Tuesday, October 6, 2026

मेरी मुस्लिम नानी

 “तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?”

काउंटर के पीछे बैठे बाबू ने कागज़ को दोबारा देखा और फिर मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था, जैसे कागज़ में कोई बड़ी गड़बड़ी पकड़ ली हो।

“जी,” मैंने कहा।

“ये कैसे हो सकता है? तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?”

मैंने पहले तो सोचा कि शायद वह मज़ाक कर रहा है। लेकिन उसके चेहरे पर कोई मज़ाक नहीं था।

“क्यों नहीं हो सकता?” मैंने धीरे से पूछा।

उसने कागज़ मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “देखो, कुछ तो गलत है। ठीक से चेक करवाओ।”

मैंने सारे कागज़ एक बार फिर देखे। जन्म प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, बाकी दस्तावेज़—सब ठीक थे। मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “कागज़ तो सही हैं।”

वह कुर्सी पर पीछे टिक गया। “तुम हिंदू हो न?”

“जी।”

“और नानी मुस्लिम?”

“जी।”

उसने जैसे कोई बहुत मुश्किल सवाल पूछ लिया हो, उसी अंदाज़ में कहा, “फिर ये कैसे?”

मैं कुछ पल चुप रही। सच कहूँ तो मुझे समझ ही नहीं आया कि इसका जवाब क्या दूँ। मेरे लिए तो यह हमेशा से बिल्कुल सामान्य बात थी। मेरी माँ हिंदू थीं, उनकी माँ रज़िया थीं। बस इतना ही तो था।

मैंने कहा, “मेरी माँ हिंदू हैं और उनकी माँ मुस्लिम। इसमें गलत क्या है?”

वह झुंझला गया। “तुम लोग आजकल कुछ भी कह देते हो। नियम-कायदा भी कोई चीज़ होती है।”

मैंने उसकी बात काटी नहीं। बस धीरे से कहा, “नियम अगर कागज़ के हैं तो आप देख लीजिए। लेकिन रिश्तों के भी कोई नियम होते हैं क्या?”

वह मेरी तरफ देखने लगा।

शायद उसे मेरा सवाल पसंद नहीं आया। उसने गुस्से में कहा, “ज्यादा बहस मत करो। काम नहीं होगा तो बाहर जाओ।”

मेरे अंदर भी थोड़ी घबराहट थी, लेकिन इस बार जाने क्यों मुझे गुस्सा आ गया।

“काम आपको करना ही होगा,” मैंने कहा। “क्योंकि मेरे सारे कागज़ सही हैं। सिर्फ इसलिए कि मेरी नानी का नाम रज़िया है, आप उन्हें गलत नहीं कर सकते।”

फिर न जाने क्यों मुझे बचपन की एक बात याद आ गई। मैंने कहा, “अगर मेरी नानी का नाम रज़िया देवी होता, तो शायद आप कुछ नहीं पूछते। नाम के साथ ‘देवी’ जुड़ जाता तो सब ठीक हो जाता? नाम तो वही रहता न।”

वह चुप रहा।

मैंने आगे कहा, “जैसे किसी औरत का नाम अमेरिका देवी हो, तो इसका मतलब यह थोड़ी है कि वह अमेरिका की रहने वाली है।”

मेरी बात सुनकर वह कुछ नहीं बोला। शायद उसे मेरी बात अजीब लगी, लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल सीधी बात थी।

क्योंकि मैंने रज़िया को कभी मुस्लिम नानी की तरह देखा ही नहीं था।

मेरे लिए वह बस नानी थीं।

मुझे नहीं पता कि उन्होंने मुझे पहली बार गोद में कब लिया था। माँ बताती हैं कि उस समय मैं बहुत छोटी थी। मेरे पिता का तो मुझे ठीक से याद भी नहीं, और माँ भी बचपन में ही बहुत कुछ खो चुकी थीं। नानी ने ही माँ को संभाला था। उन्होंने माँ को अपने घर में रखा, पढ़ाया-लिखाया और बड़ा किया।

माँ कहती हैं कि नानी ने उन्हें कभी अपना धर्म छोड़ने के लिए नहीं कहा। नानी मुस्लिम थीं, माँ हिंदू थीं, लेकिन दोनों के बीच इस बात को लेकर कभी दीवार नहीं बनी।

जब माँ की शादी हुई तो नानी ही सबसे ज्यादा खुश हुई थीं। शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई। उन्होंने अपनी बेटी की शादी पूरे मन से की। रिश्तेदारों ने क्या कहा, उन्होंने कभी हमें नहीं बताया। बस इतना कहती थीं, “बेटी खुश रहे, इससे बड़ी बात क्या है?”

बचपन में मुझे इन बातों का कुछ पता नहीं था। मुझे तो बस इतना पता था कि जब मैं नानी के घर जाती थी तो मेरे लिए एक प्लेट में खाना पहले से लगा रहता था। नानी मेरी पसंद की चीज़ बनाती थीं और फिर खुद कहती थीं, “इतना मत खा, पेट खराब हो जाएगा।” और जब मैं उनकी बात नहीं मानती थी तो थोड़ी देर बाद चुपके से मेरे लिए मिठाई भी निकाल देती थीं।

मैंने कभी उनसे नहीं पूछा कि आप मुस्लिम हैं या हिंदू। मुझे इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी।

मेरी नानी ने मुझे कभी अपने जैसा बनने को नहीं कहा। उन्होंने मुझे बस अच्छा इंसान बनने को कहा था।

इसलिए उस दफ्तर में बैठे उस आदमी को जब मेरे कागज़ में रज़िया नाम देखकर परेशानी हुई, तो मुझे पहली बार लगा कि शायद दुनिया में कुछ लोगों के लिए रिश्तों से पहले धर्म आता है।

मैंने कागज़ उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “आपको जो जाँचना है, जाँच लीजिए। लेकिन मेरी नानी का नाम देखकर मेरे रिश्ते पर सवाल मत कीजिए। उन्होंने मेरी माँ को पाला है। उन्होंने मेरा बचपन देखा है। मेरे लिए वो मेरी नानी हैं। बस।”

इस बार मैंने ऊँची आवाज़ नहीं की।

वह आदमी भी कुछ देर तक चुप रहा। फिर उसने कागज़ लिए और फाइल में रख दिए।

“ठीक है,” उसने धीमे से कहा, “काम हो जाएगा।”

मैंने कुछ नहीं कहा। बस वहाँ से उठ गई।

बाहर निकलते हुए मेरे मन में एक ही बात थी—लोगों को रिश्ते समझाने के लिए भी कभी-कभी कागज़ दिखाने पड़ते हैं।

लेकिन मेरी नानी को किसी कागज़ की जरूरत नहीं थी।

उनके लिए मैं उनकी नातिन थी।

और मेरे लिए वह हमेशा से सिर्फ एक थीं—

मेरी नानी रज़िया।


Rinki

Friday, September 25, 2026

मेरे धागे लौटा दो, माधव

 मेरे धागे लौटा दो, माधव

1.

