Friday, June 12, 2020

बू ----------सआदत हसन मंटो

बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे। सागवान के इस स्प्रिंगदार पलंग पर जो अब खिड़की के पास से थोड़ा इधर सरका दिया गया था एक घाटन लौंडिया रणधीर के साथ चिपटी हुई थी।
खिड़की के पास बाहर पीपल के नहाए हुए पत्ते रात के दूधिया अंधेरे में झूमरों की तरह थरथरा रहे थे और शाम के वक़्त जब दिन भर एक अंग्रेज़ी अख़बार की सारी ख़बरें और इश्तिहार पढ़ने के बाद कुछ सुनाने के लिए वो बालकनी में खड़ा हुआ था तो उसने उस घाटन लड़की को जो साथ वाले रस्सियों के कारख़ाने में काम करती थी और बारिश से बचने के लिए इमली के पेड़ के नीचे खड़ी थी, खांस खांस कर अपनी तरफ़ मुतवज्जा कर लिया था और उसके बाद हाथ के इशारे से ऊपर बुला लिया था।
वो कई दिन से शदीद क़िस्म की तन्हाई से उकता गया था। जंग के बाइस बंबई की तक़रीबन तमाम क्रिस्चियन छोकरियाँ जो सस्ते दामों मिल जाया करती थीं औरतों की अंग्रेज़ी फ़ौज में भर्ती होगई थीं, उनमें से कई एक ने फोर्ट के इलाक़े में डांस स्कूल खोल लिए थे जहां सिर्फ़ फ़ौजी गोरों को जाने की इजाज़त थी... रणधीर बहुत उदास होगया था।
उसकी अना का सबब तो ये था कि क्रिस्चियन छोकरियां नायाब होगई थीं और दूसरा ये कि फ़ौजी गोरों के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा मुहज़्ज़ब, तालीमयाफ़्ता और ख़ूबसूरत नौजवान उस पर फोर्ट के लगभग तमाम क्लबों के दरवाज़े बंद करदिए थे। उसकी चमड़ी सफ़ेद नहीं थी।
जंग से पहले रणधीर नागपाड़ा और ताजमहल होटल की कई मशहूर-ओ-मारूफ़ क्रिस्चियन लड़कियों से जिस्मानी तअल्लुक़ात क़ायम कर चुका था। उसे बख़ूबी इल्म था कि इस क़िस्म के तअल्लुक़ात की क्रिस्चियन लड़कों के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा मालूमात रखता था जिनसे ये छोकरियां आम तौर पर रोमांस लड़ाती हैं और बाद में किसी बेवक़ूफ़ से शादी कर लेती हैं।
रणधीर ने बस यूं ही हैजल से बदला लेने की ख़ातिर उस घाटन लड़की को इशारे पर बुलाया था। हैजल उसके फ़्लैट के नीचे रहती थी और हर रोज़ सुबह वर्दी पहन कर कटे हुए बालों पर ख़ाकी रंग की टोपी तिर्छे ज़ाविए से जमा कर बाहर निकलती थी और लड़कपन से चलती थी जैसे फुटपाथ पर चलने वाले सभी लोग टाट की तरह उसके रास्ते में बिछे चले जाऐंगे।
रणधीर सोचता था कि आख़िर क्यों वो इन क्रिस्चियन छोकरियों की तरफ़ इतना ज़्यादा माइल है। इसमें कोई शक नहीं कि वो अपने जिस्म की तमाम दिखाई जा सकने वाली अश्या की नुमाइश करती हैं। किसी क़िस्म की झिजक महसूस किए बग़ैर अपने कारनामों का ज़िक्र कर देती हैं। अपने बीते पुराने रोमांसों का हाल सुना देती हैं... ये सब ठीक है लेकिन किसी दूसरी लड़की में भी तो ये खासियतें हो सकती हैं।
रणधीर ने जब घाटन लड़की को इशारे से ऊपर बुलाया तो उसे किसी तरह भी इस बात का यक़ीन नहीं था कि वो उसे अपने साथ सुला लेगा लेकिन थोड़ी ही देर के बाद उसने उसके भीगे हुए कपड़े देख कर ये सोचा था कि कहीं ऐसा हो कि बेचारी को निमोनिया हो जाये तो रणधीर ने उससे कहा था, “ये कपड़े उतार दो। सर्दी लग जाएगी।”
वो रणधीर की इस बात का मतलब समझ गई थी क्योंकि उसकी आँखों में शर्म के लाल डोरे तैर गए थे लेकिन बाद में जब रणधीर ने उसे अपनी धोती निकाल कर दी तो उसने कुछ देर सोच कर अपना लहंगा उतार दिया। जिस पर मैल भीगने की वजह से और भी नुमायां होगया था। लहंगा उतार कर उसने एक तरफ़ रख दिया और जल्दी से धोती अपनी रानों पर डाल ली। फिर उसने अपनी तंग भिंची भिंची चोली उतारने की कोशिश की जिसके दोनों किनारों को मिला कर उसने एक गांठ दे रखी थी। वो गांठ उसके तंदुरुस्त सीने के नन्हे लेकिन समटीले गढ़े में छिप गई थी।
देर तक वो अपने घिसे हुए नाख़ुनों की मदद से चोली की गांठ खोलने की कोशिश करती रही जो भीगने की वजह से बहुत ज़्यादा मज़बूत होगई थी। जब थक हार कर बैठ गई तो उसने मराठी ज़बान में रणधीर से कुछ कहा जिसका मतलब ये था, “मैं क्या करूं... नहीं निकलती।”
रणधीर उसके पास बैठ गया और गांठ खोलने लगा। जब नहीं खुली तो उसने चोली के दोनों सिरों को दोनों हाथों में पकड़ कर इस ज़ोर से झटका दिया कि गांठ सरासर फैल गई और इसके साथ ही दो धड़कती हुई छातियां एक दम से नुमायां होगईं।
लम्हा भर के लिए रणधीर ने सोचा कि उसके अपने हाथों ने इस घाटन लड़की के सीने पर, नर्म नर्म गुँधी हुई मिट्टी को माहिर कुम्हार की तरह दो प्यालों की शक्ल बना दी है।
उसकी सेहत मंद छातियों में वही गुदगुदाहट, वही धड़कन, वही गोलाई, वही गर्मगर्म ठंडक थी जो कुम्हार के हाथों से निकले हुए ताज़ा बर्तनों में होती है।
