Sunday, January 18, 2026

यह बगुलों का शहर है-जौन एलिया

 ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है

जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं।
यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग।

धरती धूल से भरी है,
आसमान धुँधला है।
सच्चा रूप कहीं दिखाई नहीं देता।
यह बगुलों का शहर है।

हम धूल जैसे हालातों में
अपनी सीमाएँ खोते जा रहे हैं।
यहाँ इंसान की पहचान भी धूल में मिल जाती है।
यह बगुलों का शहर है।

इस एक पल में ही सब आमने-सामने है,
फिर न मैं बचता हूँ, न तुम।
यहाँ किए गए वादे भी खोखले हैं।
यह बगुलों का शहर है।

जो अभी है और जो पहले था,
सब स्वार्थ में डूबा हुआ है।
यहाँ किसके लिए और क्या जीना है,
कुछ साफ़ नहीं।
यह बगुलों का शहर है।

अगर बस अपना ही स्वार्थ सही,
और वही लालसा सही,
तो रिश्ते भी बस दिखावे के रह जाते हैं।
यह बगुलों का शहर है।

यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।

यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।

Friday, January 16, 2026

कैंची धाम बनाने की कहानी | बाबा नीब करोरी महाराज की दिव्य लीला

 कैंची धाम, उत्तराखंड में स्थित एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल है, जो बाबा नीब करोरी महाराज की कृपा और चमत्कारों से जुड़ा हुआ है। यह धाम आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

कहा जाता है कि बाबा नीब करोरी महाराज नैनीताल–अल्मोड़ा मार्ग पर एक स्थान पर आकर रुके, जहाँ दो पहाड़ी रास्ते कैंची के आकार में एक-दूसरे को काटते हैं। इसी कारण इस स्थान का नाम कैंची धाम पड़ा।

उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था और पूरी तरह सुनसान था। बाबा यहाँ ध्यान में लीन रहते और हनुमान जी की भक्ति में मग्न रहते थे। बाबा ने अपने भक्तों से कहा कि इसी स्थान पर हनुमान जी का मंदिर बनाया जाएगा।

मंदिर निर्माण आसान नहीं था। दुर्गम पहाड़ी रास्ते, संसाधनों की कमी और मौसम की कठिनाइयाँ बार-बार सामने आईं। लेकिन भक्तों का विश्वास बाबा पर अडिग था। कहा जाता है कि जब भी कोई बाधा आती, बाबा की कृपा से समाधान अपने आप हो जाता।

वर्ष 1964 में कैंची धाम में हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इस ऐतिहासिक अवसर पर बाबा नीब करोरी महाराज स्वयं उपस्थित थे। तभी से यह धाम आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र बन गया।

बाबा नीब करोरी महाराज ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन यहाँ इतनी भीड़ होगी कि रास्ते छोटे पड़ जाएंगे। आज हर वर्ष 15 जून को स्थापना दिवस के अवसर पर लाखों श्रद्धालु कैंची धाम पहुँचते हैं, और बाबा की भविष्यवाणी सच साबित होती दिखती है।

आज कैंची धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और विश्वास का प्रतीक है। भक्तों का मानना है कि यहाँ सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य पूरी होती है।

कैंची धाम हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति, सेवा और विश्वास से असंभव भी संभव हो सकता है। बाबा नीब करोरी महाराज की कृपा आज भी भक्तों के जीवन को दिशा दिखा रही है।

जय श्री राम। जय हनुमान।

Wednesday, January 14, 2026

जॉन एलिया- मैं ईश्वर के साथ हूँ,

जॉन एलिया उर्दू के एक बहुत ही लोकप्रिय और गहरे भावों वाले शायर थे, जिनकी शायरी आज भी लाखों दिलों को छूती है. उनका असली नाम असग़र गिलानी था और वे 1931 में पाकिस्तान के नवाबशाह में पैदा हुए थे. जॉन एलिया ने अपनी पूरी ज़िंदगी कराची में बिताई और वहीं 2002 में इंतक़ाल कर गए.

