वह जल में उतरती है, तो जल में गंध आ जाती है। वह चंदन नहीं लगाती, फिर भी देह से कोई अग्नि का सुवास उठता है। वह मंदिर नहीं जाती क्योंकि वह स्वयं एक चलायमान देवालय है। उसकी चाल में चित्त चंचल नहीं होता, बल्कि स्थिर हो जाता है जैसे किसी योगी को सहसा साक्षात्कार हो जाए। वह गुप्त है क्योंकि उसका प्रेम सस्ता नहीं, उसकी देह उपलब्ध नहीं, और उसकी आत्मा अशांत नहीं। वह वह स्त्री है, जिसे पाना संभव नहीं, और जिसमें विलीन होना अपरिहार्य। गुप्तगामिनी कोई नाम नहीं, कोई उपाधि नहीं वह एक स्त्री के भीतर की वह शाश्वत रात्रि है, जो हर युग में, हर देह में, हर प्रणय में अस्तित्व का सबसे सुंदर रहस्य बनकर उतरती है| -अजेष्ठ

तुम्हें प्रेम नहीं करना चाहिए

ऐसी स्त्री से

जो बाहर से शांत, पर भीतर से तूफानों से घिरी हो जिसकी आंखों में ठहरी हुई नमी किसी अधूरी दास्तान की गवाही देती हो उसकी मुस्कान के पीछे एक लंबी, गहरी चुप्पी छिपी रहती हो जिसने हर हंसी से पहले अपने आंसुओं को रोका हो। तुम्हें प्रेम नहीं करना चाहिए ऐसी स्त्री से क्योंकि अगर उसने तुम्हें चाह लिया, उसकी चाहत साधारण नहीं रहेगी तुम्हें अपना संपूर्ण आकाश बना लेगी, और खुद एक नक्षत्र की तरह तुम्हारी परिक्रमा करती रहेगी वो अपनी टूटी किरचियों को तुम्हारे स्पर्श से जोड़ने लगेगी, हर अधूरी दुआ में तुम्हारा नाम बुन देगी, तुम्हारे हर शब्द में एक ब्रह्मांड खोज लेगी। वो तुम्हें सिर्फ चाहेगी नहीं वो तुम्हें जीने लगेगी, तुम्हारे मौन में भी संवाद सुनेगी तुमसे दूर होकर भी तुम्हारे पास होने का भ्रम पाल लेगी। वो भूल जाएगी सब कुछ अपने जख्मों की सभी वजह को और तुम्हें अपना मरहम मान लेगी तुम उसकी अंधेरी दुनिया के सूरज बन जाओगे वह रौशनी से जगमगा उठेगी अगर तुमने, उस प्रेम की गहराई को न समझा उसके समर्पण की भाषा न पढ़ सके, तो याद रखना इस संसार में तुमसे बड़ा अभागा कोई नहीं!! ~ सदफ इक़बाल

"हम देखेंगे"

हम देखेंगे, ज़रूर देखेंगे। वह दिन ज़रूर आएगा, जिसका वादा किया गया है, जो समय की शुरुआत से ही तय है। जब अत्याचार और ज़ुल्म के बड़े-बड़े...