Friday, December 26, 2025

बाबा नीम करोली की कहानी – उनके चमत्कार

 बाबा नीम करोली की कहानी

1. बचपन और संन्यास

बाबा का जन्म लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से लगभग 1900 में उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें दुनियादारी में रुचि नहीं थी, वे भगवान और संतों की ओर बहुत आकर्षित थे। जवानी में ही घर छोड़कर साधु बनकर भ्रमण करने लगे और आत्मज्ञान की तलाश में निकल पड़े।

2. गुरु की शरण और संन्यास

उनकी मुलाकात हिमालय में बाबा नैन सिंह से हुई, जिन्होंने उन्हें संन्यास दिया और नीम करोली बाबा का नाम दिया। अपने गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने दूर-दूर की गुफाओं और जंगलों में वर्षों तपस्या और ध्यान किया और योग तथा अंतर्मन की शक्तियों को प्राप्त किया।

3. जंगलों में जीवन और आश्रम

दशकों तक बाबा कैंची (नैनीताल के पास), कैंची धाम और हिमालय के अन्य स्थानों में जंगलों में सरल जीवन जीते रहे, अक्सर एक नीम के पेड़ के नीचे बैठते थे, जिससे उनका लोकप्रिय नाम नीम करोली बाबा पड़ा। उन्होंने आश्रम बनाए जहाँ भक्त आकर सेवा, ध्यान और दर्शन करते थे। उन्होंने रीति-रिवाजों से ज्यादा प्रेम, विनम्रता और निस्वार्थ सेवा पर जोर दिया।

4. प्रेम और सादगी की शक्ति

बाबा सिखाते थे कि सबसे ऊँचा मार्ग है भगवान और सभी प्राणियों से उस तरह प्रेम करना जैसे बच्चा अपनी माँ से करता है। वे अक्सर कहते थे – “सबसे प्रेम करो, सबको खिलाओ, भगवान को याद रखो” – और खुद इसी तरह जीते थे, जात-पात, धर्म या स्थिति के बिना हजारों को भोजन देते थे।

5. वस्तुओं का चमत्कारी उत्पादन

कई भक्तों ने देखा कि बाबा भूखे, गरीब या जरूरतमंदों की मदद के लिए भोजन, कपड़े, दवाइयाँ और कभी-कभी पैसा भी आकाश से उतार देते थे। जब किसी गरीब परिवार के पास खाने को कुछ नहीं होता था, तो बाबा बस हाथ हिलाते और उनके सामने पूरा भोजन आ जाता था।

6. बीमारों का चमत्कारी उपचार

बाबा असाध्य बीमारियों को छूकर, एक नजर से या बस एक छोटे से प्रसाद के टुकड़े से ठीक कर देते थे। कैंसर, पक्षाघात और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों के ठीक होने की कई घटनाएँ हैं, जो बाबा के दर्शन या आशीर्वाद के बाद हुईं।

7. टेलीपैथी और अदृश्य को जानना

भक्त अक्सर अनुभव करते थे कि बाबा उनके गहरे विचार, पिछले जन्म और भविष्य की घटनाएँ बिना बताए जान लेते थे। वे ऐसे नाम से लोगों को पुकारते थे जो उन्होंने कभी नहीं बताए थे, या खतरे से पहले ही चेतावनी दे देते थे, जिससे उनके दिव्य ज्ञान का पता चलता था।

8. एक साथ कई जगह दिखाई देना

कई बार बाबा को एक ही समय में सैकड़ों किलोमीटर दूर के अलग-अलग आश्रमों या शहरों में देखा गया। इस “द्विस्थानीय दर्शन” को उनका सबसे बड़ा चमत्कार माना जाता है, जो यह साबित करता है कि वे शारीरिक रूप से सीमित नहीं थे।

9. पश्चिमी तीर्थयात्रियों का मार्गदर्शन

1960-70 के दशक में कई पश्चिमी लोग (जैसे राम दास, कृष्ण दास आदि) भारत आए और बाबा के प्रेम और ज्ञान से बदल गए। उन्होंने उन्हें सरल उपदेश दिए जैसे – “अभी यहाँ रहो”, “दूसरों की सेवा करो”, “भगवान को याद रखो” – जो बाद में उनके आध्यात्मिक काम की नींव बने।

