Monday, October 23, 2017

दोस्तों, आह! जिंदगी पत्रिका में मेरे द्वारा लिखित अनुभव “मानवता और मजहब” को प्रकाशित किया गया है, आपके सहयोग के लिए धन्यवाद्I

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जो जीते हैं, वही-न-ख़ुद का दफ्तर है मुश्किल में कहीं का दफ्तर है-जौन एलिया

 पढ़ रहा हूँ मैं कागज़ों-बसूदा और नहीं और है का दफ्तर है कोई सोचे तो सोचे कैसे जीएँ सारा दफ्तर ग़मों का दफ्तर है हमसे कोई तो करे इशारा ...