Tuesday, April 21, 2026

मेरी उम्मीद की पतंग- रिंकी राउत

 मेरी उम्मीद की पतंग

पतंग की डोर थामे, आसमान को तकने लगे थे,
ज़मीन से बंधे हाथ, ख़्वाबों की सीढ़ी चढ़ने लगे थे।

मेरी उम्मीद की पतंग, उड़ान जैसी हल्की थी,
उसकी डोर से दिल कुछ यूँ बंधा—जैसे रूह की स्याही थी।
सोचा था जहाँ तक नज़र जाए, वहीं अपना जहाँ होगा,
तेरे संग हर मोड़ पर मेरा भी एक निशाँ होगा।

अब मेरे हाथ छन्नी हैं—उसी डोर की रगड़ से,
हर उंगली में चुभन है तेरे छूट जाने की कसक से।
वो पतंग जो कभी मेरी साँसों के साथ उड़ा करती थी,
आज किसी और की हवा में, किसी और के संग सजा करती है।

उस डोर से बने निशान अब भी जलते रहते हैं,
खामोशी में भी तेरे होने के एहसास पलते रहते हैं।
हर लकीर में तेरी याद की चुभन बाकी है,
हर धड़कन में अधूरी सी कोई बात बाकी है।

मैं कितना भी भागूँ उस एहसास की परछाइयों से,
वो कटी हुई पतंग बन लौट आती है हवाओं से।
हर रात मुझे पागल सा कर जाती है,
तेरी कमी को और गहरा कर जाती है।

ख़्वाब तो टूट गए, मगर डोर नहीं छूटी,
ये मोहब्बत है या सज़ा—समझ नहीं आती।
तू चला गया, मगर तेरा असर नहीं जाता,
ये दिल हर रोज़ टूटता है… मगर मर नहीं पाता।



रिंकी राउत

Monday, April 13, 2026

जो जीते हैं, वही-न-ख़ुद का दफ्तर है मुश्किल में कहीं का दफ्तर है-जौन एलिया

 पढ़ रहा हूँ मैं कागज़ों-बसूदा

और नहीं और है का दफ्तर है

कोई सोचे तो सोचे कैसे जीएँ
सारा दफ्तर ग़मों का दफ्तर है

हमसे कोई तो करे इशारा
कि ज़मीं, आसमाँ का दफ्तर है

हुए तालों-जैसे-जैसे जीएँ
वक्त, जिस्म और जाँ का दफ्तर है

जो जो दफ्तर है आसमानी तरह
वो मियाँ जी यहाँ का दफ्तर है

जो हक़ीक़त है, हम उसे क्यों ढूँढ़ें
वो तो इन बातों का दफ्तर है

जो रहा है ज़िंदगी भर का हिसाब
वो अदाओं का दफ्तर है

Thursday, April 9, 2026

अहमद फ़राज़

 एक दिन ऐसा हुआ,

वफ़ा पर बहस छिड़ गई।

मैंने इश्क़ को अमर कहा,
वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई।

मैं इश्क़ का क़ैदी था,
वो इश्क़ को एक क़ैदखाना कहती रही।

कि उम्र भर का साथ भी,
उसे चाहत से बदतर लगा।

पेड़ पत्थर नहीं होते…

Monday, March 30, 2026

जौन एलिया

 

जौन एलिया

एक एहसास हैं—जहाँ इंसान अपने ही विचारों में उलझा रहता है, रिश्तों की सच्चाई को समझने की कोशिश करता है, और भीतर से खुद को खोजता रहता है।

1.
मैं भी बहुत अजीब हूँ, इतना अजीब हूँ कि बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।

 

2.
इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ,
वर्ना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने।

 

3.
बहुत नज़दीक आती जा रही हो,
बिछड़ने का इरादा कर लिया है क्या?”

 

4.
शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई,
लेकिन यक़ीन सबको दिलाता रहा हूँ मैं।

 

5.
कौन इस घर की देखभाल करे,
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है।

 

6.
अब नहीं कोई बात ख़तरे की,
अब सभी को सभी से ख़तरा है।

 

7.
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो,
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो।

 

8.
हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ,
हैं कई हिज्र दरमियाँ जानाँ।

 

थोड़ा रुक जाओ- जौन एलिया

 थोड़ा रुक जाओ, अपने दिल की बात सुनो।

जल्दी मत करो, अभी समय है समझने का।

जैसे कच्चे आम को धीरे-धीरे चखते हैं,
वैसे ही जीवन को आराम से महसूस करो।

डरो मत कि तुम डूब जाओगे,
बस खुद में झाँको और ठहर जाओ।

अब तक तुम बाहर की दुनिया में उलझे रहे,
थोड़ा अपने अंदर भी देखो।

अपने दिल को अपने ही नाम कर दो,
और खुद को समझने की कोशिश करो।

जो लोग तुम्हें परेशान करते हैं, उनसे छिपने की जरूरत नहीं,
बस थोड़ा रुककर खुद को संभालो।

मेरी उम्मीद की पतंग- रिंकी राउत

  मेरी उम्मीद की पतंग पतंग की डोर थामे, आसमान को तकने लगे थे, ज़मीन से बंधे हाथ, ख़्वाबों की सीढ़ी चढ़ने लगे थे। मेरी उम्मीद की पतंग, उड़...