​शायरी की ख़ास बात

जॉन एलिया की शायरी बहुत सीधी, सरल और बेबाक़ भाषा में होती है, लेकिन उसके पीछे गहरा दर्द, ज़िंदगी के सवाल और इंसानी तनाव छिपा होता है। वे रिवायती शायरी के बजाय ज़िंदगी के असली मसाइल  दर्द, अकेलापन, निराशा, इंसानी रिश्ते और फ़िलॉसफ़ी  पर लिखते थे. उनकी ग़ज़लें और नज़्में आज भी युवाओं के बीच बहुत पसंद की जाती हैं।

​विचारधारा और अंदाज़

जॉन एलिया एक अलग तरह के सोचने वाले शख़्स थे  वे रूढ़ियों, झूठे रिवाज़ों और दिखावे के ख़िलाफ़ बोलते थे. उनकी शायरी में नास्तिकता, इंसानी आज़ादी और ज़िंदगी के बेमतलबपन को लेकर गहरी चिंतन झलकती है. उनके अंदाज़ में एक तरह का व्यंग्य भी होता था, जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर देता था।

​ज़िंदा शायरी

आज भी जॉन एलिया की शायरी यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक पर बहुत वायरल होती है. उनके अंकल जॉन एलिया के नाम से बने चैनल और पेज उनकी आवाज़ में उनकी ग़ज़लें सुनाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी उनसे जुड़ पाती है. जॉन एलिया ने साबित किया कि शायरी सिर्फ़ प्रेम तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ज़िंदगी के हर पहलू को छू सकती है।


मैं ईश्वर के साथ हूँ,



तुम किसके साथ हो?
हर पल “न होने” के भाव के साथ हूँ,
तुम किसके साथ हो?

मुझे ऐश-आराम और स्थायी सुख का भ्रम स्वीकार नहीं,
मैं तो नश्वरता (मिट जाने) के साथ हूँ,
तुम किसके साथ हो?

मैं हूँ या नहीं हूँ — यही मेरी हैरानी है,
हर पल “होने और न होने” के बीच हूँ,
तुम किसके साथ हो?

मैं नई खुशबू के जादू की धूल-सा हूँ,
यानी हवा की तरह हूँ,
तुम किसके साथ हो?

आज तुम भी मुझसे कुछ सुनो,
कि मैं अहंकार के इंकार के साथ हूँ,
तुम किसके साथ हो?

इस धरती पर मेरा कोई स्थायी मौसम नहीं,
मैं तो हवा-पानी (प्रकृति) के साथ हूँ,
तुम किसके साथ हो?


Friday, December 26, 2025

बाबा नीम करोली की कहानी – उनके चमत्कार

 बाबा नीम करोली की कहानी

1. बचपन और संन्यास

बाबा का जन्म लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से लगभग 1900 में उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें दुनियादारी में रुचि नहीं थी, वे भगवान और संतों की ओर बहुत आकर्षित थे। जवानी में ही घर छोड़कर साधु बनकर भ्रमण करने लगे और आत्मज्ञान की तलाश में निकल पड़े।

2. गुरु की शरण और संन्यास

उनकी मुलाकात हिमालय में बाबा नैन सिंह से हुई, जिन्होंने उन्हें संन्यास दिया और नीम करोली बाबा का नाम दिया। अपने गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने दूर-दूर की गुफाओं और जंगलों में वर्षों तपस्या और ध्यान किया और योग तथा अंतर्मन की शक्तियों को प्राप्त किया।

3. जंगलों में जीवन और आश्रम

दशकों तक बाबा कैंची (नैनीताल के पास), कैंची धाम और हिमालय के अन्य स्थानों में जंगलों में सरल जीवन जीते रहे, अक्सर एक नीम के पेड़ के नीचे बैठते थे, जिससे उनका लोकप्रिय नाम नीम करोली बाबा पड़ा। उन्होंने आश्रम बनाए जहाँ भक्त आकर सेवा, ध्यान और दर्शन करते थे। उन्होंने रीति-रिवाजों से ज्यादा प्रेम, विनम्रता और निस्वार्थ सेवा पर जोर दिया।

4. प्रेम और सादगी की शक्ति

बाबा सिखाते थे कि सबसे ऊँचा मार्ग है भगवान और सभी प्राणियों से उस तरह प्रेम करना जैसे बच्चा अपनी माँ से करता है। वे अक्सर कहते थे – “सबसे प्रेम करो, सबको खिलाओ, भगवान को याद रखो” – और खुद इसी तरह जीते थे, जात-पात, धर्म या स्थिति के बिना हजारों को भोजन देते थे।

