Wednesday, March 31, 2021

ख़ुद अपनी ही हर आहट पर- मजाज़ लखनवी

 

ख़ुद अपनी ही हर आहट पर

दिल धड़क उठता है ख़ुद अपनी ही हर आहट पर
अब क़दम मंज़िल-ए-जानाँ से बहुत दूर नहीं

दफ़्न कर सकता हूं सीने में तुम्हारे राज़ को
और तुम चाहो तो अफ़्साना बना सकता हूं मैं

वो मुझको चाहती है, और मुझ तक आ नहीं सकती
मैं उसको पूजता हूं, और उसको पा नहीं सकता

एक ही दिल है, कितनी बार टूटेगा-Rinki

  भाग – 1 रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। कमरे की हल्की पीली रोशनी में छत पर लगा पंखा लगातार घूम रहा था। वह बिस्तर पर चुपचाप लेटी हुई उसे देख...