Thursday, April 9, 2026

अहमद फ़राज़

 एक दिन ऐसा हुआ,

वफ़ा पर बहस छिड़ गई।

मैंने इश्क़ को अमर कहा,
वो मेरी ज़िद से नाराज़ हो गई।

मैं इश्क़ का क़ैदी था,
वो इश्क़ को एक क़ैदखाना कहती रही।

कि उम्र भर का साथ भी,
उसे चाहत से बदतर लगा।

पेड़ पत्थर नहीं होते…

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सूफी- कागा कागा रे

  कागा कागा रे मोरी अरज तोसे चुन चुन खइयो मास कागा कागा रे मोरी अरज तोसे चुन चुना खाइयोमाच अरजिया रे खाइयाँ ना तू नैना मोरे खाइयाँ ना तू नैन...