Tuesday, April 12, 2016

किसान की भूख

 वो खाली पेट भटक रहा
बंजर पड़ी ज़मीन को
तरही नज़र से ताक रहा
रोज़ सोचता गाँव छोड़े
शहर की तरफ खुद को मोड
वो देश का अनंदाता है
भूखे पेट रोज़ सो जाता है

पेट की तपती आग जब शरीर
को तोड़ जाती है
उसके बच्चो के पेट और पीठ का फर्क मिट जाता है
ईट दर ईट जब बिक जाती है
वो देश का अनंदाता है
खून के आंसू रोता है

वो दुकान से मोल कर भी
अन्न नहीं खरीद नहीं सकता
तब अपने सम्मान के लिए
वो किसान हमेशां के लिए
सो जाता है

भूख से जीत जाता है

Rinki



यह बगुलों का शहर है-जौन एलिया

 ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं। यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग। धरती धूल से भरी है, ...