5. वस्तुओं का चमत्कारी उत्पादन

कई भक्तों ने देखा कि बाबा भूखे, गरीब या जरूरतमंदों की मदद के लिए भोजन, कपड़े, दवाइयाँ और कभी-कभी पैसा भी आकाश से उतार देते थे। जब किसी गरीब परिवार के पास खाने को कुछ नहीं होता था, तो बाबा बस हाथ हिलाते और उनके सामने पूरा भोजन आ जाता था।

6. बीमारों का चमत्कारी उपचार

बाबा असाध्य बीमारियों को छूकर, एक नजर से या बस एक छोटे से प्रसाद के टुकड़े से ठीक कर देते थे। कैंसर, पक्षाघात और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों के ठीक होने की कई घटनाएँ हैं, जो बाबा के दर्शन या आशीर्वाद के बाद हुईं।

7. टेलीपैथी और अदृश्य को जानना

भक्त अक्सर अनुभव करते थे कि बाबा उनके गहरे विचार, पिछले जन्म और भविष्य की घटनाएँ बिना बताए जान लेते थे। वे ऐसे नाम से लोगों को पुकारते थे जो उन्होंने कभी नहीं बताए थे, या खतरे से पहले ही चेतावनी दे देते थे, जिससे उनके दिव्य ज्ञान का पता चलता था।

8. एक साथ कई जगह दिखाई देना

कई बार बाबा को एक ही समय में सैकड़ों किलोमीटर दूर के अलग-अलग आश्रमों या शहरों में देखा गया। इस “द्विस्थानीय दर्शन” को उनका सबसे बड़ा चमत्कार माना जाता है, जो यह साबित करता है कि वे शारीरिक रूप से सीमित नहीं थे।

9. पश्चिमी तीर्थयात्रियों का मार्गदर्शन

1960-70 के दशक में कई पश्चिमी लोग (जैसे राम दास, कृष्ण दास आदि) भारत आए और बाबा के प्रेम और ज्ञान से बदल गए। उन्होंने उन्हें सरल उपदेश दिए जैसे – “अभी यहाँ रहो”, “दूसरों की सेवा करो”, “भगवान को याद रखो” – जो बाद में उनके आध्यात्मिक काम की नींव बने।

10. महासमाधि और अमर उपस्थिति

1973 में बाबा कैंची धाम में शारीरिक शरीर छोड़कर महासमाधि में चले गए, लेकिन भक्त मानते हैं कि वे आत्मा के रूप में अभी भी जीवित हैं और जो भी विश्वास से उन्हें पुकारता है, उसकी मदद करते हैं। आज भी लाखों लोग उनके मंदिरों पर जाते हैं और उनके चमत्कारों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं, जो उनके दिव्य चमत्कार को जीवित रखती हैं।

खामोशी सी बिखरी है

 

इंतजार की घड़ियां सुनहरे सपनों के दरमियान,
खामोशी सी बिखरी है दिल के आंगन में।
प्रेम की एक किरण की आस लिए हुए,
हर धड़कन में जैसे हो कोई विराम।

नज़रों में छुपी एक उम्मीद की लौ है,
जो बुझती नहीं, थकती कभी।
वो मधुर मुस्कान, वो मीठी बातें,
जो जुदाई में भी साथ चलती थीं।

वो प्रेम जो सिर्फ जुबां पर नहीं,
रूह के रेशों में उतरा हो कभी।
इंतजार की तपिश में पिघलती हुई,
आसमां के तारों को छूती हुई।

फिर भी हर शाम ढले,
उम्मीद का दीपक जलाए रखता हूँ,
तुम्हारे वापिस आने की आस में,
जैसे कोई कविता जवां रह जाती है,
हर अधूरा जज़्बा, पूरा होने के लिए।


Rinki

 

यह बगुलों का शहर है-जौन एलिया

 ऐ बेचैन मनो! यह ऐसा शहर है जहाँ लोग खुद ही कई रूपों में जीते हैं। यह बगुलों का शहर है — बाहर से सफ़ेद, भीतर से अलग। धरती धूल से भरी है, ...