मेरे धागे लौटा दो माधव,
मेरी मन्नत अधूरी रह गई,
जिस आस में बाँधा था धागा,
वो आस कहीं दूर बह गई।

तेरे द्वार पर सिर झुकाकर,
सबसे छुपकर रोया था,
मन की सारी पीड़ा लेकर,
बस तुझसे ही कुछ माँगा था।

जो माँगा था दिल ने तुझसे,
वो सपना अधूरा रह गया

2.

मैं अपने धागे वापस नहीं लूंगी माधव। 
मेरा एक कर्ज तुम्हारे भी सर हमेशा रहेगा।
तुम्हारे दर से भी कोई खाली हाथ आता है, 
यह कलंक तुमको भी सहना पड़ेगी। 

Tuesday, September 1, 2026

रब की तलाश

पहला कदम था प्यार का,

दिल में जागी एक चाहत,

किसी का नाम मालूम न था,

बस मन में थी तड़प-इबादत।

फिर पास आने की आरज़ू जगी,

 याद में मिलने लगा सुकून,

 जब भी उससे दूर हुए,

 बेचैन हुआ मन, बढ़ा जुनून।

 

फिर ऐसा प्यार हुआ गहरा,

 कि खुद को हम भूल गए,

 जिसे चाहा, उसी में खोकर,

हर तरफ़ बस वही पाए।

 

फिर धीरे-धीरे "मैं" मिटने लगा,

 अहम का वजूद गुम हो गया, जो बचा,

 वो सिर्फ़ वही था,

हर कतरा उसी में समा गया।

फिर आई वो मिलन की घड़ी,

 जिसे ढूँढा था हर राह-गुज़र,

 वो तो सदा ही पास खड़ा था,

 अपनी हर साँस के अंदर।

 

उस अद्भुत मिलन को देखकर,

हैरान खड़ी रह गई नज़र,

कोई शब्द न बयाँ कर पाया,

सब समझ से परे था वो मंज़र।

 

आख़िर में मन शांत हो गया,

सदा के लिए उसी में बस गया,

 खुद को मिटाकर सब कुछ पाया,

सच्चा रब प्यार में मिल गया।

 Rinki 

Wednesday, August 12, 2026

दो अजनबी

 फ़ोन बजा। बूढ़े ने "हैलो" कहा।

सामने से एक लड़का बोला, "सर, अकाउंट ब्लॉक हो जाएगा, अभी वेरिफाई करना पड़ेगा।"

बूढ़े ने धीरे से कहा, "बेटा मुझे ये सब नहीं आता। मेरे बच्चे शाम को आएँगे, तब बात करना। मैं अस्सी साल का हूँ, कैंसर का मरीज़ हूँ।"

फ़ोन पर कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर लड़के की आवाज़ आई, "सर... माफ़ करना। मैं फ्रॉड करने के लिए फ़ोन किया था।"

बूढ़ा चुप रहा, फिर पूछा, "क्यों करते हो बेटा ये सब? इतने ईमानदार लगते हो।"

लड़का रुक गया। फिर बोला, "माँ को कैंसर है सर। इलाज के लिए पैसे नहीं हैं।"

इतना कहते ही वो रो पड़ा।

फ़ोन के दूसरी तरफ़ बूढ़ा भी रोने लगा।

दो अजनबी, जिन्हें एक-दूसरे का नाम भी नहीं पता था, फ़ोन पर अपना-अपना दर्द बाँट रहे थे। 

Monday, August 3, 2026

मैं अधूरे इश्क़ की दरगाह पर नहीं झुकती

 

तेरी मोहब्बत अगर
पूरी इबादत नहीं,
तो मैं उस सजदे से उठ जाती हूँ।

क्योंकि आधा प्रेम
ख़ुदा तक नहीं पहुँचता,
वो बस दिल को
थका देता है।

तुझसे जुदा होना
कोई हार नहीं,
ये तो मेरी रूह का
वुज़ू है।
तेरे पास रहकर
खुद को गँवा देना—
ये इश्क़ नहीं,
ये ग़फ़लत है।

मुझे वो आग चाहिए
जो जला कर ख़ाली करे,
वो नहीं
जो सुलगाकर
राख में बाँध दे।

अगर तू मुकम्मल नहीं,
तो मेरा दूर जाना ही
मेरी इबादत है।
क्योंकि अधूरा इश्क़
रूह को
टुकड़ों में बाँट देता है।

तेरा न होना
मेरे आधा होने से बेहतर है।
ख़ाली होना
टूटने से बेहतर है।

मैं ख़ुद को
उस ख़ामोशी में सौंपती हूँ
जहाँ कोई नाम नहीं,
कोई दावा नहीं—
सिर्फ़ सच है।

और सच ये है—
जो प्रेम मुझे ख़ुदा तक न ले जाए,
उसे मैं
इश्क़ नहीं कहती।

Monday, July 27, 2026

"हम देखेंगे"

हम देखेंगे,

ज़रूर देखेंगे।

वह दिन ज़रूर आएगा,
जिसका वादा किया गया है,
जो समय की शुरुआत से ही तय है।

जब अत्याचार और ज़ुल्म के
बड़े-बड़े पहाड़
रूई की तरह उड़ जाएँगे।

जब शोषित और दबे हुए लोगों के कदमों से
धरती ज़ोर-ज़ोर से काँपेगी।

और सत्ता में बैठे लोगों के सिर पर
बिजली गरजेगी।

जब ईश्वर के घर से
हर तरह की झूठी पूजा और अन्याय के प्रतीक
हटा दिए जाएँगे।

जो लोग अब तक ठुकराए गए थे,
वही सम्मान के स्थान पर बैठाए जाएँगे।

सभी ताज उछाल दिए जाएँगे,
सभी सिंहासन गिरा दिए जाएँगे।

केवल सत्य और ईश्वर का नाम रहेगा,
जो हर जगह मौजूद है,
जिसे देखा भी नहीं जा सकता,
लेकिन जो सबको देखता है।