मटमैले रंग की जवान छातियों में जो बिल्कुल कुंवारी थीं। एक अजीब-ओ-ग़रीब क़िस्म की चमक पैदा करदी थी जो चमक होते हुए भी चमक नहीं थी। उसके सीने पर ये ऐसे दीये मालूम होते थे जो तालाब के गदले पानी पर जल रहे थे।
बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह कपकपा रहे थे। लड़की के दोनों कपड़े जो पानी में शराबोर हो चुके थे एक गदले ढेर की सूरत में पड़े थे और वो रणधीर के साथ चिपटी हुई थी। उसके नंगे बदन की गर्मी उसके जिस्म में ऐसी हलचल सी पैदा कर रही थी जो सख़्त जाड़े के दिनों में नाइयों के गर्म हमामों में नहाते वक़्त महसूस हुआ करती है।
दिन भर वो रणधीर के साथ चिपटी रही... दोनों जैसे एक दूसरे के गड मड होगए थे। उन्होंने बमुशकिल एक दो बातें की होंगी। क्योंकि जो कुछ भी होरहा था सांसों, होंटों और हाथों से तय हो रहा था। रणधीर के हाथ सारी की छातियों पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे। छोटी छोटी चूचियां और मोटे-मोटे गोल दाने जो चारों तरफ़ एक स्याह दायरे की शक्ल में फैले हुए थे हवाई झोंकों से जाग उठते और उस घाटन लड़की के पूरे बदन में एक सरसराहट पैदा हो जाती कि ख़ुद रणधीर भी कपकपा उठता।
ऐसी कपकपाहटों से रणधीर का सैकड़ों बार वास्ता पड़ चुका था। वो उनको बख़ूबी जानता था। कई लड़कियों के नर्म-ओ-नाज़ुक और सख़्त सीनों से अपना सीना मिला कर कई कई रातें गुज़ार चुका था। वो ऐसी लड़कियों के साथ भी रह चुका था जो बिल्कुल उसके साथ लिपट कर घर की वो सारी बातें सुना दिया करती थीं जो किसी ग़ैर के लिए नहीं होतीं। वो ऐसी लड़कियों से भी जिस्मानी तअल्लुक़ क़ायम कर चुका था जो सारी मेहनत करती थीं और उसे कोई तकलीफ़ नहीं देती थीं... लेकिन ये घाटन लड़की जो पेड़ के नीचे भीगी हुई खड़ी थी और जिसे उसने इशारे से ऊपर बुला लिया था, मुख़्तलिफ़ क़िस्म की लड़की थी।
सारी रात रणधीर को उसके जिस्म से एक अजीब क़िस्म की बू आती रही थी। उस बू को जो ब-यक-वक़्त ख़ुशबू भी थी और बदबू भी... वो सारी रात पीता रहा। उसकी बग़लों से, उसकी छातियों से, उसके बालों से, उसके पेट से, जिस्म के हर हिस्से से ये जो बदबू भी थी और ख़ुश्बू भी, रणधीर के पूरे सरापा में बस गई थी। सारी रात वो सोचता रहा था कि ये घाटन लड़की बिल्कुल क़रीब होने पर भी हर्गिज़ इतनी क़रीब होती अगर उसके जिस्म से ये बू उड़ती... ये बू उसके दिल-ओ-दिमाग़ की हर सलवट में रेंग रही थी। उसके तमाम नए- पुराने महसूसात में रच गई थी।
उस बू ने उस लड़की और रणधीर को जैसे एक दूसरे से हम-आहंग कर दिया था। दोनों एक दूसरे में मुदग़म होगए थे। उन बेकरां गहराईयों में उतर गए थे जहां पहुंच कर इंसान एक ख़ालिस इंसानी तस्कीन से महज़ूज़ होता है। ऐसी तस्कीन जो लम्हाती होने पर भी जाविदां थी। मुसलसल तग़य्युर पज़ीर होने पर भी मज़बूत और मुस्तहकम थी। दोनों एक ऐसा जवाब बन गए थे जो आसमान के नीले ख़ला में माइल-ए-परवाज़ रहने पर भी दिखाई देता रहे।
उस बू को जो उस घाटन लड़की के अंग अंग से फूट रही थी रणधीर बख़ूबी समझता था लेकिन समझते हुए भी वो उसका तजज़िया नहीं कर सकता था। जिस तरह कभी मिट्टी पर पानी छिड़कने से सोंधी-सोंधी बू निकलती है... लेकिन नहीं, वो बू कुछ और तरह की थी। उसमें लैवेंडर और इत्र की आमेज़िश नहीं थी, वो बिल्कुल असली थी... औरत और मर्द के जिस्मानी तअल्लुक़ात की तरह असली और मुक़द्दस।
रणधीर को पसीने की बू से सख़्त नफ़रत थी। नहाने के बाद वो हमेशा बग़लों वग़ैरा में पाउडर छिड़कता था या कोई ऐसी दवा इस्तेमाल करता था जिससे वो बदबू जाती रहे लेकिन तअज्जुब है कि उसने कई बार... हाँ कई बार उस घाटन लड़की की बालों भरी बग़लों को चूमा और उसे बिल्कुल घिन नहीं आई बल्कि अजीब क़िस्म की तस्कीन का एहसास हुआ। रणधीर को ऐसा लगता था कि वो उसे पहचानता है। उसके मानी भी समझता है लेकिन किसी और को नहीं समझा सकता।
बरसात के यही दिन थे... यूं ही खिड़की के बाहर जब उसने देखा तो पीपल इसी तरह नहा रहे थे। हवा में सरसराहटें और फड़फड़ाहटें घुली हुई थीं।
उसमें दबी-दबी धुंदली सी रौशनी समाई हुई थी। जैसे बारिश की बूंदों का हल्का फुलका गुबार नीचे उतर आया हो... बरसात के यही दिन थे जब मेरे कमरे में सागवान का सिर्फ़ एक ही पलंग था। लेकिन अब इसके साथ एक और पलंग भी था और कोने में एक नई ड्रेसिंग टेबल भी मौजूद थी। दिन लंबे थे, मौसम भी बिल्कुल वैसा ही था। बारिश की बूंदों के हमराह सितारों की तरह उसका गुबार सा इसी तरह उतर रहा था लेकिन फ़िज़ा में हिना के इत्र की तेज़ ख़ुश्बू बसी हुई थी।
