जब मैं अपने अंतिम शब्द लिखूँगी…
तब रिश्तों को बेड़ियाँ,
प्रेम को पाखंड,
सुख को झूठ,
और दुख को साथी लिखूँगी।
परमेश्वर को धोखा,
पैसों को प्रेमी,
और अपनी तन्हाई को
अपना सच लिखूँगी।
जिन्होंने कहा था—
“तुम्हारे बिना जी नहीं पाएँगे,”
उन्हें अपनी कहानी का
एक अधूरा अध्याय लिखूँगी।
जिन्होंने मुझे बाँधकर
इसे प्रेम कहा था,
उनके हर वादे को
एक भ्रम लिखूँगी।
और अंत में,
न किसी से शिकायत होगी,
न किसी से कोई सवाल—
बस अपने नाम के आगे
एक आख़िरी शब्द लिखूँगी…
मुक्ति।
वाह्ह सुंदर अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
धन्यवाद
Deleteसुंदर रचना
ReplyDeleteआभार
धन्यवाद
Deleteप्रेम तभी तक पाखंड है जब तक भीतर प्रेम जगा ही नहीं, परमेश्वर तभी तक धोखा है जब तक उससे प्रेम हुआ ही नहीं
ReplyDeleteआप सौभाग्यशाली हैं, आपको हर चीज़ का सही अर्थ मिला… मेरे साथ ऐसा नहीं है।
Deleteवाह ! बहुत सुंदर सृजन !
ReplyDeleteधन्यवाद
ReplyDeleteजीवन ढूंढती रचना !
ReplyDeleteधन्यवाद
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