एक दिन ऐसा हुआ,
वफ़ा पर बहस छिड़ गई।
मैंने इश्क़ को अमर कहा,
वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई।
मैं इश्क़ का क़ैदी था,
वो इश्क़ को एक क़ैदखाना कहती रही।
कि उम्र भर का साथ भी,
उसे चाहत से बदतर लगा।
पेड़ पत्थर नहीं होते…
Everyone does have a book in them. Here is few pages of my life, read it through by my stories,poetry and articles.
एक दिन ऐसा हुआ,
वफ़ा पर बहस छिड़ गई।
मैंने इश्क़ को अमर कहा,
वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई।
मैं इश्क़ का क़ैदी था,
वो इश्क़ को एक क़ैदखाना कहती रही।
कि उम्र भर का साथ भी,
उसे चाहत से बदतर लगा।
पेड़ पत्थर नहीं होते…
एक दिन ऐसा हुआ, वफ़ा पर बहस छिड़ गई। मैंने इश्क़ को अमर कहा, वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई। मैं इश्क़ का क़ैदी था, वो इश्क़ को एक क़ैदख...