Monday, June 8, 2026

शर्मिंदगी है हमको बहुत हम मिले तुम्हें- जॉन एलिया

 

मुझे इस बात की शर्म है कि मैं तुम्हारी ज़िंदगी में आया।

तुम पूरी तरह खुशियों से भरे हुए थे,

लेकिन मेरी वजह से तुम्हें दुःख भी मिले।

मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं कि

मैं खुद को पूरी तरह समझ नहीं पाया,


अफ़सोस तो इस बात का है

कि तुम भी अपने आप को पूरा नहीं पा सके।

अगर हमारे रिश्ते का हिसाब लगाया जाए,
तो मुझे शर्म आती है कि

 

मैं बार-बार तुम्हारी ज़िंदगी में आया और तुम्हें तकलीफ़ें मिलीं।

तुम अपने ख़्वाबों और तमन्नाओं की दुनिया में क्या तलाश रहे थे,
मैं भी जब तुम्हें मिला तो बिखरा हुआ और उलझा हुआ मिला।

काश तुम किसी और के नहीं,
बल्कि अपने ही सहारे मज़बूत और मुकम्मल बन सको।

 

इस छल-कपट और बहानों से भरी दुनिया में,
अगर मुझे कोई सच्चा हमदर्द मिले,
तो मेरी दुआ है कि वही सच्चा साथी तुम्हें भी मिले।

मैं तुम्हारे लिए सख़्त मिज़ाज होने की दुआ नहीं करता,
बल्कि चाहता हूँ कि तुम्हारा दामन हमेशा मोहब्बत,

एहसास और आँसुओं की नमी से भरा रहे।

 

मैं आज तक खुद को पूरी तरह समझ नहीं पाया,
न जाने मेरे दिल और शौक़ की कैसी-कैसी दुनिया तुमने देखी होगी।

तुमने मेरे दिल में बहुत लंबा सफ़र किया,
और मुझे शर्म है कि उस सफ़र में तुम्हें बहुत से ज़ख़्म मिले।

मेरी दुआ है कि मुझे कोई और हव्वा मिले,
और तुम्हें कोई ऐसा आदम मिले

जो तुम्हें मुझसे ज़्यादा समझ सके, ज़्यादा खुश रख सके।

 

कॉकरोच पार्टी - भीड़, पहचान और सोचने की शक्ति

 दुनिया में एक पुरानी कहावत है कि इंसान उन्हीं बातों पर सबसे अधिक प्रतिक्रिया देता है जिनसे वह स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करता है। शायद इसी कारण शब्दों की ताकत इतनी बड़ी होती है कि वे कभी प्रेरणा बन जाते हैं, तो कभी पहचान।

आज के भारत में "युवा" शब्द का ही उदाहरण ले लीजिए। सरकारी परिभाषाओं के अनुसार एक निश्चित उम्र तक का व्यक्ति युवा माना जाता है, लेकिन राजनीति में अक्सर पचास-पचपन वर्ष के नेताओं को भी युवा नेता कहा जाता है। ऐसे में युवापन अब उम्र नहीं, बल्कि एक सुविधाजनक विशेषण बन गया है।

इसी बीच सार्वजनिक जीवन में एक नया प्रतीक उभरकर सामने आया है—"कॉकरोच"। कहते हैं कि गधे का भी एक दिन आता है, तो शायद आजकल कॉकरोच का समय चल रहा है। किसी ने राष्ट्रीय मंच पर यह शब्द उछाल दिया। किसी दूसरे ने उसमें अवसर देख लिया और उसके नाम पर एक समूह खड़ा कर दिया। फिर देखते ही देखते ऐसे लोग, जो कल तक स्वयं को विचारशील और स्वतंत्र नागरिक मानते थे, उस पहचान को अपनाने लगे।

सबसे दिलचस्प बात यह नहीं कि किसी ने यह नाम दिया। असली प्रश्न यह है कि लोग उसे स्वीकार करने के लिए इतने उत्सुक क्यों हो गए?

यदि कोई आपको हाथी कह दे, तो क्या आप स्वयं को हाथी समझने लगेंगे? यदि कोई आपको शेर कहे, तो क्या आपके भीतर दहाड़ने की इच्छा जाग उठेगी? सामान्यतः ऐसा नहीं होना चाहिए। क्योंकि एक व्यक्ति की पहचान उसके विवेक, अनुभव और विचारों से बनती है, किसी और के दिए हुए लेबल से नहीं।

लेकिन राजनीति और जन-मन के खेल में लेबल बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इतिहास बताता है कि बड़े समूहों को प्रभावित करने के लिए अक्सर प्रतीकों, नारों और पहचानों का सहारा लिया जाता है। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने स्वतंत्र विचारों को किनारे रखकर उस पहचान का हिस्सा बन जाता है। वह सवाल पूछना छोड़ देता है और केवल प्रतिक्रिया देना सीख जाता है।