तब सच्चाई का नारा गूँजेगा—
"मैं ही सत्य हूँ।"

उस सत्य में मैं भी हूँ,
और तुम भी हो।

और इस धरती पर
जनता का राज होगा—
जिसमें मैं भी हूँ,
और तुम भी हो।

Sunday, July 26, 2026

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - "बोल"

 बोल, क्योंकि तुम्हारे होंठ अभी भी आज़ाद हैं।

बोल, क्योंकि तुम्हारी ज़ुबान अभी भी तुम्हारी अपनी है।

तुम्हारा यह सीधा और मज़बूत शरीर तुम्हारा है,
तुम्हारी जान भी अभी तुम्हारे पास है।

देखो, लोहार की भट्ठी में
आग की लपटें तेज़ हैं और लोहा लाल होकर तप रहा है।

अब ताले खुलने लगे हैं,
हर ज़ंजीर ढीली पड़ने लगी है।

बोल, यह थोड़ा-सा समय भी बहुत कीमती है,
इससे पहले कि शरीर और आवाज़ दोनों हमेशा के लिए शांत हो जाएँ।

बोल, क्योंकि सच अभी भी ज़िंदा है।
जो कुछ कहना है, निडर होकर कह डालो।

Tuesday, July 7, 2026

सूफी- कागा कागा रे

 कागा कागा रे

मोरी अरज तोसे

चुन चुन खइयो मास

कागा कागा रे


मोरी अरज तोसे

चुन चुना खाइयोमाच

अरजिया रे खाइयाँ ना तू नैना मोरे

खाइयाँ ना तू नैना मोहे


पिया के मिलन की

आस खाइयो ना तू नैना

मोहे पिया के मिलन की आस

खाइयो ना तू नैना मोरे खाइयो ना तू नैना मो रे बाकी की पूरी बॉडी खा ले लेकिन मेरे नैना मत खाना क्योंकि मुझे पिया के मिलन की आस हैं ,मुझे आस है, उम्मीद है कि मेरा पिया मुझसे मिलने आएगा और उस टाइम में उसका दीदार कर सकूं इसके लिए मुझे अपनी आंखें चाहिए और यहां पे पिया मतलब कोई गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड की बात नहीं चल रही है ये लाइंस ओरिजनली लिखी थी बाबा फरीद ने जो एक पंजाबी सूफी थे उनकी कुछ लाइन गुरु ग्रंथ साहिब में भी लिखी गई हैं,तो उसने लिखा था कि कागा सब तन खाइयो चुनचुन खाइयो मास दो नैनों को मत खाइयो पिया मिलन की आस सूफिज्म में पिया मतलब ईश्वर रब अल्लाह खुदा को बोला जाता है जैसे हम बोलते हैं ना पिया हाजी अली पिया हाजी अली तो इन लाइंस में भी उसी पिया का जिक्र है उसके दीदार की बात कर रही है कि भले ही मैं मर जाऊं मेरी पूरी बॉडी खा ले लेकिन आंखें मत खाना हो सकता है कि मरने के बाद जब वो मेरे सामने आए तो मैं उसका दीदार कर सकूं इसलिए मेरी आंखें छोड़ देना।

Monday, July 6, 2026

गुप्तगामिनी – वह जो रात्रि की रेखा पर चलती है

 

वह चलती नहीं वह सरकती है, जैसे चंद्रमा की रेखा सरकती हो शांत जल पर। उसकी गति में कोई शब्द नहीं, कोई संकोच नहीं वह स्त्री है, पर कोई साधारण नारी नहीं, वह गुप्तगामिनी है जो अपने देह को वस्त्र नहीं, मंत्र की भाँति पहनती है। उसकी देह कोई उद्घोष नहीं करती, वह मौन की मृदुलता से सजी है। वह लज्जा की रेखा पर नहीं, गर्व की गहराई पर खड़ी है एक ऐसी स्त्री, जो प्रेम को छिपाकर नहीं रखती, बल्कि उसे सहेजकर अपने भीतर जलाती है जैसे कोई अखंड दीप। उसके बालों में रात उलझी रहती है वे केशगुच्छ नहीं, तिमिर की तांत्रिक रस्सियाँ हैं। हर लट जैसे कोई रात्रिचर मंत्र, हर जूड़ा जैसे किसी प्रेम-पूजा की गांठ। वह जब चलती है, तो धरती पर कोई पदचिन्ह नहीं पड़ते क्योंकि वह केवल धरती पर नहीं, प्रेमी की स्मृति में चलती है। उसके अधर कोई निमंत्रण नहीं देते, किंतु उन्हें देख लेना ही किसी समाधि का प्रथम सोपान है। वह बोलती नहीं, पर उसके मौन में असंख्य आलिंगनों की आकांक्षा होती है। वह किसी अट्टहास की स्त्री नहीं वह उस मौन हँसी की नायिका है, जो रात्रि के तीसरे प्रहर में किसी प्रिय की नींद में उतर जाती है, जैसे कोई अनाम सुगंध। उसकी आँखें वे कोई दृष्टि नहीं देतीं, बल्कि स्पर्श का संकेत देती हैं। हर कटाक्ष किसी गुप्त ऋतु की पुकार, हर पलकपात कोई प्रणव है। वह वासना नहीं वह विरह के बाद का विशुद्ध स्पर्श है। वह रति में नहीं, रति से पहले की प्रतीक्षा में सुंदर है। वह मिलन की क्षणिक आह नहीं, बल्कि मिलन की पूर्णाहुति है। उसकी नाभि में कोई आभूषण नहीं, फिर भी वह नाभि कोई ज्योतिरलिंग है जहाँ एक ब्रह्मांड स्त्री होकर घूमता है। उसकी कटि वह वह घाट है, जहाँ कोई प्रेयसी होकर नहाता नहीं, बल्कि देह को त्यागता है। वह स्वप्न नहीं, स्वप्नों की वह रेखा है जो जागते समय भी आँखों में जलती है। उसकी जंघाएँ कोई श्रृंगार नहीं, चेतना की सीढ़ियाँ हैं, जिनसे चढ़कर कोई प्रिय उसके भीतर के देवालय में प्रवेश करता है। वह कोई रूपवती नहीं, क्योंकि उसका रूप कोई रंग नहीं एक अर्थ है। वह नायिका नहीं, क्योंकि नायिका होना केवल अभिनय है वह तो अधिनायिका है, जो स्वयं अपनी कथा रचती है, निभाती है, और विसर्जित कर देती है। वह जल में उतरती है, तो जल में गंध आ जाती है। वह चंदन नहीं लगाती, फिर भी देह से कोई अग्नि का सुवास उठता है। वह मंदिर नहीं जाती क्योंकि वह स्वयं एक चलायमान देवालय है। उसकी चाल में चित्त चंचल नहीं होता, बल्कि स्थिर हो जाता है जैसे किसी योगी को सहसा साक्षात्कार हो जाए। वह गुप्त है क्योंकि उसका प्रेम सस्ता नहीं, उसकी देह उपलब्ध नहीं, और उसकी आत्मा अशांत नहीं। वह वह स्त्री है, जिसे पाना संभव नहीं, और जिसमें विलीन होना अपरिहार्य। गुप्तगामिनी कोई नाम नहीं, कोई उपाधि नहीं वह एक स्त्री के भीतर की वह शाश्वत रात्रि है, जो हर युग में, हर देह में, हर प्रणय में अस्तित्व का सबसे सुंदर रहस्य बनकर उतरती है| -अजेष्ठ