दूसरा पलंग ख़ाली था। उस पलंग पर रणधीर औंधे मुँह लेटा खिड़की के बाहर पीपल के पत्तों पर बारिश की बूंदों का रक़्स देख रहा था। एक गोरी चिट्टी लड़की जिस्म को चादर में छिपाने की नाकाम कोशिश करते करते क़रीब-क़रीब सो गई। उसकी सुर्ख़ रेशमी शलवार दूसरे पलंग पर पड़ी थी जिसके गहरे सुर्ख़ रंग का एक फुंदना नीचे लटक रहा था। पलंग पर उसके दूसरे उतारे कपड़े भी पड़े थे। सुनहरी फूलदार जंपर, अंगिया, जंगिया और दुपट्टा सुर्ख़ था। गहरा सुर्ख़ और इन सब में हिना के इत्र की तेज़ ख़ुश्बू बसी हुई थी। लड़की के स्याह बालों में मुक्क़ेश के ज़र्रे धूल के ज़र्रों की तरह जमे हुए थे। चेहरे पर पाउडर, सुर्ख़ी और मुक्क़ेश के इन ज़र्रों ने मिल जुल कर एक अजीब रंग बिखेर दिया था... बेनाम सा उड़ा उड़ा रंग और उसके गोरे सीने पर कच्चे रंग के जगह जगह सुर्ख़ धब्बे बना दिए थे।
छातियां दूध की तरह सफ़ेद थीं... उनमें हल्का-हल्का नीलापन भी था। बग़लों के बाल मुंडे हुए थे जिसकी वजह से वहां सुरमई गुबार सा पैदा हो गया था।
रणधीर उस लड़की की तरफ़ देख देख कर कई बार सोच चुका था... क्या ऐसा नहीं लगता जैसे मैंने अभी अभी कीलें उखेड़ कर उसको लकड़ी के बंद बक्स में से निकाला हो।
किताबों और चीनी के बर्तनों पर हल्की हल्की ख़राशें पड़ जाती हैं, ठीक उसी तरह उस लड़की के जिस्म पर भी कई निशान थे।
जब रणधीर ने उसकी तंग और चुस्त अंगिया की डोरियां खोली थीं तो उसकी पीठ पर और सामने सीने पर नर्म नर्म गोश्त पर झुर्रियां सी बनी हुई थीं और कमर के चारों तरफ़ कस कर बांधे हुए इज़ारबंद का निशान... वज़नी और नुकीले जड़ाऊ नेकलस से उसके सीने पर कई जगह ख़राशें पड़ गई थीं। जैसे नाखुनों से बड़े ज़ोर से खुजाया गया हो।
बरसात के वही दिन थे। पीपल के नर्म नर्म पत्तों पर बारिश की बूंदें गिरने से वैसी ही आवाज़ पैदा होरही थी जैसी रणधीर उस दिन सारी रात सुनता रहा था। मौसम बेहद सुहाना था। ठंडी ठंडी हवा चल रही थी लेकिन उसमें हिना के इत्र की तेज़ ख़ुश्बू घुली हुई थी।
रणधीर के हाथ बहुत देर तक उस गोरी चिट्टी लड़की के कच्चे दूध की तरह सफ़ेद सीने पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे थे। उसकी उंगलियों ने उस गोरे गोरे बदन में कई चिनगारियां दौड़ती हुई महसूस की थीं। इस नाज़ुक बदन में कई जगहों पर सिमटी हुई कपकपाहटों का भी उसे पता चला था जब उसने अपना सीना उसके सीने के साथ मिलाया तो रणधीर के जिस्म के हर रोंगटे ने उस लड़की के बदन के छिड़े हुए तारों की भी आवाज़ सुनी थी... मगर वो आवाज़ कहाँ थी?
वो पुकार जो उसने घाटन लड़की के बदन में देखी थी... वो पुकार जो दूध के प्यासे बच्चे के रोने से ज़्यादा होती है, वो पुकार जो हल्का-ए-ख़्वाब से निकल कर बेआवाज़ हो गई थी।
रणधीर खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके बिल्कुल क़रीब ही पीपल के नहाते हुए पत्ते थरथरा रहे थे। वो उनकी मस्ती भरी कपकपाहटों के उस पार कहीं बहुत दूर देखने की कोशिश कर रहा था जहां मठीले बादलों में अजीब-ओ-ग़रीब क़िस्म की रौशनी घुली हुई दिखाई दे रही थी... ठीक वैसे ही जैसी उस घाटन लड़की के सीने में उसे नज़र आती थी। ऐसी पुरअसरार गुफ़्तगु की तरह दबी लेकिन वाज़ेह थी।
रणधीर के पहलू में एक गोरी चिट्टी लड़की... जिसका जिस्म दूध और घी में गुँधे मैदे की तरह मुलाइम था, लेटी थी... उसके नींद से माते बदन से हिना के इत्र की ख़ुश्बू आरही थी... जो अब थकी थकी सी मालूम होती थी। रणधीर को ये दम तोड़ती और जनों की हुई ख़ुश्बू बहुत बुरी मालूम हुई। उसमें कुछ खटास थी... एक अजीब क़िस्म की जैसी बदहज़मी के डकारों में होती है। उदास... बेरंग... बेचैन।
रणधीर ने अपने पहलू में लेटी हुई लड़की की तरफ़ देखा। जिस तरह फटे हुए दूध के बेरंग पानी में सफ़ेद मुर्दा फुटकियां तैरने लगती हैं उसी तरह उस लड़की के जिस्म पर ख़राशें और धब्बे तैर रहे थे और वो हिना के इत्र की ऊटपटांग ख़ुश्बू... रणधीर के दिल-ओ-दिमाग़ में वो बू बसी हुई थी जो उस घाटन लड़की के जिस्म से बना किसी कोशिश के अज़ ख़ुद निकल रही थी। वो बू जो हिना के इत्र से कहीं ज़्यादा हल्की फुल्की और दबी हुई थी जिसमें सूंघे जाने की कोशिश शामिल नहीं थी। वो ख़ुदबख़ुद नाक के अंदर घुस कर अपनी सही मंज़िल पर पहुंच जाती थी।
रणधीर ने आख़िरी कोशिश के तौर पर उस लड़की के दूधिया जिस्म पर हाथ फेरा लेकिन कपकपी महसूस हुई... उसकी नई नवेली बीवी जो एक फ़र्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट की बीवी थी, जिसने बी.ए. तक तालीम हासिल की थी और जो अपने कॉलिज के सैकड़ों लड़कों के दिलों की धड़कन थी, रणधीर की किसी भी हिस्स को छू सकी। वो हिना की ख़ुशबू में उस बू को तलाश कर रहा था जो उन्हीं दिनों में जबकि खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते बारिश में नहा रहे थे। इस घाटन लड़की के मैले बदन से आई थी।