यही वह बिंदु है जहाँ भीड़ और नागरिक में अंतर पैदा होता है। नागरिक सोचता है, प्रश्न करता है, असहमति व्यक्त करता है और अपने निष्कर्ष स्वयं बनाता है। भीड़ केवल अनुसरण करती है।

संभव है कि कुछ प्रभावशाली लोग जानबूझकर ऐसी पहचानों को गढ़ते हों। संभव है कि उनका उद्देश्य समाज को विभाजित करना हो, या लोगों की ऊर्जा को किसी विशेष दिशा में मोड़ना हो। यह भी संभव है कि यह केवल एक राजनीतिक खेल हो। लेकिन जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह है कि क्या हम स्वयं सोच रहे हैं या केवल किसी और की बनाई हुई कहानी का हिस्सा बन रहे हैं।

हर इंसान के भीतर तर्क और विवेक का एक स्वतंत्र तंत्र होता है। वही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जब तक वह सक्रिय रहता है, तब तक व्यक्ति किसी भी भीड़, किसी भी नारे और किसी भी कृत्रिम पहचान का अंधानुकरण करने से बच सकता है।

लोकतंत्र की असली शक्ति भी यही है स्वतंत्र सोच। किसी समूह का हिस्सा बनना गलत नहीं है, लेकिन बिना सोचे-समझे किसी पहचान को अपना लेना निश्चित रूप से चिंताजनक है।

अंततः चुनाव हमारा अपना है। हम स्वयं को क्या मानते हैं, किस विचार के साथ खड़े होते हैं और किन बातों पर विश्वास करते हैं यह निर्णय हमें करना है। क्योंकि जब इंसान सोचना छोड़ देता है, तब वह नागरिक नहीं रह जाता, केवल भीड़ का एक हिस्सा बनकर रह जाता है।

बाकी आपकी मर्ज़ी है। आप स्वयं को जो चाहें समझ सकते हैं। लेकिन यह याद रखिए कि पहचान का सबसे मजबूत आधार किसी और का दिया हुआ नाम नहीं, बल्कि आपका अपना विवेक होता है।

Rinki

Wednesday, June 3, 2026

एक ही दिल — शैतान और मैं



कमरे में सन्नाटा था।

पंखा अपनी धीमी रफ्तार से घूम रहा था। उसकी हर परिक्रमा जैसे पिया की आंखों में उतर रही थी। वह बिस्तर पर बैठी उसे टकटकी लगाए देख रही थी। मन में एक ही ख्याल थाअगर अभी उठकर उस पंखे से झूल जाए तो शायद सब खत्म हो जाएगा।

लेकिन मौत के लिए भी हिम्मत चाहिए होती है।

सोचते-सोचते पूरी रात गुजर गई। खिड़की से आती सुबह की हल्की रोशनी ने कमरे को भर दिया, पर उसके भीतर का अंधेरा वैसा ही बना रहा।

भारी मन से वह ऑफिस के लिए तैयार हुई। रोज की तरह लोगों की हंसी, चाय की बातें, मीटिंग्स, फाइलेंसब कुछ चल रहा था। कभी यही माहौल उसे अच्छा लगता था। आज हर हंसी उसे अपने ऊपर तंज जैसी लग रही थी। शाम को घर लौटी तो दम घुटने लगा। वह बिना कुछ सोचे गंगा किनारे निकल गई।

मन में आया, इसी नदी में समा जाए। अपने सारे पाप, सारे दुख, इस जन्म और हर जन्म की थकान को इस पानी में डुबो दे।

तभी उसकी नजर सामने बने मां काली के मंदिर पर पड़ी।

उस मंदिर से उसका पुराना रिश्ता था।

जब भी लगता कि दुनिया खत्म हो गई है, जब भी किसी ने उसे तोड़ा है, वह यहीं आकर बैठती थी। मां से शिकायत करती थी। रोती थी। उनसे अपना बनाने की भीख मांगती थी।

लेकिन आज तक उसे समझ नहीं आया था कि मां ने उसे अपनाया भी है या नहीं।

वह मंदिर के एक कोने में बैठ गई।

आंखों से आंसू बह रहे थे।

दर्द इस बात का नहीं था कि कोई उसे छोड़कर किसी और से शादी कर गया।

दर्द यह था कि किसी ने उसका इस्तेमाल किया था।

उसके समय का,उसके पैसों का।

उसकी भावनाओं का।

उसकी ऊर्जा का।

और जब सब ले लिया, तब किसी और का हाथ पकड़कर चला गया।

पिया को खुद से घृणा होने लगी थी।

उसे समझ नहीं रहा था कि वह कैसे नहीं पहचान पाई कि वह आदमी पहले से किसी और से प्रेम करता था।

वह उसकी प्रेमिका नहीं थी।

वह बस एक दूसरी औरत थी।

मंदिर में आरती शुरू हो गई।

घंटियां बजने लगीं।

"जय मां काली!"

"जय मां काली!"

