Tuesday, December 15, 2015

आतंकवाद

कही किसी ने धर्म पर अपनी
राय दी
मानवता की मर्यादा को तोड़ता हुआ
असंवेदनशील टिप्पणी

कही किसी ने खेल खेला
ऐसा शतरंज का खेल जिसे
खेलता कोई है
पर मरते बस मोहरे है
मेरे शहर के मोहरे भी
खबर सुन सक्रिय हो गए
जुलुस निकला, नारा लगे
शहर आतंक में डूब गया
हर इन्सान डरा था

आतंक चेहरे पर पसरा था
उस दिन हर चेहरा आतंकवादी बन
जाने को तैयार था
अपने बचाव में हथियार उठाने को तैयार था
शहर में आतंकवाद ही आतंकवाद था


No comments:

Post a Comment

Thanks for visiting My Blog. Do Share your view and idea.

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम संसोधन 2020 ने करोड़ो को किया बेरोजगार

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम में सरकार ने सितम्बर के माह में रातों-रात संशोधन कर दिया। जिसके परिणाम स्वरुप करोडो लोग बेरोजगार हो गए। संस...