Sunday, February 4, 2018

लोकतंत्र का ड्रामा देख

विदुर से नीति नहीं
चाणक्य चरित्र कहां
कुर्सी पर जा बैठे हैं

शकुनी-से मामा देख
कान्हा धनकुबेरों की
कोठियों में छुप गए
रो रहा खड़ा बेचारा
गली में सुदामा देख

आपस में हाथापाई
संसद अखाड़ा बनी
रोजाना ही हो रहा है
हो-हल्ला हंगामा देख
जन गण मन...
अधिनायक की जय बोलें
धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र
का ड्रामा देख
-
हलचल हरियाणवी
[हलचल हरियाणवी के चौके-छक्के, अर्पित प्रकाशन]

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