तुम्हें प्रेम नहीं करना चाहिए

ऐसी स्त्री से

जो बाहर से शांत, पर भीतर से तूफानों से घिरी हो जिसकी आंखों में ठहरी हुई नमी किसी अधूरी दास्तान की गवाही देती हो उसकी मुस्कान के पीछे एक लंबी, गहरी चुप्पी छिपी रहती हो जिसने हर हंसी से पहले अपने आंसुओं को रोका हो। तुम्हें प्रेम नहीं करना चाहिए ऐसी स्त्री से क्योंकि अगर उसने तुम्हें चाह लिया, उसकी चाहत साधारण नहीं रहेगी तुम्हें अपना संपूर्ण आकाश बना लेगी, और खुद एक नक्षत्र की तरह तुम्हारी परिक्रमा करती रहेगी वो अपनी टूटी किरचियों को तुम्हारे स्पर्श से जोड़ने लगेगी, हर अधूरी दुआ में तुम्हारा नाम बुन देगी, तुम्हारे हर शब्द में एक ब्रह्मांड खोज लेगी। वो तुम्हें सिर्फ चाहेगी नहीं वो तुम्हें जीने लगेगी, तुम्हारे मौन में भी संवाद सुनेगी तुमसे दूर होकर भी तुम्हारे पास होने का भ्रम पाल लेगी। वो भूल जाएगी सब कुछ अपने जख्मों की सभी वजह को और तुम्हें अपना मरहम मान लेगी तुम उसकी अंधेरी दुनिया के सूरज बन जाओगे वह रौशनी से जगमगा उठेगी अगर तुमने, उस प्रेम की गहराई को न समझा उसके समर्पण की भाषा न पढ़ सके, तो याद रखना इस संसार में तुमसे बड़ा अभागा कोई नहीं!! ~ सदफ इक़बाल

Tuesday, June 30, 2026

रूमी और शम्स: वह प्रेम जिसने एक विद्वान को कवि बना दिया

"कुछ प्रेम कहानियाँ दो लोगों के मिलन की नहीं होतीं। वे एक आत्मा के जागने की कहानी होती हैं। रूमी और शम्स की कहानी भी ऐसी ही है।"

कल्पना कीजिए — एक आदमी जिसके पास सब कुछ है। ज्ञान, सम्मान, हज़ारों शिष्य, एक पूरे शहर की श्रद्धा। और फिर एक दिन, फटे कपड़ों में एक अजनबी बाज़ार से गुज़रता है... और उस आदमी की पूरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल जाती है।

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। यह रूमी और शम्स-ए-तबरीज़ की सच्ची कहानी है — एक ऐसी कहानी जिसने आठ सौ साल बाद भी दुनिया भर के करोड़ों दिलों को छुआ है।

तेरहवीं शताब्दी का कोन्या: जहाँ से कहानी शुरू होती है

तेरहवीं शताब्दी का दौर था। आज के तुर्की के शहर कोन्या में एक महान इस्लामी विद्वान रहते थे — मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद रूमी। दूर-दूर से लोग उनके प्रवचन सुनने आते थे। वे धर्मशास्त्र के गहरे ज्ञाता थे, सम्मानित शिक्षक थे, और हज़ारों शिष्यों के गुरु थे।

उनके पास ज्ञान था। प्रतिष्ठा थी। सम्मान था।

लेकिन उनके भीतर कहीं एक ऐसी प्यास थी, जिसका उन्हें खुद भी पता नहीं था। उन्हें लगता था कि उन्होंने जीवन को समझ लिया है — पर जीवन अभी उन्हें प्रेम का असली अर्थ सिखाने वाला था।

पहला अध्याय: एक अजनबी का आगमन

एक ठंडी दोपहर थी। बाज़ार में लोगों की चहल-पहल थी। उसी भीड़ में, फटे कपड़ों वाला एक दरवेश शहर में दाख़िल हुआ। उसका चेहरा धूप से तपा हुआ था, आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।

वह था — शम्स-ए-तबरीज़।

शम्स किसी किताब का आदमी नहीं था। वह अनुभव का आदमी था। उसने संसार देखा था — राजाओं के दरबार भी, और फ़कीरों की झोपड़ियाँ भी। उसे किसी पद, सम्मान या प्रसिद्धि से कोई लगाव नहीं था। वह बस एक ऐसे इंसान की तलाश में था, जिसके भीतर प्रेम की आग जलाने की क्षमता हो।

लोगों ने पूछा, "तुम किसे खोज रहे हो?"

शम्स ने जवाब दिया, "एक ऐसे दिल को, जो ईश्वर को जानता नहीं, बल्कि उससे प्रेम करता हो।"

वह पहली मुलाकात जिसने सब कुछ बदल दिया

जब शम्स की मुलाकात रूमी से हुई, तो कहा जाता है कि उसने एक सीधा सवाल पूछा — "मोहम्मद बड़े हैं या बायज़ीद बस्तामी?"

