वह चलती नहीं वह सरकती है, जैसे चंद्रमा की रेखा सरकती हो शांत जल पर। उसकी गति में कोई शब्द नहीं, कोई संकोच नहीं वह स्त्री है, पर कोई साधारण नारी नहीं, वह गुप्तगामिनी है जो अपने देह को वस्त्र नहीं, मंत्र की भाँति पहनती है। उसकी देह कोई उद्घोष नहीं करती, वह मौन की मृदुलता से सजी है। वह लज्जा की रेखा पर नहीं, गर्व की गहराई पर खड़ी है एक ऐसी स्त्री, जो प्रेम को छिपाकर नहीं रखती, बल्कि उसे सहेजकर अपने भीतर जलाती है जैसे कोई अखंड दीप। उसके बालों में रात उलझी रहती है वे केशगुच्छ नहीं, तिमिर की तांत्रिक रस्सियाँ हैं। हर लट जैसे कोई रात्रिचर मंत्र, हर जूड़ा जैसे किसी प्रेम-पूजा की गांठ। वह जब चलती है, तो धरती पर कोई पदचिन्ह नहीं पड़ते क्योंकि वह केवल धरती पर नहीं, प्रेमी की स्मृति में चलती है। उसके अधर कोई निमंत्रण नहीं देते, किंतु उन्हें देख लेना ही किसी समाधि का प्रथम सोपान है। वह बोलती नहीं, पर उसके मौन में असंख्य आलिंगनों की आकांक्षा होती है। वह किसी अट्टहास की स्त्री नहीं वह उस मौन हँसी की नायिका है, जो रात्रि के तीसरे प्रहर में किसी प्रिय की नींद में उतर जाती है, जैसे कोई अनाम सुगंध। उसकी आँखें वे कोई दृष्टि नहीं देतीं, बल्कि स्पर्श का संकेत देती हैं। हर कटाक्ष किसी गुप्त ऋतु की पुकार, हर पलकपात कोई प्रणव है। वह वासना नहीं वह विरह के बाद का विशुद्ध स्पर्श है। वह रति में नहीं, रति से पहले की प्रतीक्षा में सुंदर है। वह मिलन की क्षणिक आह नहीं, बल्कि मिलन की पूर्णाहुति है। उसकी नाभि में कोई आभूषण नहीं, फिर भी वह नाभि कोई ज्योतिरलिंग है जहाँ एक ब्रह्मांड स्त्री होकर घूमता है। उसकी कटि वह वह घाट है, जहाँ कोई प्रेयसी होकर नहाता नहीं, बल्कि देह को त्यागता है। वह स्वप्न नहीं, स्वप्नों की वह रेखा है जो जागते समय भी आँखों में जलती है। उसकी जंघाएँ कोई श्रृंगार नहीं, चेतना की सीढ़ियाँ हैं, जिनसे चढ़कर कोई प्रिय उसके भीतर के देवालय में प्रवेश करता है। वह कोई रूपवती नहीं, क्योंकि उसका रूप कोई रंग नहीं एक अर्थ है। वह नायिका नहीं, क्योंकि नायिका होना केवल अभिनय है वह तो अधिनायिका है, जो स्वयं अपनी कथा रचती है, निभाती है, और विसर्जित कर देती है। वह जल में उतरती है, तो जल में गंध आ जाती है। वह चंदन नहीं लगाती, फिर भी देह से कोई अग्नि का सुवास उठता है। वह मंदिर नहीं जाती क्योंकि वह स्वयं एक चलायमान देवालय है। उसकी चाल में चित्त चंचल नहीं होता, बल्कि स्थिर हो जाता है जैसे किसी योगी को सहसा साक्षात्कार हो जाए। वह गुप्त है क्योंकि उसका प्रेम सस्ता नहीं, उसकी देह उपलब्ध नहीं, और उसकी आत्मा अशांत नहीं। वह वह स्त्री है, जिसे पाना संभव नहीं, और जिसमें विलीन होना अपरिहार्य। गुप्तगामिनी कोई नाम नहीं, कोई उपाधि नहीं वह एक स्त्री के भीतर की वह शाश्वत रात्रि है, जो हर युग में, हर देह में, हर प्रणय में अस्तित्व का सबसे सुंदर रहस्य बनकर उतरती है| -अजेष्ठ
Everyone does have a book in them. Here is few pages of my life, read it through by my stories,poetry and articles.
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गुप्तगामिनी – वह जो रात्रि की रेखा पर चलती है
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