Wednesday, January 24, 2018

प्रेम परीक्षा


कहत कबीरा प्रेम जैसे लम्बा पेड़ खजूर
चढ़े तो प्रेम रस मिले
गिरे तो चकनाचूर

प्रेम जैसे अग्नि परीक्षा
जो पार न किया तो खाक
पार कर जाने पर भी वनवास

प्रेम धागा कच्चा सा
पिरोए मोती तो टूट जाए
बधे कलाई पर तो
अटूट विश्वास सा बंध जाए


Rinki


No comments:

Post a Comment

Thanks for visiting My Blog. Do Share your view and idea.

जो जीते हैं, वही-न-ख़ुद का दफ्तर है मुश्किल में कहीं का दफ्तर है-जौन एलिया

 पढ़ रहा हूँ मैं कागज़ों-बसूदा और नहीं और है का दफ्तर है कोई सोचे तो सोचे कैसे जीएँ सारा दफ्तर ग़मों का दफ्तर है हमसे कोई तो करे इशारा ...