ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है
जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं।
यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग।
धरती धूल से भरी है,
आसमान धुँधला है।
सच्चा रूप कहीं दिखाई नहीं देता।
यह बगुलों का शहर है।
हम धूल जैसे हालातों में
अपनी सीमाएँ खोते जा रहे हैं।
यहाँ इंसान की पहचान भी धूल में मिल जाती है।
यह बगुलों का शहर है।
इस एक पल में ही सब आमने-सामने है,
फिर न मैं बचता हूँ, न तुम।
यहाँ किए गए वादे भी खोखले हैं।
यह बगुलों का शहर है।
जो अभी है और जो पहले था,
सब स्वार्थ में डूबा हुआ है।
यहाँ किसके लिए और क्या जीना है,
कुछ साफ़ नहीं।
यह बगुलों का शहर है।
अगर बस अपना ही स्वार्थ सही,
और वही लालसा सही,
तो रिश्ते भी बस दिखावे के रह जाते हैं।
यह बगुलों का शहर है।
यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।
यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।
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