लोग यह सवाल सुनकर चौंक गए। रूमी ने जवाब दिया, "निस्संदेह, पैग़म्बर मुहम्मद।"

शम्स मुस्कुराए और बोले, "फिर ऐसा क्यों कि पैग़म्बर ने कहा — 'मैं तुझे वैसा नहीं जान पाया जैसा जानना चाहिए था।' और बायज़ीद ने कहा — 'मैं महान हूँ।'"

रूमी मौन हो गए।

शम्स ने समझाया, "जिसने ईश्वर को सचमुच जाना, वह स्वयं को छोटा समझने लगा। जिसने अपने अनुभव को ही अंतिम मान लिया, वह वहीं रुक गया।"

उस एक संवाद ने रूमी के भीतर वर्षों से बनी दीवारों में पहली दरार डाल दी।

दूसरा अध्याय: ज्ञान से प्रेम तक का सफ़र

उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया। रूमी ने अपने नियमित प्रवचन कम कर दिए। वे घंटों शम्स के साथ बैठते — कभी बात करते, कभी चुप रहते, कभी रोते, कभी हँसते।

शम्स ने उन्हें सिखाया — "ईश्वर को किताबों में मत खोजो। उसे अपने टूटे हुए दिल में खोजो।"

रूमी पहली बार समझ रहे थे कि प्रेम सिर्फ़ एक भावना नहीं, बल्कि आत्मा का संपूर्ण परिवर्तन है। उन्होंने लिखा — "जब तक तुम स्वयं को नहीं खोते, तब तक स्वयं को नहीं पाते।"

तीसरा अध्याय: दुनिया की नाराज़गी

लेकिन दुनिया प्रेम को कहाँ समझती है?

रूमी के शिष्य नाराज़ होने लगे। उन्हें लगा कि शम्स ने उनके गुरु को बदल दिया है। लोग फुसफुसाने लगे — "यह दरवेश जादूगर है," "इसने रूमी को हमसे दूर कर दिया।"

रूमी को इसकी कोई परवाह नहीं थी। वे कहते — "जिस प्रेम में लोग पागलपन न देखें, वह प्रेम अभी अधूरा है।"

चौथा अध्याय: बिछड़ने का दर्द

एक दिन शम्स अचानक चले गए। रूमी बेचैन हो उठे। उन्होंने हर शहर में उन्हें खोजा, दमिश्क तक गए, वर्षों तलाशते रहे।

कहते हैं, वे लौटे भी। लेकिन फिर एक दिन शम्स हमेशा के लिए ग़ायब हो गए। इतिहास आज तक यह नहीं बता पाया कि उनके साथ आख़िर क्या हुआ। कुछ कहते हैं उनकी हत्या हुई, कुछ कहते हैं वे स्वयं चले गए। सच शायद सिर्फ़ ईश्वर जानता है।

पाँचवाँ अध्याय: सबसे बड़ी खोज

शम्स के जाने के बाद रूमी टूट गए। दिनों तक रोते रहे। फिर एक रात उन्होंने महसूस किया — जिसे वे बाहर खोज रहे हैं, वह तो उनके भीतर ही जीवित है।

शम्स अब कोई व्यक्ति नहीं रहे थे। वे रूमी की चेतना बन चुके थे।

रूमी ने कहा — "मैंने अपने पहले प्रेमी को खोया नहीं। वह मेरी आत्मा बन गया।"

उस दिन के बाद उनकी कविताएँ जन्म लेने लगीं। उनके आँसू शब्द बन गए। उनकी तन्हाई संगीत बन गई।

छठा अध्याय: घूमता हुआ दरवेश

एक दिन रूमी बाज़ार से गुज़र रहे थे। किसी सुनार की दुकान से हथौड़े की लयबद्ध आवाज़ आ रही थी। उस लय में उन्हें लगा मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर का नाम जप रहा हो।

वे अचानक घूमने लगे — धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर और तेज़। एक हाथ आसमान की ओर, दूसरा धरती की ओर।

यहीं से सूफ़ियों का प्रसिद्ध घूमता हुआ नृत्य (समा) शुरू हुआ। उनके लिए यह नृत्य मनोरंजन नहीं, आत्मा की प्रार्थना था।

सातवाँ अध्याय: प्रेम का अंतिम अर्थ

रूमी ने कहा — प्रेम किसी को पा लेना नहीं है। प्रेम अपने भीतर के अहंकार को खो देना है। जिस दिन "मैं" समाप्त हो जाता है, उसी दिन प्रेम जन्म लेता है।

उन्होंने लिखा — "घाव वही स्थान है जहाँ से प्रकाश तुम्हारे भीतर प्रवेश करता है।"

और सचमुच — यदि रूमी शम्स से न मिले होते, तो शायद वे सिर्फ़ एक महान विद्वान बनकर रह जाते। लेकिन शम्स ने उन्हें कवि बना दिया, और उनकी कविताओं ने उन्हें अमर कर दिया।

रूमी की कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ (हिंदी भावानुवाद)

1. घाव घाव से मत डरो। वहीं से प्रकाश तुम्हारे भीतर प्रवेश करता है।

2. खोज मैं बुद्धिमान बनना चाहता था, इसलिए मैंने दुनिया बदलनी चाही। फिर प्रेम ने मुझे छुआ। अब मैं स्वयं को बदल रहा हूँ।

3. प्रेम प्रेम कोई भावना नहीं। प्रेम वह आग है, जिसमें 'मैं' जल जाता है और केवल 'तुम' बचते हो।

4. मौन मौन ही ईश्वर की भाषा है। बाकी सब केवल उसका कमजोर अनुवाद है।

5. आओ आओ... चाहे तुमने सौ बार अपने वचन तोड़े हों। चाहे तुम थके हुए हो, चाहे तुम निराश हो — यह प्रेम का द्वार है। यहाँ किसी से उसका अतीत नहीं पूछा जाता।

6. भीतर की यात्रा कल मैं चतुर था, इसलिए दुनिया बदलना चाहता था। आज मैं बुद्धिमान हूँ, इसलिए स्वयं को बदल रहा हूँ।

7. आत्मा तुम समुद्र की एक बूँद नहीं हो। तुम एक बूँद में समाया हुआ पूरा समुद्र हो।

उपसंहार: विवाह की रात

रूमी की मृत्यु 17 दिसंबर 1273 को हुई। उनके अनुयायी उस दिन को "शब-ए-अरूस" यानी "विवाह की रात" कहते हैं। उनका विश्वास था कि यह मृत्यु नहीं, बल्कि आत्मा का अपने प्रियतम — ईश्वर — से मिलन था।

आज, लगभग आठ सौ वर्षों बाद भी, रूमी की कविताएँ दुनिया की अनेक भाषाओं में पढ़ी जाती हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम केवल दो लोगों के बीच का संबंध नहीं होता — वह एक ऐसी अग्नि है जो मनुष्य के भीतर के अहंकार को भस्म कर देती है और उसे उसके वास्तविक स्वरूप से मिला देती है।

