Friday, December 26, 2025

खामोशी सी बिखरी है

 

इंतजार की घड़ियां सुनहरे सपनों के दरमियान,
खामोशी सी बिखरी है दिल के आंगन में।
प्रेम की एक किरण की आस लिए हुए,
हर धड़कन में जैसे हो कोई विराम।

नज़रों में छुपी एक उम्मीद की लौ है,
जो बुझती नहीं, थकती कभी।
वो मधुर मुस्कान, वो मीठी बातें,
जो जुदाई में भी साथ चलती थीं।

वो प्रेम जो सिर्फ जुबां पर नहीं,
रूह के रेशों में उतरा हो कभी।
इंतजार की तपिश में पिघलती हुई,
आसमां के तारों को छूती हुई।

फिर भी हर शाम ढले,
उम्मीद का दीपक जलाए रखता हूँ,
तुम्हारे वापिस आने की आस में,
जैसे कोई कविता जवां रह जाती है,
हर अधूरा जज़्बा, पूरा होने के लिए।


Rinki

 

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