Tuesday, October 6, 2026

मेरी मुस्लिम नानी

 “तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?”

काउंटर के पीछे बैठे बाबू ने कागज़ को दोबारा देखा और फिर मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था, जैसे कागज़ में कोई बड़ी गड़बड़ी पकड़ ली हो।

“जी,” मैंने कहा।

“ये कैसे हो सकता है? तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?”

मैंने पहले तो सोचा कि शायद वह मज़ाक कर रहा है। लेकिन उसके चेहरे पर कोई मज़ाक नहीं था।

“क्यों नहीं हो सकता?” मैंने धीरे से पूछा।

उसने कागज़ मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “देखो, कुछ तो गलत है। ठीक से चेक करवाओ।”

मैंने सारे कागज़ एक बार फिर देखे। जन्म प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, बाकी दस्तावेज़—सब ठीक थे। मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “कागज़ तो सही हैं।”

वह कुर्सी पर पीछे टिक गया। “तुम हिंदू हो न?”

“जी।”

“और नानी मुस्लिम?”

“जी।”

उसने जैसे कोई बहुत मुश्किल सवाल पूछ लिया हो, उसी अंदाज़ में कहा, “फिर ये कैसे?”

मैं कुछ पल चुप रही। सच कहूँ तो मुझे समझ ही नहीं आया कि इसका जवाब क्या दूँ। मेरे लिए तो यह हमेशा से बिल्कुल सामान्य बात थी। मेरी माँ हिंदू थीं, उनकी माँ रज़िया थीं। बस इतना ही तो था।

मैंने कहा, “मेरी माँ हिंदू हैं और उनकी माँ मुस्लिम। इसमें गलत क्या है?”

वह झुंझला गया। “तुम लोग आजकल कुछ भी कह देते हो। नियम-कायदा भी कोई चीज़ होती है।”

मैंने उसकी बात काटी नहीं। बस धीरे से कहा, “नियम अगर कागज़ के हैं तो आप देख लीजिए। लेकिन रिश्तों के भी कोई नियम होते हैं क्या?”

वह मेरी तरफ देखने लगा।

शायद उसे मेरा सवाल पसंद नहीं आया। उसने गुस्से में कहा, “ज्यादा बहस मत करो। काम नहीं होगा तो बाहर जाओ।”

मेरे अंदर भी थोड़ी घबराहट थी, लेकिन इस बार जाने क्यों मुझे गुस्सा आ गया।

“काम आपको करना ही होगा,” मैंने कहा। “क्योंकि मेरे सारे कागज़ सही हैं। सिर्फ इसलिए कि मेरी नानी का नाम रज़िया है, आप उन्हें गलत नहीं कर सकते।”

फिर न जाने क्यों मुझे बचपन की एक बात याद आ गई। मैंने कहा, “अगर मेरी नानी का नाम रज़िया देवी होता, तो शायद आप कुछ नहीं पूछते। नाम के साथ ‘देवी’ जुड़ जाता तो सब ठीक हो जाता? नाम तो वही रहता न।”

वह चुप रहा।

मैंने आगे कहा, “जैसे किसी औरत का नाम अमेरिका देवी हो, तो इसका मतलब यह थोड़ी है कि वह अमेरिका की रहने वाली है।”

मेरी बात सुनकर वह कुछ नहीं बोला। शायद उसे मेरी बात अजीब लगी, लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल सीधी बात थी।

क्योंकि मैंने रज़िया को कभी मुस्लिम नानी की तरह देखा ही नहीं था।

मेरे लिए वह बस नानी थीं।

मुझे नहीं पता कि उन्होंने मुझे पहली बार गोद में कब लिया था। माँ बताती हैं कि उस समय मैं बहुत छोटी थी। मेरे पिता का तो मुझे ठीक से याद भी नहीं, और माँ भी बचपन में ही बहुत कुछ खो चुकी थीं। नानी ने ही माँ को संभाला था। उन्होंने माँ को अपने घर में रखा, पढ़ाया-लिखाया और बड़ा किया।

