Sunday, 8 September 2013

मेरे शब्द रूठे है

कुछ लिख नहीं पाने की बेबसी
शब्द खो जाने की उलझन सी
भीतर के अरमान टूट  है
मेरे शब्द मुझसे रूठे है

ये मेरा जो सहारा था
मेरे शब्दों ने जिसे गरोंदे में ढला था
वो सब बिखर गए
पानी के धार में बह गए
अब सिर्फ मैं, एक खली पन्ना
नीली सियाही बची है
मेरे संग कल तक थी जो
मेरे मान का रंग थी जो

वो मेरी कविता मुझसे रूठी है
ये भी इंसानों की तरह झूठी है

कल्पवृक्ष ! है हम सभी

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