कैंची धाम, सिप्रा नदी के किनारे बसा बाबा का घर। जैसे ही नजर कैंची धाम पर पड़ी, ऐसा लगा जैसे बरसों बाद अपने दादा के घर लौट आई हूँ। आँखें भर आईं — किसी बिछड़े अपने से लंबे अरसे बाद मिलने जैसा एहसास था। मंदिर के सामने से गुजरी तो सुबह की आरती हो रही थी। मन में था कि जल्दी से नहा-धोकर बाबा के दर्शन कर लूँगी, पर ऐसा हो न सका। होटल चेक-इन में ही दो घंटे लग गए, क्योंकि मैं तय समय से चार घंटे पहले ही पहुँच गई थी।
दर्शन यात्रा शुरू हुई। गाइड ने कहा — पहले भूमियाधार
हनुमान मंदिर चलते हैं, फिर हनुमान गढ़ी, उसके बाद ककड़ीघाट और अंत में कैंची धाम।
मैं सहर्ष राजी हो गई। सुबह कैंची धाम को देखकर ही मानो बाबा के दर्शन हो चुके थे,
मन वहीं अटका था।
हमारी सवारी कुमाऊँ की घाटियों से होकर गुजरी — कहीं भीड़
से टकराते, कहीं गाड़ियों के जाम से जूझते। सबसे पहले पहुँचे भूमियाधार हनुमान मंदिर,
जो बाबा द्वारा
स्थापित है और हाईवे किनारे बना है। ज़्यादा भीड़ नहीं थी, मंदिर खाली था।
हनुमान जी को प्रणाम किया — वैसे उनसे मेरी बहुत नहीं बनती, पता नहीं क्यों।
फिर सवारी पहुँची हनुमान गढ़ी, जो बाबा द्वारा
स्थापित दूसरा हनुमान मंदिर है। यहाँ कुछ भीड़ थी और बारिश भी डराने लगी थी। अंदर
मंदिर में हनुमान जी के हृदय में राम-सीता विराजमान बहुत बड़ी मूर्ति है — मंदिर
बेहद सुंदर। दर्शन किए, एक बार हनुमान चालीसा का पाठ किया, और मन में सोचा —
"हनुमान जी, अब से हम दोस्त हैं, हमारी दोस्ती हो
गई है, अब सब ठीक है।" थोड़ी देर ध्यान में बैठी ही थी कि तेज बारिश शुरू हो गई।
बारिश की आवाज़ कानों को सुकून दे रही थी, मानो कोई कह रहा हो — "अभी मत
जाओ... रुक जाओ।" मैं रुकी, बारिश रुकी, और फिर आगे का सफर शुरू हुआ।
अब बारी थी कैंची धाम की। जब पहुँचे तो देखा भीड़ कम है।
दर्शन के लिए उतरी, लोगों से पूछा — क्या मंदिर में पूजा होती है? पता चला, कोई पूजा नहीं
होती, प्रसाद भी सिर्फ बाबा को दूर से दिखाकर वापस ले जाना होता है। न कोई प्रसाद
खरीदा, सीधे दर्शन के लिए पंक्ति में लग गई। सब पंक्ति में
चलते जा रहे थे, पीछे से आवाज़ आ रही थी — "जल्दी चलो, जल्दी चलो" —
जैसे मैं कोई भीड़ का हिस्सा भर हूँ। मंदिर प्रशासन बस यही चाहता था कि भीड़
जल्दी-जल्दी निकल जाए।
सबसे पहले माँ वैष्णो देवी के दर्शन हुए, वहाँ हनुमान
चालीसा का पाठ चल रहा था। आगे हनुमान जी का मंदिर, और फिर सामने बाबा
की विशाल पालथी मारे हुए मूर्ति दिखी। एक पंडा और सुरक्षाकर्मी बोले जा रहे थे —
"जल्दी करो, जल्दी करो" — वहाँ एक पल रुककर बाबा से बात भी नहीं कर
सकते, न मंदिर में बैठकर पाठ कर सकते।
आगे बढ़ने पर माँ विंध्यवासिनी का मंदिर है। बाबा का वह आसन
भी सजाया गया था, जहाँ वे बैठा करते थे। मंदिर से बाहर निकलते ही पास में एक
खुली जगह है, जहाँ लोग मंदिर की तस्वीरें खींचते मिलते हैं। मैं भी वहीं चली गई। सामने से
बाबा की मूर्ति के दर्शन हुए, और मैं रेलिंग पकड़कर धीरे-धीरे बाबा से बातें करने लगी —
जो भी मन में था, सब कह डाला, जो शायद किसी और से नहीं कह सकती थी। और फिर रोने लगी...
कुछ देर रोने के बाद, मैं आगे के सफर के लिए चल पड़ी।
बाबा के चौथे धाम, ककड़ीघाट पहुँची — शांत नदी के किनारे
बना मंदिर, जहाँ हनुमान जी स्थापित हैं। यहाँ लोग ध्यान कर सकते हैं, बैठकर पाठ किया
जाता है। मैं भी ध्यान में बैठ गई। वैसे मैं ध्यान में अच्छी नहीं हूँ, पर चिड़ियों की
आवाज़ के सिवा सब कुछ बहुत शांत था।
मेरी यह यात्रा मेरे लिए सब कुछ से भागकर कुछ नया करने की
कोशिश थी — बहुत सारा स्वार्थ भी साथ था, जैसा अक्सर सुना है कि जब सब कुछ खत्म-सा
लगे तो बाबा के दर्शन कर आओ, सब ठीक हो जाएगा। मैं भी स्वार्थ और इच्छाओं से भरकर बाबा
से मिली। बाबा के घर में बिताए कुछ पल ऐसे लगे कि भीतर सब शांत हो गया है। पर मेरा
स्वार्थ और इच्छा अब भी बाबा के चमत्कार को संदेह की नज़र से देखती है।
मैंने तय कर लिया है — यह आखिरी बार था किसी देव-देवता या
भगवान से कुछ माँगना। अगर यह यात्रा फलित नहीं हुई, तो अब मैं रुक
जाऊँगी — माँगने और उम्मीद करने की उस चाहत से, जो बार-बार मुझे
खाली हाथ लौटा देती है।
घर आकर फिर से वही सब शुरू हो गया — ज़िंदगी और जीना।

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