Sunday, January 18, 2026

यह बगुलों का शहर है-जौन एलिया

 ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है

जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं।
यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग।

धरती धूल से भरी है,
आसमान धुँधला है।
सच्चा रूप कहीं दिखाई नहीं देता।
यह बगुलों का शहर है।

हम धूल जैसे हालातों में
अपनी सीमाएँ खोते जा रहे हैं।
यहाँ इंसान की पहचान भी धूल में मिल जाती है।
यह बगुलों का शहर है।

इस एक पल में ही सब आमने-सामने है,
फिर न मैं बचता हूँ, न तुम।
यहाँ किए गए वादे भी खोखले हैं।
यह बगुलों का शहर है।

जो अभी है और जो पहले था,
सब स्वार्थ में डूबा हुआ है।
यहाँ किसके लिए और क्या जीना है,
कुछ साफ़ नहीं।
यह बगुलों का शहर है।

अगर बस अपना ही स्वार्थ सही,
और वही लालसा सही,
तो रिश्ते भी बस दिखावे के रह जाते हैं।
यह बगुलों का शहर है।

यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।

यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।

7 comments:

  1. यहाँ शक पर शक छाया है,
    यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
    यह भ्रम भी एक और भ्रम है
    बहुत सटीक एवं सारगर्भित सृजन ।

    ReplyDelete
  2. यह कविता पढ़कर मुझे आज के समाज की सच्चाई याद आई। तुमने “बगुलों का शहर” कहकर लोगों के दोहरे स्वभाव को बहुत सरल तरीके से दिखाया। लोग बाहर से अच्छे दिखते हैं, लेकिन अंदर कुछ और सोचते हैं, यह बात तुमने साफ शब्दों में कही।

    ReplyDelete

Thanks for visiting My Blog. Do Share your view and idea.

A Symphony of Regret

I left the lights on in the hallway floor... Silently rehearsing what I'll never get to say. The clock on the wall is ticking too loud...