माँ कहती हैं कि नानी ने उन्हें कभी अपना धर्म छोड़ने के लिए नहीं कहा। नानी मुस्लिम थीं, माँ हिंदू थीं, लेकिन दोनों के बीच इस बात को लेकर कभी दीवार नहीं बनी।

जब माँ की शादी हुई तो नानी ही सबसे ज्यादा खुश हुई थीं। शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई। उन्होंने अपनी बेटी की शादी पूरे मन से की। रिश्तेदारों ने क्या कहा, उन्होंने कभी हमें नहीं बताया। बस इतना कहती थीं, “बेटी खुश रहे, इससे बड़ी बात क्या है?”

बचपन में मुझे इन बातों का कुछ पता नहीं था। मुझे तो बस इतना पता था कि जब मैं नानी के घर जाती थी तो मेरे लिए एक प्लेट में खाना पहले से लगा रहता था। नानी मेरी पसंद की चीज़ बनाती थीं और फिर खुद कहती थीं, “इतना मत खा, पेट खराब हो जाएगा।” और जब मैं उनकी बात नहीं मानती थी तो थोड़ी देर बाद चुपके से मेरे लिए मिठाई भी निकाल देती थीं।

मैंने कभी उनसे नहीं पूछा कि आप मुस्लिम हैं या हिंदू। मुझे इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी।

मेरी नानी ने मुझे कभी अपने जैसा बनने को नहीं कहा। उन्होंने मुझे बस अच्छा इंसान बनने को कहा था।

इसलिए उस दफ्तर में बैठे उस आदमी को जब मेरे कागज़ में रज़िया नाम देखकर परेशानी हुई, तो मुझे पहली बार लगा कि शायद दुनिया में कुछ लोगों के लिए रिश्तों से पहले धर्म आता है।

मैंने कागज़ उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “आपको जो जाँचना है, जाँच लीजिए। लेकिन मेरी नानी का नाम देखकर मेरे रिश्ते पर सवाल मत कीजिए। उन्होंने मेरी माँ को पाला है। उन्होंने मेरा बचपन देखा है। मेरे लिए वो मेरी नानी हैं। बस।”

इस बार मैंने ऊँची आवाज़ नहीं की।

वह आदमी भी कुछ देर तक चुप रहा। फिर उसने कागज़ लिए और फाइल में रख दिए।

“ठीक है,” उसने धीमे से कहा, “काम हो जाएगा।”

मैंने कुछ नहीं कहा। बस वहाँ से उठ गई।

बाहर निकलते हुए मेरे मन में एक ही बात थी—लोगों को रिश्ते समझाने के लिए भी कभी-कभी कागज़ दिखाने पड़ते हैं।

लेकिन मेरी नानी को किसी कागज़ की जरूरत नहीं थी।

उनके लिए मैं उनकी नातिन थी।

और मेरे लिए वह हमेशा से सिर्फ एक थीं—

मेरी नानी रज़िया।


Rinki

Friday, September 25, 2026

मेरे धागे लौटा दो, माधव

 मेरे धागे लौटा दो, माधव

1.

मेरे धागे लौटा दो माधव,
मेरी मन्नत अधूरी रह गई,
जिस आस में बाँधा था धागा,
वो आस कहीं दूर बह गई।

तेरे द्वार पर सिर झुकाकर,
सबसे छुपकर रोया था,
मन की सारी पीड़ा लेकर,
बस तुझसे ही कुछ माँगा था।

जो माँगा था दिल ने तुझसे,
वो सपना अधूरा रह गया

2.

