तेरी
मोहब्बत अगर
पूरी इबादत
नहीं,
तो मैं उस
सजदे से उठ जाती हूँ।
क्योंकि आधा
प्रेम
ख़ुदा तक
नहीं पहुँचता,
वो बस दिल
को
थका देता
है।
तुझसे जुदा
होना
कोई हार
नहीं,
ये तो मेरी
रूह का
वुज़ू है।
तेरे पास
रहकर
खुद को गँवा
देना—
ये इश्क़
नहीं,
ये ग़फ़लत
है।
मुझे वो आग
चाहिए
जो जला कर
ख़ाली करे,
वो नहीं
जो सुलगाकर
राख में
बाँध दे।
अगर तू
मुकम्मल नहीं,
तो मेरा दूर
जाना ही
मेरी इबादत
है।
क्योंकि
अधूरा इश्क़
रूह को
टुकड़ों में
बाँट देता है।
तेरा न होना
मेरे आधा
होने से बेहतर है।
ख़ाली होना
टूटने से
बेहतर है।
मैं ख़ुद को
उस ख़ामोशी
में सौंपती हूँ
जहाँ कोई
नाम नहीं,
कोई दावा
नहीं—
सिर्फ़ सच
है।
और सच ये
है—
जो प्रेम
मुझे ख़ुदा तक न ले जाए,
उसे मैं
इश्क़ नहीं
कहती।
और सच ये है—
ReplyDeleteजो प्रेम मुझे ख़ुदा तक न ले जाए,
उसे मैं
इश्क़ नहीं कहती।
वाह!!!!
बहुत सुन्दर सार्थक सृजन ।
Thanks
Deleteआधा प्रेम ख़ुदा भी कबूल नहीं करता
ReplyDeleteवंदन
आपका हार्दिक आभार।
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 08 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार।
ReplyDeleteपूरा प्रभु आराधिये, पूरा जाका नाम, नानक पूरा पाइए, पूरे के गुण गाम
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार।
Deleteसुन्दर
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार।
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