10. महासमाधि और अमर उपस्थिति

1973 में बाबा कैंची धाम में शारीरिक शरीर छोड़कर महासमाधि में चले गए, लेकिन भक्त मानते हैं कि वे आत्मा के रूप में अभी भी जीवित हैं और जो भी विश्वास से उन्हें पुकारता है, उसकी मदद करते हैं। आज भी लाखों लोग उनके मंदिरों पर जाते हैं और उनके चमत्कारों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं, जो उनके दिव्य चमत्कार को जीवित रखती हैं।

खामोशी सी बिखरी है

 

इंतजार की घड़ियां सुनहरे सपनों के दरमियान,
खामोशी सी बिखरी है दिल के आंगन में।
प्रेम की एक किरण की आस लिए हुए,
हर धड़कन में जैसे हो कोई विराम।

नज़रों में छुपी एक उम्मीद की लौ है,
जो बुझती नहीं, थकती कभी।
वो मधुर मुस्कान, वो मीठी बातें,
जो जुदाई में भी साथ चलती थीं।

वो प्रेम जो सिर्फ जुबां पर नहीं,
रूह के रेशों में उतरा हो कभी।
इंतजार की तपिश में पिघलती हुई,
आसमां के तारों को छूती हुई।

फिर भी हर शाम ढले,
उम्मीद का दीपक जलाए रखता हूँ,
तुम्हारे वापिस आने की आस में,
जैसे कोई कविता जवां रह जाती है,
हर अधूरा जज़्बा, पूरा होने के लिए।


Rinki

 

Tuesday, December 23, 2025

बांसुरी की फरियाद

 

सुनो! बांसुरी की उदासी भरी आवाज़ को,
जो शिकवा करती है बिछड़ने का दर्द भरा।
हर से अलग होकर, हर हरदम जलता हूँ मैं,
हर आग में जलकर, हर को पुकारता हूँ मैं।
जिसके हाथ से निकला, उसी की बाँहों में लौटना चाहता हूँ,
पहले के साथी खोकर, दुखी हूँ, बेचैन हूँ।
मैंने हर आग सह ली, हर दर्द झेला,
फिर भी न मिला वो, जिसके बिना अधूरा हूँ।


Rumi

Sunday, November 30, 2025

बाबा नीम करोरी महाराज

 

बाबा नीम करोरी महाराज एक महान साधु और हनुमान भक्त थे, जिन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में अपनी आस्था और सेवा के माध्यम से कई मंदिरों का निर्माण किया। उनका असली नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था और वे उत्तर प्रदेश के एक धनी परिवार में पैदा हुए थे। ग्यारह वर्ष की उम्र में उनकी शादी हो गई, लेकिन उन्होंने विवाह के तुरंत बाद घर छोड़ साधुता का मार्ग अपनाया। बाद में वे पूरे उत्तर भारत में घूमें और उन्होंने कई मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें प्रमुख रूप से हनुमान जी के मंदिर थे।

नीम करोरी बाबा ने स्वयं शारीरिक श्रम कर कई मंदिरों की नींव रखी और मूर्तियों की स्थापना भी की। उनके भक्त बताते हैं कि उन्होंने कई मंदिरों में हनुमान जी की मूर्तियां अपने हाथों से बनाई और पूजा-अर्चना की। बाबा का आश्रम और मुख्य धाम कांची धाम के नाम से प्रसिद्ध है, जो उत्तराखंड में स्थित है। वे अपने भक्तों को सेवा, भक्ति और सादगी की शिक्षा देते थे। कई विदेशी भक्त भी उनके शिष्य बने और बाबा की प्रसिद्धि भारत के बाहर भी फैली।

उनकी जीवन गाथा में यह बात उल्लेखनीय है कि उन्होंने मंदिर निर्माण के माध्यम से केवल धार्मिक आस्था को बढ़ावा दिया बल्कि लोगों को एकजुट होने और सेवा करने की प्रेरणा भी दी। बाबा नीम करोरी महाराज की स्मृति आज भी उनके द्वारा स्थापित मंदिरों में उनके भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजी जाती है।

यह कहानी बाबा नीम करोरी के साधु जीवन और मंदिर निर्माण की उनके समर्पण और आध्यात्मिकता की झलक है।

 

 

यह बगुलों का शहर है-जौन एलिया

 ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं। यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग। धरती धूल से भरी है, ...