Monday, June 1, 2020

खोल दो- सआदत हसन मंटो

अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए।
सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं। वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं देता था। कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था। उसके होशो-हवास गायब थे। उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था।


गंदले आसमान की तरफ बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं। तेज रोशनी उसके अस्तित्व की रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा। ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं-लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना...सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इनसानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया।


पूरे तीन घंटे बाद वह ‘सकीना-सकीना’ पुकारता कैंप की खाक छानता रहा, मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न मिला। चारों तरफ एक धांधली-सी मची थी। कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई मां, कोई बीबी और कोई बेटी। सिराजुद्दीन थक-हारकर एक तरफ बैठ गया और मस्तिष्क पर जोर देकर सोचने लगा कि सकीना उससे कब और कहां अलग हुई, लेकिन सोचते-सोचते उसका दिमाग सकीना की मां की लाश पर जम जाता, जिसकी सारी अंतड़ियां बाहर निकली हुईं थीं। उससे आगे वह और कुछ न सोच सका।
सकीना की मां मर चुकी थी। उसने सिराजुद्दीन की आंखों के सामने दम तोड़ा था, लेकिन सकीना कहां थी , जिसके विषय में मां ने मरते हुए कहा था, "मुझे छोड़ दो और सकीना को लेकर जल्दी से यहां से भाग जाओ।"
सकीना उसके साथ ही थी। दोनों नंगे पांव भाग रहे थे। सकीना का दुप्पटा गिर पड़ा था। उसे उठाने के लिए उसने रुकना चाहा था। सकीना ने चिल्लाकर कहा था "अब्बाजी छोड़िए!" लेकिन उसने दुप्पटा उठा लिया था।....यह सोचते-सोचते उसने अपने कोट की उभरी हुई जेब का तरफ देखा और उसमें हाथ डालकर एक कपड़ा निकाला, सकीना का वही दुप्पटा था, लेकिन सकीना कहां थी?


सिराजुद्दीन ने अपने थके हुए दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर वह किसी नतीजे पर न पहुंच सका। क्या वह सकीना को अपने साथ स्टेशन तक ले आया था?- क्या वह उसके साथ ही गाड़ी में सवार थी?- रास्ते में जब गाड़ी रोकी गई थी और बलवाई अंदर घुस आए थे तो क्या वह बेहोश हो गया था, जो वे सकीना को उठा कर ले गए?
सिराजुद्दीन के दिमाग में सवाल ही सवाल थे, जवाब कोई भी नहीं था। उसको हमदर्दी की जरूरत थी, लेकिन चारों तरफ जितने भी इनसान फंसे हुए थे, सबको हमदर्दी की जरूरत थी। सिराजुद्दीन ने रोना चाहा, मगर आंखों ने उसकी मदद न की। आंसू न जाने कहां गायब हो गए थे।
छह रोज बाद जब होश-व-हवास किसी कदर दुरुसत हुए तो सिराजुद्दीन उन लोगों से मिला जो उसकी मदद करने को तैयार थे। आठ नौजवान थे, जिनके पास लाठियां थीं, बंदूकें थीं। सिराजुद्दीन ने उनको लाख-लाख दुआऐं दीं और सकीना का हुलिया बताया, गोरा रंग है और बहुत खूबसूरत है... मुझ पर नहीं अपनी मां पर थी...उम्र सत्रह वर्ष के करीब है।...आंखें बड़ी-बड़ी...बाल स्याह, दाहिने गाल पर मोटा सा तिल...मेरी इकलौती लड़की है। ढूंढ लाओ, खुदा तुम्हारा भला करेगा।