मैं अपने धागे वापस नहीं लूंगी माधव। 
मेरा एक कर्ज तुम्हारे भी सर हमेशा रहेगा।
तुम्हारे दर से भी कोई खाली हाथ आता है, 
यह कलंक तुमको भी सहना पड़ेगी। 

Tuesday, September 1, 2026

रब की तलाश

पहला कदम था प्यार का,

दिल में जागी एक चाहत,

किसी का नाम मालूम न था,

बस मन में थी तड़प-इबादत।

फिर पास आने की आरज़ू जगी,

 याद में मिलने लगा सुकून,

 जब भी उससे दूर हुए,

 बेचैन हुआ मन, बढ़ा जुनून।

 

फिर ऐसा प्यार हुआ गहरा,

 कि खुद को हम भूल गए,

 जिसे चाहा, उसी में खोकर,

हर तरफ़ बस वही पाए।

 

फिर धीरे-धीरे "मैं" मिटने लगा,

 अहम का वजूद गुम हो गया, जो बचा,

 वो सिर्फ़ वही था,

हर कतरा उसी में समा गया।

फिर आई वो मिलन की घड़ी,

 जिसे ढूँढा था हर राह-गुज़र,

 वो तो सदा ही पास खड़ा था,

 अपनी हर साँस के अंदर।

 

उस अद्भुत मिलन को देखकर,

हैरान खड़ी रह गई नज़र,

कोई शब्द न बयाँ कर पाया,

सब समझ से परे था वो मंज़र।

 

आख़िर में मन शांत हो गया,

सदा के लिए उसी में बस गया,

 खुद को मिटाकर सब कुछ पाया,

सच्चा रब प्यार में मिल गया।

 Rinki 

Wednesday, August 12, 2026

दो अजनबी

 फ़ोन बजा। बूढ़े ने "हैलो" कहा।

सामने से एक लड़का बोला, "सर, अकाउंट ब्लॉक हो जाएगा, अभी वेरिफाई करना पड़ेगा।"

बूढ़े ने धीरे से कहा, "बेटा मुझे ये सब नहीं आता। मेरे बच्चे शाम को आएँगे, तब बात करना। मैं अस्सी साल का हूँ, कैंसर का मरीज़ हूँ।"

फ़ोन पर कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर लड़के की आवाज़ आई, "सर... माफ़ करना। मैं फ्रॉड करने के लिए फ़ोन किया था।"

बूढ़ा चुप रहा, फिर पूछा, "क्यों करते हो बेटा ये सब? इतने ईमानदार लगते हो।"

लड़का रुक गया। फिर बोला, "माँ को कैंसर है सर। इलाज के लिए पैसे नहीं हैं।"

इतना कहते ही वो रो पड़ा।

फ़ोन के दूसरी तरफ़ बूढ़ा भी रोने लगा।

दो अजनबी, जिन्हें एक-दूसरे का नाम भी नहीं पता था, फ़ोन पर अपना-अपना दर्द बाँट रहे थे। 

Monday, August 3, 2026

मैं अधूरे इश्क़ की दरगाह पर नहीं झुकती

 

तेरी मोहब्बत अगर
पूरी इबादत नहीं,
तो मैं उस सजदे से उठ जाती हूँ।

क्योंकि आधा प्रेम
ख़ुदा तक नहीं पहुँचता,
वो बस दिल को
थका देता है।

तुझसे जुदा होना
कोई हार नहीं,
ये तो मेरी रूह का
वुज़ू है।
तेरे पास रहकर
खुद को गँवा देना—
ये इश्क़ नहीं,
ये ग़फ़लत है।

मुझे वो आग चाहिए
जो जला कर ख़ाली करे,
वो नहीं
जो सुलगाकर
राख में बाँध दे।

अगर तू मुकम्मल नहीं,
तो मेरा दूर जाना ही
मेरी इबादत है।
क्योंकि अधूरा इश्क़
रूह को
टुकड़ों में बाँट देता है।

तेरा न होना
मेरे आधा होने से बेहतर है।
ख़ाली होना
टूटने से बेहतर है।

मैं ख़ुद को
उस ख़ामोशी में सौंपती हूँ
जहाँ कोई नाम नहीं,
कोई दावा नहीं—
सिर्फ़ सच है।

और सच ये है—
जो प्रेम मुझे ख़ुदा तक न ले जाए,
उसे मैं
इश्क़ नहीं कहती।

मेरी मुस्लिम नानी

 “तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?” काउंटर के पीछे बैठे बाबू ने कागज़ को दोबारा देखा और फिर मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर ऐसा भ...