शायद इसीलिए रूमी की पूरी जीवन-यात्रा एक ही वाक्य में समा जाती है —

"जिसे तुम प्रेम समझते हो, वह केवल शुरुआत है; सच्चा प्रेम वह है जो तुम्हें बदल दे।"


अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो इसे उन लोगों के साथ ज़रूर साझा करें जो सच्चे प्रेम और आध्यात्मिक जागृति की कहानियाँ पसंद करते हैं।

साक्षात् के दर्शन — बाबा नीब करौरी महाराज


कैंची धाम, सिप्रा नदी के किनारे बसा बाबा का घर। जैसे ही नजर कैंची धाम पर पड़ी, ऐसा लगा जैसे बरसों बाद अपने दादा के घर लौट आई हूँ। आँखें भर आईं — किसी बिछड़े अपने से लंबे अरसे बाद मिलने जैसा एहसास था। मंदिर के सामने से गुजरी तो सुबह की आरती हो रही थी। मन में था कि जल्दी से नहा-धोकर बाबा के दर्शन कर लूँगी, पर ऐसा हो न सका। होटल चेक-इन में ही दो घंटे लग गए, क्योंकि मैं तय समय से चार घंटे पहले ही पहुँच गई थी।

दर्शन यात्रा शुरू हुई। गाइड ने कहा — पहले भूमियाधार हनुमान मंदिर चलते हैं, फिर हनुमान गढ़ी, उसके बाद ककड़ीघाट और अंत में कैंची धाम। मैं सहर्ष राजी हो गई। सुबह कैंची धाम को देखकर ही मानो बाबा के दर्शन हो चुके थे, मन वहीं अटका था।

हमारी सवारी कुमाऊँ की घाटियों से होकर गुजरी — कहीं भीड़ से टकराते, कहीं गाड़ियों के जाम से जूझते। सबसे पहले पहुँचे भूमियाधार हनुमान मंदिर, जो बाबा द्वारा स्थापित है और हाईवे किनारे बना है। ज़्यादा भीड़ नहीं थी, मंदिर खाली था। हनुमान जी को प्रणाम किया — वैसे उनसे मेरी बहुत नहीं बनती, पता नहीं क्यों।

फिर सवारी पहुँची हनुमान गढ़ी, जो बाबा द्वारा स्थापित दूसरा हनुमान मंदिर है। यहाँ कुछ भीड़ थी और बारिश भी डराने लगी थी। अंदर मंदिर में हनुमान जी के हृदय में राम-सीता विराजमान बहुत बड़ी मूर्ति है — मंदिर बेहद सुंदर। दर्शन किए, एक बार हनुमान चालीसा का पाठ किया, और मन में सोचा — "हनुमान जी, अब से हम दोस्त हैं, हमारी दोस्ती हो गई है, अब सब ठीक है।" थोड़ी देर ध्यान में बैठी ही थी कि तेज बारिश शुरू हो गई। बारिश की आवाज़ कानों को सुकून दे रही थी, मानो कोई कह रहा हो — "अभी मत जाओ... रुक जाओ।" मैं रुकी, बारिश रुकी, और फिर आगे का सफर शुरू हुआ।

अब बारी थी कैंची धाम की। जब पहुँचे तो देखा भीड़ कम है। दर्शन के लिए उतरी, लोगों से पूछा — क्या मंदिर में पूजा होती है? पता चला, कोई पूजा नहीं होती, प्रसाद भी सिर्फ बाबा को दूर से दिखाकर वापस ले जाना होता है। न कोई प्रसाद खरीदा, सीधे दर्शन के लिए पंक्ति में लग गई। सब पंक्ति में चलते जा रहे थे, पीछे से आवाज़ आ रही थी — "जल्दी चलो, जल्दी चलो" — जैसे मैं कोई भीड़ का हिस्सा भर हूँ। मंदिर प्रशासन बस यही चाहता था कि भीड़ जल्दी-जल्दी निकल जाए।

सबसे पहले माँ वैष्णो देवी के दर्शन हुए, वहाँ हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। आगे हनुमान जी का मंदिर, और फिर सामने बाबा की विशाल पालथी मारे हुए मूर्ति दिखी। एक पंडा और सुरक्षाकर्मी बोले जा रहे थे — "जल्दी करो, जल्दी करो" — वहाँ एक पल रुककर बाबा से बात भी नहीं कर सकते, न मंदिर में बैठकर पाठ कर सकते।

आगे बढ़ने पर माँ विंध्यवासिनी का मंदिर है। बाबा का वह आसन भी सजाया गया था, जहाँ वे बैठा करते थे। मंदिर से बाहर निकलते ही पास में एक खुली जगह है, जहाँ लोग मंदिर की तस्वीरें खींचते मिलते हैं। मैं भी वहीं चली गई। सामने से बाबा की मूर्ति के दर्शन हुए, और मैं रेलिंग पकड़कर धीरे-धीरे बाबा से बातें करने लगी — जो भी मन में था, सब कह डाला, जो शायद किसी और से नहीं कह सकती थी। और फिर रोने लगी... कुछ देर रोने के बाद, मैं आगे के सफर के लिए चल पड़ी।

बाबा के चौथे धाम, ककड़ीघाट पहुँची — शांत नदी के किनारे बना मंदिर, जहाँ हनुमान जी स्थापित हैं। यहाँ लोग ध्यान कर सकते हैं, बैठकर पाठ किया जाता है। मैं भी ध्यान में बैठ गई। वैसे मैं ध्यान में अच्छी नहीं हूँ, पर चिड़ियों की आवाज़ के सिवा सब कुछ बहुत शांत था।

मेरी यह यात्रा मेरे लिए सब कुछ से भागकर कुछ नया करने की कोशिश थी — बहुत सारा स्वार्थ भी साथ था, जैसा अक्सर सुना है कि जब सब कुछ खत्म-सा लगे तो बाबा के दर्शन कर आओ, सब ठीक हो जाएगा। मैं भी स्वार्थ और इच्छाओं से भरकर बाबा से मिली। बाबा के घर में बिताए कुछ पल ऐसे लगे कि भीतर सब शांत हो गया है। पर मेरा स्वार्थ और इच्छा अब भी बाबा के चमत्कार को संदेह की नज़र से देखती है।

मैंने तय कर लिया है — यह आखिरी बार था किसी देव-देवता या भगवान से कुछ माँगना। अगर यह यात्रा फलित नहीं हुई, तो अब मैं रुक जाऊँगी — माँगने और उम्मीद करने की उस चाहत से, जो बार-बार मुझे खाली हाथ लौटा देती है।

