Wednesday, June 3, 2026

एक ही दिल — शैतान और मैं



कमरे में सन्नाटा था।

पंखा अपनी धीमी रफ्तार से घूम रहा था। उसकी हर परिक्रमा जैसे पिया की आंखों में उतर रही थी। वह बिस्तर पर बैठी उसे टकटकी लगाए देख रही थी। मन में एक ही ख्याल थाअगर अभी उठकर उस पंखे से झूल जाए तो शायद सब खत्म हो जाएगा।

लेकिन मौत के लिए भी हिम्मत चाहिए होती है।

सोचते-सोचते पूरी रात गुजर गई। खिड़की से आती सुबह की हल्की रोशनी ने कमरे को भर दिया, पर उसके भीतर का अंधेरा वैसा ही बना रहा।

भारी मन से वह ऑफिस के लिए तैयार हुई। रोज की तरह लोगों की हंसी, चाय की बातें, मीटिंग्स, फाइलेंसब कुछ चल रहा था। कभी यही माहौल उसे अच्छा लगता था। आज हर हंसी उसे अपने ऊपर तंज जैसी लग रही थी। शाम को घर लौटी तो दम घुटने लगा। वह बिना कुछ सोचे गंगा किनारे निकल गई।

मन में आया, इसी नदी में समा जाए। अपने सारे पाप, सारे दुख, इस जन्म और हर जन्म की थकान को इस पानी में डुबो दे।

तभी उसकी नजर सामने बने मां काली के मंदिर पर पड़ी।

उस मंदिर से उसका पुराना रिश्ता था।

जब भी लगता कि दुनिया खत्म हो गई है, जब भी किसी ने उसे तोड़ा है, वह यहीं आकर बैठती थी। मां से शिकायत करती थी। रोती थी। उनसे अपना बनाने की भीख मांगती थी।

लेकिन आज तक उसे समझ नहीं आया था कि मां ने उसे अपनाया भी है या नहीं।

वह मंदिर के एक कोने में बैठ गई।

आंखों से आंसू बह रहे थे।

दर्द इस बात का नहीं था कि कोई उसे छोड़कर किसी और से शादी कर गया।

दर्द यह था कि किसी ने उसका इस्तेमाल किया था।

उसके समय का,उसके पैसों का।

उसकी भावनाओं का।

उसकी ऊर्जा का।

और जब सब ले लिया, तब किसी और का हाथ पकड़कर चला गया।

पिया को खुद से घृणा होने लगी थी।

उसे समझ नहीं रहा था कि वह कैसे नहीं पहचान पाई कि वह आदमी पहले से किसी और से प्रेम करता था।

वह उसकी प्रेमिका नहीं थी।

वह बस एक दूसरी औरत थी।

मंदिर में आरती शुरू हो गई।

घंटियां बजने लगीं।

"जय मां काली!"

"जय मां काली!"

चारों ओर शोर था।

लेकिन उसी शोर के बीच पिया को किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देने लगी।

बहुत धीमी।

बहुत दर्द भरी।

पहले उसे लगा, मंदिर में कोई और महिला होगी।

फिर लगा, जैसे वह आवाज सिर्फ वही सुन पा रही है।

जैसे कोई उसके कान के बिल्कुल पास बैठकर रो रहा हो।

पिया ने कांपते हाथों से मां काली के सामने हाथ जोड़ दिए।

उसकी आंखों में अब आंसुओं से ज्यादा गुस्सा था।

"मां, अगर तुम मुझे अपनी बेटी नहीं मान सकती..."

"तो अपने यक्ष, यक्षिणी, डाकिनी, शाकिनी, भूत या शैतान से ही मिला दो।"

"मेरे भीतर अब जहर भर गया है।"

"अब मुझे किसी का प्रेम नहीं चाहिए।"

"मुझे शक्ति चाहिए।"

"इतने साल मैं तुम्हारे सामने कृपा मांगती रही।"

"आज मैं शैतान मांग रही हूं।"

"अपना तन, मन और आत्मा मैं उसे देती हूं..."

"और बदले में शक्ति मांगती हूं।"

इतना कहकर वह उठ गई।

उस रात जब वह घर लौटी, तो फिर उसी कमरे में चुपचाप बैठी रही।

दिन गुजरते गए।

कुछ नहीं हुआ।

कोई देवता आया।

कोई शैतान।

पिया को खुद पर हंसी आने लगी।

उसे लगने लगा कि जैसे भगवान ने भी उसे ठुकरा दिया और शैतान ने भी।

लेकिन अजीब बात यह थी कि उस दिन के बाद उसके भीतर एक अजीब शांति गई थी।

अब वह खुद को छोड़ी हुई नहीं समझती थी।

वह खुद को घायल समझती थी।

और घाव बदला मांग रहा था।

उसका प्रेम धीरे-धीरे नफरत में बदल गया।

नफरत जहर में।

और जहर एक अजीब ताकत में।

उसे लगने लगा कि अब खेल उसके हाथ में है।

उधर ऑफिस में उसका पुराना प्रेमी फिर उसके करीब आने की कोशिश कर रहा था।

शादी के बाद भी।

वह चाहता था कि पिया उसे स्वीकार कर ले।

उसकी बातें सुनकर पिया के भीतर घृणा का सैलाब उमड़ पड़ता।

अब वह उसे प्रेमी नहीं, दुश्मन समझती थी।

और खुद को मदारी।

वह मन ही मन कहती

"देखते हैं..."

"तुझे कैसे नचाती हूं।"

दिन गुजरते रहे।

लेकिन दर्द पूरी तरह नहीं गया।

कुछ जख्म ऊपर से भर जाते हैं।

अंदर से नहीं।

उस रात भी कुछ ऐसा ही हुआ।

पुरानी यादों ने अचानक दरवाजा खटखटा दिया।

पिया बिस्तर पर बैठी-बैठी फूट-फूटकर रोने लगी।

सांस भारी हो गई।

सीना दर्द से भर गया।

कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज थी।

और फिर...

उसे लगा जैसे कमरे में कोई और भी मौजूद है।

हवा अचानक ठंडी हो गई।

उसने आंसू पोंछे।

चारों तरफ देखा।

कोई नहीं था।

लेकिन उसके कान के पास किसी की धीमी फुसफुसाहट गूंजी।

इतनी धीमी कि जैसे हवा बोल रही हो।

"पिया..."

वह एकदम सिहर उठी।

उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

"कौन है?"

कमरे में कोई जवाब नहीं आया।

कुछ क्षण बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

इस बार और स्पष्ट।

"डरो मत..."

"मैं हूं..."

"तुम्हारे साथ।"

पिया की सांस रुक सी गई।

वह उठकर बैठ गई।

अंधेरे कमरे के कोने में उसे एक धुंधली परछाईं दिखाई दी।

वह इंसान जैसी थी।

लेकिन पूरी तरह इंसान नहीं।

और तभी वह आवाज मुस्कुराई

"तुमने उस रात शक्ति मांगी थी ..."

"मैं उसी प्रार्थना का उत्तर हूं।"

पिया की आंखें फैल गईं।

बाहर कहीं दूर कुत्ते भौंकने लगे।

कमरे की खिड़की अपने आप चरमराकर खुल गई।

और उस अंधेरे में पहली बार पिया को महसूस हुआ कि उसकी जिंदगी अब एक ऐसे रास्ते पर मुड़ चुकी है, जहां से लौटना शायद आसान नहीं होगा...

(क्रमशः)

 

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