चारों ओर शोर था।

लेकिन उसी शोर के बीच पिया को किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देने लगी।

बहुत धीमी।

बहुत दर्द भरी।

पहले उसे लगा, मंदिर में कोई और महिला होगी।

फिर लगा, जैसे वह आवाज सिर्फ वही सुन पा रही है।

जैसे कोई उसके कान के बिल्कुल पास बैठकर रो रहा हो।

पिया ने कांपते हाथों से मां काली के सामने हाथ जोड़ दिए।

उसकी आंखों में अब आंसुओं से ज्यादा गुस्सा था।

"मां, अगर तुम मुझे अपनी बेटी नहीं मान सकती..."

"तो अपने यक्ष, यक्षिणी, डाकिनी, शाकिनी, भूत या शैतान से ही मिला दो।"

"मेरे भीतर अब जहर भर गया है।"

"अब मुझे किसी का प्रेम नहीं चाहिए।"

"मुझे शक्ति चाहिए।"

"इतने साल मैं तुम्हारे सामने कृपा मांगती रही।"

"आज मैं शैतान मांग रही हूं।"

"अपना तन, मन और आत्मा मैं उसे देती हूं..."

"और बदले में शक्ति मांगती हूं।"

इतना कहकर वह उठ गई।

उस रात जब वह घर लौटी, तो फिर उसी कमरे में चुपचाप बैठी रही।

दिन गुजरते गए।

कुछ नहीं हुआ।

कोई देवता आया।

कोई शैतान।

पिया को खुद पर हंसी आने लगी।

उसे लगने लगा कि जैसे भगवान ने भी उसे ठुकरा दिया और शैतान ने भी।

लेकिन अजीब बात यह थी कि उस दिन के बाद उसके भीतर एक अजीब शांति गई थी।

अब वह खुद को छोड़ी हुई नहीं समझती थी।

वह खुद को घायल समझती थी।

और घाव बदला मांग रहा था।

उसका प्रेम धीरे-धीरे नफरत में बदल गया।

नफरत जहर में।

और जहर एक अजीब ताकत में।

उसे लगने लगा कि अब खेल उसके हाथ में है।

उधर ऑफिस में उसका पुराना प्रेमी फिर उसके करीब आने की कोशिश कर रहा था।

शादी के बाद भी।

वह चाहता था कि पिया उसे स्वीकार कर ले।

उसकी बातें सुनकर पिया के भीतर घृणा का सैलाब उमड़ पड़ता।

अब वह उसे प्रेमी नहीं, दुश्मन समझती थी।

और खुद को मदारी।

वह मन ही मन कहती

"देखते हैं..."

"तुझे कैसे नचाती हूं।"

दिन गुजरते रहे।

लेकिन दर्द पूरी तरह नहीं गया।

कुछ जख्म ऊपर से भर जाते हैं।

अंदर से नहीं।

उस रात भी कुछ ऐसा ही हुआ।

पुरानी यादों ने अचानक दरवाजा खटखटा दिया।

पिया बिस्तर पर बैठी-बैठी फूट-फूटकर रोने लगी।

सांस भारी हो गई।

सीना दर्द से भर गया।

कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज थी।

और फिर...

उसे लगा जैसे कमरे में कोई और भी मौजूद है।

हवा अचानक ठंडी हो गई।

उसने आंसू पोंछे।

चारों तरफ देखा।

कोई नहीं था।

लेकिन उसके कान के पास किसी की धीमी फुसफुसाहट गूंजी।

इतनी धीमी कि जैसे हवा बोल रही हो।

"पिया..."

वह एकदम सिहर उठी।

उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

"कौन है?"

कमरे में कोई जवाब नहीं आया।

कुछ क्षण बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

इस बार और स्पष्ट।

"डरो मत..."

"मैं हूं..."

"तुम्हारे साथ।"

पिया की सांस रुक सी गई।

वह उठकर बैठ गई।

अंधेरे कमरे के कोने में उसे एक धुंधली परछाईं दिखाई दी।

वह इंसान जैसी थी।

लेकिन पूरी तरह इंसान नहीं।

और तभी वह आवाज मुस्कुराई

"तुमने उस रात शक्ति मांगी थी ..."

"मैं उसी प्रार्थना का उत्तर हूं।"

पिया की आंखें फैल गईं।

बाहर कहीं दूर कुत्ते भौंकने लगे।

कमरे की खिड़की अपने आप चरमराकर खुल गई।

और उस अंधेरे में पहली बार पिया को महसूस हुआ कि उसकी जिंदगी अब एक ऐसे रास्ते पर मुड़ चुकी है, जहां से लौटना शायद आसान नहीं होगा...

(क्रमशः)

 

शर्मिंदगी है हमको बहुत हम मिले तुम्हें- जॉन एलिया

  मुझे इस बात की शर्म है कि मैं तुम्हारी ज़िंदगी में आया। तुम पूरी तरह खुशियों से भरे हुए थे , लेकिन मेरी वजह से तुम्हें दुःख भी मिले। मुझ...