घर आकर फिर से वही सब शुरू हो गया — ज़िंदगी और जीना।

Friday, June 19, 2026

इसी से पहले अँधेरा मेरे अंदर से ख़त्म कर दे मुझे- Rinki

मेरी रूह के वीरान कमरों में कोई सहर भर दे मुझे।

तुम मुझे चाँद की तरह देखो, बेदाग़ न सही मगर अपना,
मेरी ख़ामोशियों को लफ़्ज़ दो, मेरी नज़रों को सपना।

ये दर्द मेरा घर बन जाए, तो फिर शिकायत भी कैसी,
हर ज़ख़्म में तेरी आहट हो, हर धड़कन रौशनी जैसी।
तुम क़ुबूल हुई दुआ बन जाओ मेरी तन्हा रातों की,
मैं सजदे में झुका रहूँ और उम्र गुज़र जाए बातों की।

मैं दर-दर, शहर-शहर फिरा हूँ तेरी तलाश में,
कई चेहरे मिले मगर कोई ठहरा नहीं साँस में।
ये तन्हाई मेरे साथ साया बनकर रही हमेशा,
तुम अगर हमसफ़र बन जाओ, मुकम्मल हो ये किस्सा।

तेरा नाम आज सूरज की रौशनी के साथ आया याद बनकर,
दिन भर मेरी रगों में बहता रहा कोई फ़रियाद बनकर।
मगर रात ढली तो वही नाम तन्हाई का लिबास पहन गया,
मेरे सीने से लिपटकर एक अधूरी दास्ताँ कह गया।

अब आ भी जाओ कि सफ़र थक चुका है मंज़िल की राह में,
मेरी आँखें बिछी हैं बरसों से तेरी एक निगाह में।
जो मुहब्बत है तो उसे ख़ुदा की रहमत की तरह उतरने दो,
और जो मैं हूँ, मुझे तेरे दिल में उम्र भर ठहरने दो।

Rinki Raut

Monday, June 15, 2026

नीम करौली बाबा: समाधि लेने के बाद भी आज तक हो रहे हैं ये हैरान कर देने वाले चमत्कार!

 

भारत में कुछ संतों की कहानियां सिर्फ उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके जाने के बाद भी श्रद्धालुओं के अनुभवों के ज़रिए जिंदा रहती हैं। नीम करौली बाबा (बाबा नीब करौरी महाराज) उन्हीं संतों में से एक हैं, जिनके बारे में आज भी लाखों लोगों का मानना है कि उनकी कृपा अब भी उतनी ही जीवंत है, जितनी उनके जीवित रहते थी। आइए जानते हैं ऐसी कुछ कहानियां, जो आज भी सुनकर रोमांच पैदा कर देती हैं।

कैंची धाम - वो जगह जहां आज भी महसूस होती है बाबा की मौजूदगी

उत्तराखंड के नैनीताल से कुछ ही दूरी पर बसा कैंची धाम, नीम करौली बाबा की सबसे प्रसिद्ध तपस्थली है। 1973 में बाबा के देहावसान के बाद भी यह आश्रम कभी सुना-सुना नहीं रहा। हर साल हज़ारों श्रद्धालु, चाहे वो भारत के हों या विदेश के, यहां सिर्फ दर्शन के लिए नहीं, बल्कि किसी अनकही "ऊर्जा" को महसूस करने के लिए आते हैं। कई भक्तों का कहना है कि जैसे ही वे आश्रम के मुख्य द्वार से अंदर कदम रखते हैं, उन्हें एक अजीब-सी शांति और सुकून का अनुभव होता है, जैसे कोई अदृश्य हाथ उनके सिर पर रखा गया हो।

चमत्कार नंबर 1: सपने में आकर बचाई एक भक्त की जान

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी कई कहानियां सुनने को मिलती हैं, जिनमें भक्तों का दावा है कि मुसीबत के समय बाबा सपने में आकर उन्हें चेतावनी दे गए। एक चर्चित कहानी के अनुसार, एक परिवार लंबी यात्रा पर निकलने वाला था और सब कुछ तय हो चुका था। यात्रा से एक रात पहले परिवार के मुखिया को सपने में बाबा दिखे और उन्होंने साफ शब्दों में कहा - "कल यात्रा मत करना।" सुबह उठकर परिवार ने योजना बदल दी। बाद में पता चला कि जिस रास्ते से उन्हें जाना था, वहां उस दिन एक बड़ा सड़क हादसा हुआ था। यह कहानी आज भी कैंची धाम के आसपास सुनाई जाती है, और भक्त इसे बाबा की "अदृश्य सुरक्षा" का प्रमाण मानते हैं।

चमत्कार नंबर 2: जब स्टीव जॉब्स भारत आए, मगर बाबा से मिल न सके

यह कहानी अध्यात्म और टेक्नोलॉजी की दुनिया को जोड़ने वाली एक अनोखी कड़ी है। कहा जाता है कि एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स अपनी युवावस्था में आध्यात्मिक खोज में भारत आए थे, और उनका लक्ष्य था नीम करौली बाबा से मिलना। लेकिन जब वे कैंची धाम पहुंचे, तब तक बाबा देह त्याग चुके थे। फिर भी, जॉब्स ने आश्रम में कुछ समय बिताया और जो शांति व स्पष्टता उन्हें वहां मिली, उसका असर बाद में उनकी सोच और जीवन-दर्शन में साफ झलकता रहा। आज भी बहुत से विदेशी श्रद्धालु इसी प्रेरणा से कैंची धाम की यात्रा पर निकलते हैं, यह मानते हुए कि बाबा की ऊर्जा अब भी वहां मौजूद है।

चमत्कार नंबर 3: मुश्किल वक्त में अनजान मदद का मिलना

कई भक्तों का अनुभव यह भी है कि जब वे आर्थिक तंगी, बीमारी या किसी बड़े संकट से गुजर रहे होते हैं, और मन से बाबा को याद करते हैं, तो किसी अनजान व्यक्ति या अनदेखे ज़रिए से मदद आ जाती है। एक प्रचलित किस्से में, एक व्यक्ति अपने बच्चे के ऑपरेशन के लिए पैसों का इंतज़ाम नहीं कर पा रहा था। उसने रात में बाबा की तस्वीर के सामने बस इतना कहा - "महाराज, अब आप ही कुछ करो।" अगली सुबह एक पुराने परिचित का फोन आया, जिसने बिना किसी मांगे ही ज़रूरत की रकम का इंतज़ाम कर दिया। ऐसी घटनाएं भक्तों के बीच "बाबा की लीला" के नाम से जानी जाती हैं।

