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Sunday, July 26, 2026

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - "बोल"

 बोल, क्योंकि तुम्हारे होंठ अभी भी आज़ाद हैं।

बोल, क्योंकि तुम्हारी ज़ुबान अभी भी तुम्हारी अपनी है।

तुम्हारा यह सीधा और मज़बूत शरीर तुम्हारा है,
तुम्हारी जान भी अभी तुम्हारे पास है।

देखो, लोहार की भट्ठी में
आग की लपटें तेज़ हैं और लोहा लाल होकर तप रहा है।

अब ताले खुलने लगे हैं,
हर ज़ंजीर ढीली पड़ने लगी है।

बोल, यह थोड़ा-सा समय भी बहुत कीमती है,
इससे पहले कि शरीर और आवाज़ दोनों हमेशा के लिए शांत हो जाएँ।

बोल, क्योंकि सच अभी भी ज़िंदा है।
जो कुछ कहना है, निडर होकर कह डालो।

मेरे धागे लौटा दो, माधव

  मेरे धागे लौटा दो, माधव 1. मेरे धागे लौटा दो माधव, मेरी मन्नत अधूरी रह गई, जिस आस में बाँधा था धागा, वो आस कहीं दूर बह गई। तेरे द्वार पर स...