Thursday, November 25, 2021

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई - गुलजार

 दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई

जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नजर में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।

मेरे धागे लौटा दो, माधव

  मेरे धागे लौटा दो, माधव 1. मेरे धागे लौटा दो माधव, मेरी मन्नत अधूरी रह गई, जिस आस में बाँधा था धागा, वो आस कहीं दूर बह गई। तेरे द्वार पर स...