चमत्कार नंबर 4: कैंची धाम में आज भी होने वाले अनुभव

आज भी हर साल 15 जून को कैंची धाम में स्थापना दिवस के मौके पर भारी भीड़ जुटती है। कई भक्त बताते हैं कि इस दौरान उन्हें अचानक आंखों में आंसू आ जाते हैं, बिना किसी वजह के मन भारी हो जाता है, या फिर अचानक किसी पुरानी समस्या का हल अपने आप मिल जाता है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि आश्रम परिसर में मौजूद हनुमान मंदिर के पास बैठते ही उनके मन की उलझनें शांत हो जाती हैं, जैसे कोई गुरु बिना बोले ही रास्ता दिखा गया हो।

निष्कर्ष - श्रद्धा का सफर अब भी जारी है

ये सभी कहानियां भक्तों की श्रद्धा और अनुभवों पर आधारित हैं, और पीढ़ियों से मुंह-ज़बानी एक-दूसरे तक पहुंचती रही हैं। चाहे कोई इन्हें चमत्कार माने या संयोग, सच्चाई यह है कि नीम करौली बाबा का नाम आज भी लाखों दिलों में उतनी ही श्रद्धा के साथ ज़िंदा है, जितना उनके जीवित रहते था। यही वजह है कि कैंची धाम जैसी जगहें सिर्फ "तीर्थ स्थल" नहीं, बल्कि उम्मीद और विश्वास का केंद्र बनी हुई हैं।

आपका इस विषय पर क्या अनुभव या विचार है? अगर आपने भी कभी ऐसा कोई अनुभव किया है, तो कमेंट में ज़रूर शेयर करें।


Rinki

ये मोहब्बत नहीं होती साकी

 खुद को मिटा कर जीना, ये मोहब्बत नहीं होती साकी,

अपनी ही परछाई से डरना, ये चाहत नहीं होती साकी,
जिसको चाहो दिल से चाहो, मगर खुद को न भूल जाना,
वरना ये उल्फ़त भी, इक आदत बन जाती है साकी।

किसी के इंतज़ार में, उमर गुज़ार देना आसान नहीं साकी,
पर खुद को भी वक़्त देना, ये कोई गुनाह नहीं साकी,
जो तुम्हारे बिना चल सके, उसे चलने दो ख़ुशी से,
तुम्हारा वजूद किसी के जाने से, कम नहीं साकी।

गिरना सबके नसीब में है, पर सम्भलना भी ज़रूरी है साकी,
खुद को धूल बनाने से पहले, खुद की क़ीमत समझो साकी,
जो लोग तुम्हारी एहमियत न समझें, उनके पीछे क्या भागना,
अपनी क़द्र खुद करो, किसी का मोहताज नहीं साकी।

इश्क़ करो दिल खोल कर, पर अपनी शान न गँवाओ साकी,
ख़्वाबों में खो जाओ, मगर होश न भुलाओ साकी,
जिसे जाना है उसे जाने दो, ये ज़िंदगी का दस्तूर है,
जो तुमसे वफ़ा करे वही, तुम्हारा सच्चा सहारा है साकी।


Rinki

Tuesday, June 9, 2026

A Symphony of Regret

I left the lights on in the hallway floor...

Silently rehearsing what I'll never get to say.

The clock on the wall is ticking too loud...
trying to find a melody inside the pain.

This is a symphony of pure regret...
and pretending that nothing is wrong.

I saw your coat hanging behind the bar...
and pretending that nothing is wrong.

This is a symphony of pure regret...
and pretending that nothing is wrong.

Did you forget the way my hands felt?...
playing our final song.

But time is a thief that doesn't leave a trace...
Silently rehearsing what I'll never get to say.

This is a symphony of pure regret...
and pretending that nothing is wrong.

I saw your coat hanging behind the bar...
and pretending that nothing is wrong.

A symphony of regret is all we have left.

Monday, June 8, 2026

शर्मिंदगी है हमको बहुत हम मिले तुम्हें- जॉन एलिया

 

मुझे इस बात की शर्म है कि मैं तुम्हारी ज़िंदगी में आया।

तुम पूरी तरह खुशियों से भरे हुए थे,

लेकिन मेरी वजह से तुम्हें दुःख भी मिले।

मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं कि

मैं खुद को पूरी तरह समझ नहीं पाया,


अफ़सोस तो इस बात का है

कि तुम भी अपने आप को पूरा नहीं पा सके।

अगर हमारे रिश्ते का हिसाब लगाया जाए,
तो मुझे शर्म आती है कि

 

मैं बार-बार तुम्हारी ज़िंदगी में आया और तुम्हें तकलीफ़ें मिलीं।

तुम अपने ख़्वाबों और तमन्नाओं की दुनिया में क्या तलाश रहे थे,
मैं भी जब तुम्हें मिला तो बिखरा हुआ और उलझा हुआ मिला।

काश तुम किसी और के नहीं,
बल्कि अपने ही सहारे मज़बूत और मुकम्मल बन सको।

 

इस छल-कपट और बहानों से भरी दुनिया में,
अगर मुझे कोई सच्चा हमदर्द मिले,
तो मेरी दुआ है कि वही सच्चा साथी तुम्हें भी मिले।

मैं तुम्हारे लिए सख़्त मिज़ाज होने की दुआ नहीं करता,
बल्कि चाहता हूँ कि तुम्हारा दामन हमेशा मोहब्बत,

एहसास और आँसुओं की नमी से भरा रहे।

 

मैं आज तक खुद को पूरी तरह समझ नहीं पाया,
न जाने मेरे दिल और शौक़ की कैसी-कैसी दुनिया तुमने देखी होगी।

तुमने मेरे दिल में बहुत लंबा सफ़र किया,
और मुझे शर्म है कि उस सफ़र में तुम्हें बहुत से ज़ख़्म मिले।

मेरी दुआ है कि मुझे कोई और हव्वा मिले,
और तुम्हें कोई ऐसा आदम मिले

जो तुम्हें मुझसे ज़्यादा समझ सके, ज़्यादा खुश रख सके।

 

मेरी मुस्लिम नानी

 “तुम्हारा नाम वैष्णवी है और नानी का नाम रज़िया?” काउंटर के पीछे बैठे बाबू ने कागज़ को दोबारा देखा और फिर मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर ऐसा भ...