Monday, June 10, 2013

गंगा -कुछ कहा रही हमसे

गंगा

क्या कोई सुनेगा मेरी भी बात
क्यों है दूर- दूर तक छाई वीरानी
सूखे पनघट,टूटे नाव, नहीं मेरा कोई निशान
क्यों हूँ आज में दुखी ,अपने ही जन
से रूठी वीरान गंगा
नहीं रही अब में वेदों की महान गंगा
भैरव की शीर्ष की शोभा
माँ के समान पूजनीय गंगा
कभी थी में देश की रक्त वाहनी
भागीरथ की कुल की स्वमानी
अब हूँ में नाले समान
अब में लोगो के पाप नहीं
उनके अभिशाप को ढोती हूँ
क्यों मुझ मैं तू डूबकी
लगए,जब तू मेरी पवित्रता
को ही सभाल ना पाए?


दोस्त पुराने

न जाने कितने दिनों के बाद कुछ दोस्तों से मुलाकात हुई मैं देखती उन्हें छूती उन्हें आँखों से पढ़ती यादों के पन्नों को...