रजाकार नौजवानों ने बड़े जज्बे के साथ बूढे¸ सिराजुद्दीन को यकीन दिलाया कि अगर उसकी बेटी जिंदा हुई तो चंद ही दिनों में उसके पास होगी।
आठों नौजवानों ने कोशिश की। जान हथेली पर रखकर वे अमृतसर गए। कई मर्दों और कई बच्चों को निकाल-निकालकर उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। दस रोज गुजर गए, मगर उन्हें सकीना न मिली।


एक रोज इसी सेवा के लिए लारी पर अमृतसर जा रहे थे कि छहररा के पास सड़क पर उन्हें एक लड़की दिखाई दी। लारी की आवाज सुनकर वह बिदकी और भागना शुरू कर दिया। रजाकारों ने मोटर रोकी और सबके-सब उसके पीछे भागे। एक खेत में उन्होंने लड़की को पकड़ लिया। देखा, तो बहुत खूबसूरत थी। दाहिने गाल पर मोटा तिल था। एक लड़के ने उससे कहा, घबराओ नहीं-क्या तुम्हारा नाम सकीना है?
लड़की का रंग और भी जर्द हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जब तमाम लड़कों ने उसे दम-दिलासा दिया तो उसकी दहशत दूर हुई और उसने मान लिया कि वो सराजुद्दीन की बेटी सकीना है।
आठ रजाकार नौजवानों ने हर तरह से सकीना की दिलजोई की। उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया और लारी में बैठा दिया। एक ने अपना कोट उतारकर उसे दे दिया, क्योंकि दुपट्टा न होने के कारण वह बहुत उलझन महसूस कर रही थी और बार-बार बांहों से अपने सीने को ढकने की कोशिश में लगी हुई थी।
कई दिन गुजर गए- सिराजुद्दीन को सकीना की कोई खबर न मिली। वह दिन-भर विभिन्न कैंपों और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता, लेकिन कहीं भी उसकी बेटी का पता न चला। रात को वह बहुत देर तक उन रजाकार नौजवानों की कामयाबी के लिए दुआएं मांगता रहता, जिन्होंने उसे यकीन दिलाया था कि अगर सकीना जिंदा हुई तो चंद दिनों में ही उसे ढूंढ निकालेंगे।
एक रोज सिराजुद्दीन ने कैंप में उन नौजवान रजाकारों को देखा। लारी में बैठे थे। सिराजुद्दीन भागा-भागा उनके पास गया। लारी चलने ही वाली थी कि उसने पूछा-बेटा, मेरी सकीना का पता चला?
सबने एक जवाब होकर कहा, चल जाएगा, चल जाएगा। और लारी चला दी। सिराजुद्दीन ने एक बार फिर उन नौजवानों की कामयाबी की दुआ मांगी और उसका जी किसी कदर हलका हो गया।
शाम को करीब कैंप में जहां सिराजुद्दीन बैठा था, उसके पास ही कुछ गड़बड़-सी हुई। चार आदमी कुछ उठाकर ला रहे थे। उसने मालूम किया तो पता चला कि एक लड़की रेलवे लाइन के पास बेहोश पड़ी थी। लोग उसे उठाकर लाए हैं। सिराजुद्दीन उनके पीछे हो लिया। लोगों ने लड़की को अस्पताल वालों के सुपुर्द किया और चले गए।
कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा। फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया। कमरे में कोई नहीं था। एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी। सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा। कमरे में अचानक रोशनी हुई। सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना


डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है?
सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं...जी मैं...इसका बाप हूं।
डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो।
सकीना के मुद्रा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी। बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है-। डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया।

Wednesday, May 27, 2020

#Menstrual Hygiene Day


#Menstrual Hygiene Day


Many studies show that adolescents girls drop out of school because of a lack of proper toilets in school. Menstrual hygiene is not in the school curriculum and even this is not a discussion point of the family and society. It's been assumed that a girl can tackle it on their own.

The slogan “menstruation do not stop in the pandemic” reflects the situation of millions of girls in India. Limited stock of sanitary napkin in shops, non-ability of the sanitary napkin in health centers, and lack of political commitment towards adolescent girl’s hygiene and health and pandemic Coronavirus added on the issue.

#BreakTheSlience, #SpeakUp, Girls of India set to talk on the non-discus sable topic of Indian society openly. #CreateAwearenessMenstrual Hygiene.



