“तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?”
काउंटर के पीछे बैठे बाबू ने कागज़ को दोबारा देखा और फिर मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था, जैसे कागज़ में कोई बड़ी गड़बड़ी पकड़ ली हो।
“जी,” मैंने कहा।
“ये कैसे हो सकता है? तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?”
मैंने पहले तो सोचा कि शायद वह मज़ाक कर रहा है। लेकिन उसके चेहरे पर कोई मज़ाक नहीं था।
“क्यों नहीं हो सकता?” मैंने धीरे से पूछा।
उसने कागज़ मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “देखो, कुछ तो गलत है। ठीक से चेक करवाओ।”
मैंने सारे कागज़ एक बार फिर देखे। जन्म प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, बाकी दस्तावेज़—सब ठीक थे। मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “कागज़ तो सही हैं।”
वह कुर्सी पर पीछे टिक गया। “तुम हिंदू हो न?”
“जी।”
“और नानी मुस्लिम?”
“जी।”
उसने जैसे कोई बहुत मुश्किल सवाल पूछ लिया हो, उसी अंदाज़ में कहा, “फिर ये कैसे?”
मैं कुछ पल चुप रही। सच कहूँ तो मुझे समझ ही नहीं आया कि इसका जवाब क्या दूँ। मेरे लिए तो यह हमेशा से बिल्कुल सामान्य बात थी। मेरी माँ हिंदू थीं, उनकी माँ रज़िया थीं। बस इतना ही तो था।
मैंने कहा, “मेरी माँ हिंदू हैं और उनकी माँ मुस्लिम। इसमें गलत क्या है?”
वह झुंझला गया। “तुम लोग आजकल कुछ भी कह देते हो। नियम-कायदा भी कोई चीज़ होती है।”
मैंने उसकी बात काटी नहीं। बस धीरे से कहा, “नियम अगर कागज़ के हैं तो आप देख लीजिए। लेकिन रिश्तों के भी कोई नियम होते हैं क्या?”
वह मेरी तरफ देखने लगा।
शायद उसे मेरा सवाल पसंद नहीं आया। उसने गुस्से में कहा, “ज्यादा बहस मत करो। काम नहीं होगा तो बाहर जाओ।”
मेरे अंदर भी थोड़ी घबराहट थी, लेकिन इस बार जाने क्यों मुझे गुस्सा आ गया।
“काम आपको करना ही होगा,” मैंने कहा। “क्योंकि मेरे सारे कागज़ सही हैं। सिर्फ इसलिए कि मेरी नानी का नाम रज़िया है, आप उन्हें गलत नहीं कर सकते।”
फिर न जाने क्यों मुझे बचपन की एक बात याद आ गई। मैंने कहा, “अगर मेरी नानी का नाम रज़िया देवी होता, तो शायद आप कुछ नहीं पूछते। नाम के साथ ‘देवी’ जुड़ जाता तो सब ठीक हो जाता? नाम तो वही रहता न।”
वह चुप रहा।
मैंने आगे कहा, “जैसे किसी औरत का नाम अमेरिका देवी हो, तो इसका मतलब यह थोड़ी है कि वह अमेरिका की रहने वाली है।”
मेरी बात सुनकर वह कुछ नहीं बोला। शायद उसे मेरी बात अजीब लगी, लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल सीधी बात थी।
क्योंकि मैंने रज़िया को कभी मुस्लिम नानी की तरह देखा ही नहीं था।
मेरे लिए वह बस नानी थीं।
मुझे नहीं पता कि उन्होंने मुझे पहली बार गोद में कब लिया था। माँ बताती हैं कि उस समय मैं बहुत छोटी थी। मेरे पिता का तो मुझे ठीक से याद भी नहीं, और माँ भी बचपन में ही बहुत कुछ खो चुकी थीं। नानी ने ही माँ को संभाला था। उन्होंने माँ को अपने घर में रखा, पढ़ाया-लिखाया और बड़ा किया।
माँ कहती हैं कि नानी ने उन्हें कभी अपना धर्म छोड़ने के लिए नहीं कहा। नानी मुस्लिम थीं, माँ हिंदू थीं, लेकिन दोनों के बीच इस बात को लेकर कभी दीवार नहीं बनी।
जब माँ की शादी हुई तो नानी ही सबसे ज्यादा खुश हुई थीं। शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई। उन्होंने अपनी बेटी की शादी पूरे मन से की। रिश्तेदारों ने क्या कहा, उन्होंने कभी हमें नहीं बताया। बस इतना कहती थीं, “बेटी खुश रहे, इससे बड़ी बात क्या है?”
बचपन में मुझे इन बातों का कुछ पता नहीं था। मुझे तो बस इतना पता था कि जब मैं नानी के घर जाती थी तो मेरे लिए एक प्लेट में खाना पहले से लगा रहता था। नानी मेरी पसंद की चीज़ बनाती थीं और फिर खुद कहती थीं, “इतना मत खा, पेट खराब हो जाएगा।” और जब मैं उनकी बात नहीं मानती थी तो थोड़ी देर बाद चुपके से मेरे लिए मिठाई भी निकाल देती थीं।
मैंने कभी उनसे नहीं पूछा कि आप मुस्लिम हैं या हिंदू। मुझे इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी।
मेरी नानी ने मुझे कभी अपने जैसा बनने को नहीं कहा। उन्होंने मुझे बस अच्छा इंसान बनने को कहा था।
इसलिए उस दफ्तर में बैठे उस आदमी को जब मेरे कागज़ में रज़िया नाम देखकर परेशानी हुई, तो मुझे पहली बार लगा कि शायद दुनिया में कुछ लोगों के लिए रिश्तों से पहले धर्म आता है।
मैंने कागज़ उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “आपको जो जाँचना है, जाँच लीजिए। लेकिन मेरी नानी का नाम देखकर मेरे रिश्ते पर सवाल मत कीजिए। उन्होंने मेरी माँ को पाला है। उन्होंने मेरा बचपन देखा है। मेरे लिए वो मेरी नानी हैं। बस।”
इस बार मैंने ऊँची आवाज़ नहीं की।
वह आदमी भी कुछ देर तक चुप रहा। फिर उसने कागज़ लिए और फाइल में रख दिए।
“ठीक है,” उसने धीमे से कहा, “काम हो जाएगा।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस वहाँ से उठ गई।
बाहर निकलते हुए मेरे मन में एक ही बात थी—लोगों को रिश्ते समझाने के लिए भी कभी-कभी कागज़ दिखाने पड़ते हैं।
लेकिन मेरी नानी को किसी कागज़ की जरूरत नहीं थी।
उनके लिए मैं उनकी नातिन थी।
और मेरे लिए वह हमेशा से सिर्फ एक थीं—
मेरी नानी रज़िया।
Rinki

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