Friday, December 25, 2015

किताबे

मेरे सिरहाने रहकर भी
मुझसे रूठी है किताबे
कुछ टेबल पर,कुछ पलंग
नीचे जा छुपी
आधी पढ़ी, आधी बाकी
कोने में रखी किताबे

हमेश पढ़ी जाने के इंतजार में
अलमीरा में सजी किताबे
ख़ामोशी से जिंदगी का साथ निभाती

मेरी दोस्त किताबे..

Rinki

दोस्त पुराने

न जाने कितने दिनों के बाद कुछ दोस्तों से मुलाकात हुई मैं देखती उन्हें छूती उन्हें आँखों से पढ़ती यादों के पन्नों को...