Monday, May 25, 2020

ठंडा गोश्त- सआदत हसन मंटो

ईश्वर सिंह ज्यों ही होटल के कमरे में दांखिला हुआ, कुलवन्त कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज-तेज आँखों से उसकी तरफ घूरकर देखा और दरवाजे की चिटखनी बन्द कर दी। रात के बारह बज चुके थे। शहर का वातावरण एक अजीब रहस्यमयी खामोशी में गर्क था।
कुलवन्त कौर पलंग पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गयी। ईशर सिंह, जो शायद अपने समस्यापूर्ण विचारों के उलझे हुए धागे खोल रहा था, हाथ में किरपान लेकर उस कोने में खड़ा था। कुछ क्षण इसी तरह खामोशी में बीत गये। कुलवन्त कौर को थोड़ी देर के बाद अपना आसन पसन्द न आया और दोनों टाँगें पलंग के नीचे लटकाकर उन्हें हिलाने लगी। ईशर सिंह फिर भी कुछ न बोला।
कुलवन्त कौर भरे-भरे हाथ-पैरों वाली औरत थी। चौड़े-चकले कूल्हे थुल-थुल करने वाले गोश्त से भरपूर। कुछ बहुत ही ज्यादा ऊपर को उठा हुआ सीना, तेज आँखें, ऊपरी होंठ पर सुरमई गुबार, ठोड़ी की बनावट से पता चलता था कि बड़े धड़ल्ले की औरत है।
ईशर सिंह सिर नीचा किये एक कोने में चुपचाप खड़ा था। सिर पर उसके कसकर बाँधी हुई पगड़ी ढीली हो रही थी। उसने हाथ में जो किरपान थामी हुई थी, उसमें थोड़ी-थोड़ी कम्पन थी, उसके आकार-प्रकार और डील-डौल से पता चलता था कि वह कुलवन्त कौर जैसी औरत के लिए सबसे उपयुक्त मर्द है।
कुछ क्षण जब इसी तरह खामोशी में बीत गये तो कुलवन्त कौर छलक पड़ी, लेकिन तेज-तेज आँखों को नचाकर वह सिर्फ इस कदर कह सकी—”ईशरसियाँ!”
ईशर सिंह ने गर्दन उठाकर कुलवन्त कौर की तरफ देखा, मगर उसकी निगाहों की गोलियों की ताब न लाकर मुँह दूसरी तरफ मोड लिया।
कुलवन्त कौर चिल्लायी—”ईशर सिंह!” लेकिन फौरन ही आवांज भींच ली, पलंग पर से उठकर उसकी तरफ होती हुई बोली—”कहाँ गायब रहे तुम इतने दिन?”
ईशर सिंह ने खुश्क होठों पर जबान फेरी, “मुझे मालूम नहीं।”
कुलवन्त कौर भन्ना गयी, “यह भी कोई माइयावाँ जवाब है!”
ईशर सिंह ने किरपान एक तरफ फेंक दी और पलंग पर लेट गया। ऐसा मालूम होता था, वह कई दिनों का बीमार है। कुलवन्त कौर ने पलंग की तरफ देखा, जो अब ईशर सिंह से लबालब भरा था और उसके दिल में हमदर्दी की भावना पैदा हो गयी। चुनांचे उसके माथे पर हाथ रखकर उसने बड़े प्यार से पूछा—”जानी, क्या हुआ तुम्हें?”
ईशर सिंह छत की तरफ देख रहा था। उससे निगाहें हटाकर उसने कुलवन्त कौर ने परिचित चेहरे की टटोलना शुरू किया—”कुलवन्त।”
आवांज में दर्द था। कुलवन्त कौर सारी-की-सारी सिमटकर अपने ऊपरी होंठ में आ गयी, “हाँ, जानी।” कहकर वह उसको दाँतों से काटने लगी।
ईशर सिंह ने पगड़ी उतार दी। कुलवन्त कौर की तरफ सहारा लेनेवाली निगाहों से देखा। उसके गोश्त भरे कुल्हे पर जोर से थप्पा मारा और सिर को झटका देकर अपने-आपसे कहा, “इस कुड़ी दा दिमांग ही खराब है।”
झटके देने से उसके केश खुल गये। कुलवन्त अँगुलियों से उनमें कंघी करने लगी। ऐसा करते हुए उसने बड़े प्यार से पूछा, “ईशरसियाँ, कहाँ रहे तुम इतने दिन?”
“बुरे की मां के घर।” ईशर सिंह ने कुलवन्त कौर को घूरकर देखा और फौरन दोनों हाथों से उसके उभरे हुए सीने को मसलने लगा—”कसम वाहे गुरु की, बड़ी जानदार औरत हो!”
कुलवन्त कौर ने एक अदा के साथ ईशर सिंह के हाथ एक तरफ झटक दिये और पूछा, “तुम्हें मेरी कसम, बताओ कहाँ रहे?—शहर गये थे?”
ईशर सिंह ने एक ही लपेट में अपने बालों का जूड़ा बनाते हुए जवाब दिया, “नहीं।”
कुलवन्त कौर चिढ़ गयी, “नहीं, तुम जरूर शहर गये थे—और तुमने बहुत-सा रुपया लूटा है, जो मुझसे छुपा रहे हो।”
“वह अपने बाप का तुख्म न हो, जो तुमसे झूठ बोले।”
कुलवन्त कौर थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी, लेकिन फौरन ही भड़क उठी, “लेकिन मेरी समझ में नहीं आता उस रात तुम्हें हुआ क्या?—अच्छे-भले मेरे साथ लेटे थे। मुझे तुमने वे तमाम गहने पहना रखे थे, जो तुम शहर से लूटकर लाए थे। मेरी पप्पियाँ ले रहे थे। पर जाने एकदम तुम्हें क्या हुआ, उठे और कपड़े पहनकर बाहर निकल गये।”
ईशर सिंह का रंग जर्द हो गया। कुलवन्त ने यह तबदीली देखते ही कहा, “देखा, कैसे रंग पीला पड़ गया ईशरसियाँ, कसम वाहे गुरु की, जरूर कुछ दाल में काला है।”
