मेरी रूह के वीरान कमरों में कोई सहर भर दे मुझे।
तुम मुझे चाँद की तरह देखो, बेदाग़ न सही मगर अपना,
मेरी ख़ामोशियों को लफ़्ज़ दो, मेरी नज़रों को सपना।
ये दर्द मेरा घर बन जाए, तो फिर शिकायत भी कैसी,
हर ज़ख़्म में तेरी आहट हो, हर धड़कन रौशनी जैसी।
तुम क़ुबूल हुई दुआ बन जाओ मेरी तन्हा रातों की,
मैं सजदे में झुका रहूँ और उम्र गुज़र जाए बातों की।
मैं दर-दर, शहर-शहर फिरा हूँ तेरी तलाश में,
कई चेहरे मिले मगर कोई ठहरा नहीं साँस में।
ये तन्हाई मेरे साथ साया बनकर रही हमेशा,
तुम अगर हमसफ़र बन जाओ, मुकम्मल हो ये किस्सा।
तेरा नाम आज सूरज की रौशनी के साथ आया याद बनकर,
दिन भर मेरी रगों में बहता रहा कोई फ़रियाद बनकर।
मगर रात ढली तो वही नाम तन्हाई का लिबास पहन गया,
मेरे सीने से लिपटकर एक अधूरी दास्ताँ कह गया।
अब आ भी जाओ कि सफ़र थक चुका है मंज़िल की राह में,
मेरी आँखें बिछी हैं बरसों से तेरी एक निगाह में।
जो मुहब्बत है तो उसे ख़ुदा की रहमत की तरह उतरने दो,
और जो मैं हूँ, मुझे तेरे दिल में उम्र भर ठहरने दो।
Rinki Raut
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