Thursday, June 21, 2018

तू जो कहे


तू उस आंसू की तरह
आँख में ही सुख जाए
वो गीत
मन जो गाता जाए
बात कुछ ऐसी
जो कही न जाए

वो फरियाद
जिससे जुडी मेरी आस
एक ऐसा राज
जो दफ़न हो मेरे साथ

तू जो कहे
ओढ़ लु तेरा ही रंग
तेरे नाम को पढू
आयत बना के
तुझे ही सिमरु
माला बना के

तू उस आंसू की तरह
आँख में ठहर जाए
सपनों की तरह
तू उस दुआ की तरह
जो कबूल हो जाए
किसी भी तरह

रिंकी

Saturday, May 26, 2018

लेखक और पाठक


मुलाकात हुई कुछ अपने जैसे
कलम से सपने उकेरने वाले
लेखकों से
 उन्हें  लाइब्रेरी के
हर कोने में देखा मैंने
जो खुशनसीब थे
वो पुस्तक प्रेमियों के हाथ में
सजे मिले
 कुछ ऐसे भी थे
जो लाइब्रेरी  के गलियारे
के अलमारी में रखे  मिले
मुसकुरा रहे थे
इस उम्मीद में कोई
पढ़े उन्हें
 उस लाइब्रेरी में एक कमरा था
कुछ लेखक वह भी खड़े मिले
धुल जमी थी उन पर
बदरंग से हुए पड़े
 कोई पढ़े उन्हें भी इसी
सोच में वो धुल खाते रहे  
कुछ को तो दीमक खा रहे थे
वो तिल-तिल
पाठकों के इंतजार में मर रहे थे
 है लेखक पाठक का रिश्ता ऐसा
दीया बाती के जैसा

रिंकी





Friday, May 11, 2018

दोस्त पुराने


न जाने कितने दिनों के बाद
कुछ दोस्तों से मुलाकात हुई
मैं देखती उन्हें
छूती उन्हें
आँखों से पढ़ती
यादों के पन्नों को
उंगलियों को
गीली कर पन्ने-पन्ने दर
पलटती रही



घर की अलमारी में
रखी
पुरानी किताबों

कुछ इस तरह
आज बात हुई



रिंकी


Sunday, May 6, 2018

फितरत

इस दुनिया को देख कर
हर रोज़ हेरान होती हूँ
दुनिया के बदलते अंदाज़ से
घटते-बढ़ते
ज्वर-भट्टा सी फितरत से
हेरान होती हूँ
 
मेरा जिस्म तो नहीं  थका
लेकिन अन्दर कुछ मुरझा गया
मैं रुकना, चलना या दौड़ना
नहीं चाहती

कुछ देर के लिए मैं
कुछ नहीं होना चाहती
सिर्फ आजाद होना चाहती हूँ

इस “मैं” में लिपटी
दुनिया को देखकर और
हैरान नहीं होना चाहती
कुछ देर के लिए मैं
सिर्फ आजाद होना चाहती हूँ

 
 
रिंकी

Thursday, April 12, 2018

हम दोनों के बीच सब ठीक है


हुए कई साल देखे बिना तुझे
मेरा इंतजार अब भी नया और
उदासी से बहुत दूर है
मिलने के उम्मीद को समेटे
रोज़ शाम और रात को ताक रहा
दूरियां है तो क्या हुआ
हम दोनों के बीच सब ठीक है
बातो का सिलसिला नहीं है तो क्या
शब्द ने एक दूसरे को छुया नहीं
तो क्या
हम एक दूसरे से शिकायत
बिना बोले ही करते रहते है
अल्फाजों में हम बंधे नहीं तो क्या हुआ
हम दोनों के बीच सब ठीक है


Rinki


Monday, April 9, 2018

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ


दुष्यंत कुमार द्वारा लिखित अतुल्य ग़ज़ल

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ 
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ
 एक जंगल है तेरी आँखों में 
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ 
तू किसी रेल सी गुज़रती है 
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ 
हर तरफ़ एतराज़ होता है 
मैं अगर रौशनी में आता हूँ 
एक बाज़ू उखड़ गया जब से 
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ 
मैं तुझे भूलने की कोशिश में 
आज कितने क़रीब पाता हूँ 
कौन ये फ़ासला निभाएगा 
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ 

- दुष्यंत कुमार      

तू जो कहे

तू उस आंसू की तरह आँख में ही सुख जाए वो गीत मन जो गाता जाए बात कुछ ऐसी जो कही न जाए वो फरियाद जिससे जुडी मेरी आस ...