“तेरी जान कसम, कुछ भी नहीं!”
ईशर सिंह की आवांज बेजान थी। कुलवन्त कौर का शुबहा और ज्यादा मजबूत हो गया। ऊपरी होंठ भींचकर उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा, “ईशरसियाँ, क्या बात है, तुम वह नहीं हो, जो आज से आठ रोज पहले थे।”
ईशर सिंह एकदम उठ बैठा, जैसे किसी ने उस पर हमला किया था। कुलवन्त कौर को अपने मजबूत बाजुओं में समेटकर उसने पूरी ताकत के साथ झ्रझोड़ना शुरू कर दिया, “जानी, मैं वहीं हूं—घुट-घुट कर पा जफ्फियाँ, तेरी निकले हड्डाँ दी गर्मी।”
कुलवन्त कौर ने कोई बाधा न दी, लेकिन वह शिकायत करती रही, “तुम्हें उस रात क्या हो गया था?”
“बुरे की मां का वह हो गया था!”
“बताओगे नहीं?”
“कोई बात हो तो बताऊँ।”
“मुझे अपने हाथों से जलाओ, अगर झूठ बोलो।”
ईशर सिंह ने अपने बाजू उसकी गर्दन में डाल दिये और होंठ उसके होंठ पर गड़ा दिए। मूँछों के बाल कुलवन्त कौर के नथूनों में घुसे, तो उसे छींक आ गयी। ईशर सिंह ने अपनी सरदी उतार दी और कुलवन्त कौर को वासनामयी नंजरों से देखकर कहा, “आओ जानी, एक बाजी ताश की हो जाए।”
कुलवन्त कौर के ऊपरी होंठ पर पसीने की नन्ही-नन्ही बूंदें फूट आयीं। एक अदा के साथ उसने अपनी आँखों की पुतलियाँ घुमायीं और कहा, “चल, दफा हो।”
ईशर सिंह ने उसके भरे हुए कूल्हे पर जोर से चुटकी भरी। कुलवन्त कौर तड़पकर एक तरफ हट गयी, “न कर ईशरसियाँ, मेरे दर्द होता है!”
ईशर सिंह ने आगे बढ़कर कुलवन्त कौर की ऊपरी होंठ अपने दाँतों तले दबा लिया और कचकचाने लगा। कुलवन्त कौर बिलकुल पिघल गयी। ईशर सिंह ने अपना कुर्ता उतारकर फेंक दिया और कहा, “तो फिर हो जाए तुरप चाल।”
कुलवन्त कौर का ऊपरी होंठ कँपकँपाने लगा। ईशर सिंह ने दोनों हाथों से कुलवन्त कौर की कमीज का बेरा पकड़ा और जिस तरह बकरे की खाल उतारते हैं, उसी तरह उसको उतारकर एक तरफ रख दिया। फिर उसने घूरकर उसके नंगे बदन को देखा और जोर से उसके बाजू पर चुटकी भरते हुए कहा—”कुलवन्त, कसम वाहे गुरु की! बड़ी करारी औरत हो तुम।”
कुलवन्त कौर अपने बाजू पर उभरते हुए धब्बे को देखने लगी। “बड़ा जालिम है तू ईशरसियाँ।”
ईशर सिंह अपनी घनी काली मूँछों में मुस्काया, “होने दे आज जालिम।” और यह कहकर उसने और जुल्म ढाने शुरू किये। कुलवन्त कौन का ऊपरी होंठ दाँतों तले किचकिचाया, कान की लवों को काटा, उभरे हुए सीने को भँभोडा, भरे हुए कूल्हों पर आवांज पैदा करने वाले चाँटे मारे, गालों के मुंह भर-भरकर बोसे लिये, चूस-चूसकर उसका सीना थूकों से लथेड़ दिया। कुलवन्त कौर तेंज आँच पर चढ़ी हुई हांड़ी की तरह उबलने लगी। लेकिन ईशर सिंह उन तमाम हीलों के बावजूद खुद में हरकत पैदा न कर सका। जितने गुर और जितने दाँव उसे याद थे, सबके-सब उसने पिट जाने वाले पहलवान की तरह इस्तेमाल कर दिये, परन्तु कोई कारगर न हुआ। कुलवन्त कौर के सारे बदन के तार तनकर खुद-ब-खुद बज रहे थे, गैरजरूरी छेड़-छाड़ से तंग आकर कहा, “ईश्वरसियाँ, काफी फेंट चुका है, अब पत्ता फेंक !”
यह सुनते ही ईशर सिंह के हाथ से जैसे ताश की सारी गड्डी नीचे फिसल गयी। हाँफता हुआ वह कुलवन्त के पहलू में लेट गया और उसके माथे पर सर्द पसीने के लेप होने लगे।
कुलवन्त कौर ने उसे गरमाने की बहुत कोशिश की, मगर नाकाम रही। अब तक सब कुछ मुंह से कहे बगैर होता रहा था, लेकिन जब कुलवन्त कौर के क्रियापेक्षी अंगों को सख्त निराशा हुई तो वह झल्लाकर पलंग से उतर गयी। सामने खूँटी पर चादर पड़ी थी, उसे उतारकर उसने जल्दी-जल्दी ओढ़कर और नथुने फुलाकर बिफरे हुए लहजे में कहा, “ईशरसियाँ, वह कौन हरामजादी है, जिसके पास तू इतने दिन रहकर आया है और जिसने तुझे निचोड़ डाला है?”
कुलवन्त कौर गुस्से से उबलने लगी, “मैं पूछती हूं, कौन है वह चड्डो—है वह उल्फती, कौन है वह चोर-पत्ता?”
ईशर सिंह ने थके हुए लहजे में कहा, “कोई भी नहीं कुलवन्त, कोई भी नहीं।”
कुलवन्त कौर ने अपने उभरे हुए कूल्हों पर हाथ रखकर एक दृढ़ता के साथ कहा—”ईशरसियाँ! मैं आज झूठ-सच जानकर रहूँगी—खा वाहे गुरु जी की कसम—इसकी तह में कोई औरत नहीं?”
ईशर सिंह ने कुछ कहना चाहा, मगर कुलवन्त कौर ने इसकी इजाजत न दी,
“कसम खाने से पहले सोच ले कि मैं भी सरदार निहाल सिंह की बेटी हूं तक्का-बोटी कर दूँगी अगर तूने झूठ बोला—ले, अब खा वाहे गुरु जी की कसम—इसकी तह में कोई औरत नहीं?”
ईशर सिंह ने बड़े दु:ख के साथ हाँ में सिर हिलाया। कुलवन्त कौर बिलकुल दीवानी हो गयी। लपककर कोने में से किरपान उठायी। म्यान को केले के छिलके की तरह उतारकर एक तरफ फेंका और ईशर सिंह पर वार कर दिया।
आन-की-आन में लहू के फव्वारे छूट पड़े। कुलवन्त कौर को इससे भी तसल्ली न हुई तो उसने वहशी बिल्लियों की तरह ईशर सिंह के केश नोचने शुरू कर दिये। साथ-ही-साथ वह अपनी नामालूम सौत को मोटी-मोटी गालियाँ देती रही। ईशर सिंह ने थोड़ी देर बाद दुबली आवांज में विनती की, “जाने दे अब कुलवन्त, जाने दे।”
आवांज में बला का दर्द था। कुलवन्त कौर पीछे हट गयी।
खून ईशर सिंह के गले में उड़-उड़ कर उसकी मूँछों पर गिर रहा था। उसने अपने काँपते होंठ खोले और कुलवन्त कौर की तरफ शुक्रियों और शिकायतों की मिली-जुली निगाहों से देखा।
“मेरी जान, तुमने बहुत जल्दी की—लेकिन जो हुआ, ठीक है।”
कुलवन्त कौर कीर् ईष्या फिर भड़की, “मगर वह कौन है, तेरी मां?”
लहू ईशर सिंह की जबान तक पहुँच गया। जब उसने उसका स्वाद चखा तो उसके बदले में झुरझुरी-सी दौड़ गयी।
“और मैं...और मैं भेनी या छ: आदमियों को कत्ल कर चुका हूं—इसी किरपान से।”
कुलवन्त कौर के दिमाग में दूसरी औरत थी—”मैं पूछती हूं कौन है वह हरामजादी?”
ईशर सिंह की आँखें धुँधला रही थीं। एक हल्की-सी चमक उनमें पैदा हुई और उसने कुलवन्त कौर से कहा, “गाली न दे उस भड़वी को।”
कुलवन्त कौर चिल्लायी, “मैं पूछती हूं, वह कौन?”
ईशर सिंह के गले में आवांज रुँध गयी—”बताता हूं,” कहकर उसने अपनी गर्दन पर हाथ फेरा और उस पर अपनी जीता-जीता खून देखकर मुस्कराया, “इनसान माइयाँ भी एक अजीब चीज है।”
कुलवन्त कौर उसके जवाब का इन्तजार कर रही थी, “ईशर सिंह, तू मतलब की बात कर।”
ईशर सिंह की मुस्कराहट उसकी लहू भरी मूँछों में और ज्यादा फैल गयी, “मतलब ही की बात कर रहा हूं—गला चिरा हुआ है माइयाँ मेरा—अब धीरे-धीरे ही सारी बात बताऊँगा।”
और जब वह बताने लगा तो उसके माथे पर ठंडे पसीने के लेप होने लगे, “कुलवन्त ! मेरी जान—मैं तुम्हें नहीं बता सकता, मेरे साथ क्या हुआ?—इनसान कुड़िया भी एक अजीब चीज है—शहर में लूट मची तो सबकी तरह मैंने भी इसमें हिस्सा लिया—गहने-पाते और रुपये-पैसे जो भी हाथ लगे, वे मैंने तुम्हें दे दिये—लेकिन एक बात तुम्हें न बतायी?”
ईशर सिंह ने घाव में दर्द महसूस किया और कराहने लगा। कुलवन्त कौन ने उसकी तरफ तवज्जह न दी और बड़ी बेरहमी से पूछा, “कौन-सी बात?” ईशर सिंह ने मूँछों पर जमे हुए जरिए उड़ाते हुए कहा, “जिस मकान पर...मैंने धावा बोला था...उसमें सात...उसमें सात आदमी थे—छ: मैंने कत्ल कर दिये...इसी किरपान से, जिससे तूने मुझे...छोड़ इसे...सुन...एक लड़की थी, बहुत ही सुन्दर, उसको उठाकर मैं अपने साथ ले आया।”
कुलवन्त कौर खामोश सुनती रही। ईशर सिंह ने एक बार फिर फूँक मारकर मूँछों पर से लहू उड़ाया—कुलवन्ती जानी, मैं तुमसे क्या कहूँ, कितनी सुन्दर थी—मैं उसे भी मार डालता, पर मैंने कहा, “नहीं ईशरसियाँ, कुलवन्त कौर ते हर रोज मजे लेता है, यह मेवा भी चखकर देख!”
कुलवन्त कौर ने सिर्फ इस कदर कहा, “हूं।”
“और मैं उसे कन्धे पर डालकर चला दिया...रास्ते में...क़्या कह रहा था मैं...हाँ, रास्ते में...नहर की पटरी के पास, थूहड़ की झाड़ियों तले मैंने उसे लिटा दिया—पहले सोचा कि फेंटूँ, फिर खयाल आया कि नहीं...” यह कहते-कहते ईशर सिंह की जबान सूख गयी।
कुलवन्त ने थूक निकलकर हलक तर किया और पूछा, “फिर क्या हुआ?”
ईशर सिंह के हलक से मुश्किल से ये शब्द निकले, “मैंने...मैंने पत्ता फेंका...लेकिन...लेकिन...।”
उसकी आवाज डूब गयी।
कुलवन्त कौर ने उसे झिंझोड़ा, “फिर क्या हुआ?”
ईशर सिंह ने अपनी बन्द होती आँखें खोलीं और कुलवन्त कौर के जिस्म की तरफ देखा, जिसकी बोटी-बोटी थिरक रही थी—”वह...वह मरी हुई थी...लाश थी...बिलकुल ठंडा गोश्त...जानी, मुझे अपना हाथ दे...!”
कुलवन्त कौर ने अपना हाथ ईशर सिंह के हाथ पर रखा जो बर्फ से भी ज्यादा ठंडा था।

रब की तलाश

पहला कदम था प्यार का , दिल में जागी एक चाहत , किसी का नाम मालूम न था , बस मन में थी तड़प-इबादत। फिर पास आने की आरज़ू जगी ,   याद म...