Tuesday, August 11, 2020

मेरे सपनो को जानने का हक रे----- Lyrics by Charul & Vinay

मेरे सपनो को जानने का हक रे

क्यों सदियों से टूट रही है

इनको सजने का नाम नहीं

मेरे हाथों को जानने का हक रे
क्यों बरसों से खली पड़ी हैं
इन्हें आज भी काम नहीं है

मेरी पैरों को यह जानने का हक रे
क्यों गाँव गाँव चलना पड़ा रे
क्यों बस की निशान नहीं

 मेरी भूख  को जानने का हक रे
क्यों गोदामों में सड़ते हैं दाने
मुझे मुट्ठी भर दाना नहीं

मेरी बूढी माँ को जानने का हक रे
क्यों गोली नहीं सुई दवाखाने
पट्टी टाकने का सामान नहीं

मेरे खेतों को यह जानने का हक रे
क्यों बाँध बने हैं बड़े बड़े
तो भी फसल में जान नहीं

मेरे जंगलों को यह जानने का हक रे
कहाँ डालियाँ वोह पत्ते टेल मिटटी
क्यों झरनों का नाम नहीं

मेरे नदियों को यह जानने का हक रे
क्यों ज़हर मिलाये कारखाने
जैसे नदियों में जान नहीं

मेरे गाँव को यह जानने का हक रे
क्यों बिजली न सड़क न पानी
खुली राशन की दुकान नहीं

मेरे वोटों को यहे जानने का हक रे
क्यों एक दिन बड़े बड़े वाडे
फीर पांच साल काम नहीं

मेरे राम को यह जानने का हक रे
रहमान को यह जानने का हक रे
क्यों खून बह रहे सड़कों में
क्या सब इन्सान नहीं

मरी ज़िन्दगी को यह जानने का हक रे
अब हक के बिना भी क्या जीना
यह जीने के समान नहीं

Monday, July 20, 2020

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख-दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख


आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख

अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह
यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ ,उन हाथों में तलवारें न देख

दिल को बहला ले इजाज़त है मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख

ये धुँधलका है नज़र का,तू महज़ मायूस है
रोज़नों को देख,दीवारों में दीवारें न देख

राख, कितनी राख है चारों तरफ़ बिखरी हुई
राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख

Tuesday, June 30, 2020

पतंग बिना डोर की


वो जो समझते है की ?
उनकी मन मर्जी चल रही है
वो जी रहे है हवा की तरह
ज़रा रुक कर देखे !

वो बस पतंग है
हवा पे सवार
डोर किसी और के पास
तू वही है
जो सोचता है अपने सपने में


अपने सपने में तू तितली
बन उड़ता है
वो तुझे पतंग समझ
उड़ाते है
भरा है तुझमे मांझा

किया धार -धार
काटे दुसरो के पतंग को
ये उनका सपना
तू बस है हथियार
तू वही है
जो सोचता है अपने सपने में


टूट जाना बचपन के सपनो का
बिना किसी शोर के
दफ़न हो गए सब
जरूरतो के कब्र में

रात में कभी मिलने आते है वो
धीरे से कहते है
या तो अपने सपने को जी
या सपने में ही जी

न काट बन पतंग
दूसरे के सपनो को
तू डाल अपना समर्पण
अपने सपनो में
तू वही है
जो सोचता है अपने सपने में


रिंकी



Saturday, June 20, 2020

टिमटिमाते सपने


अमन बार-बार गांधी सभागार भवन की तरफ देखे जा रहा है। वह इस बिल्डिंग को हमेशा ही देखता है, इतनी बड़ी बिल्डिंग वह भी गांधी मैदान के पास और कितना सुंदर भी है। दस साल के अमन के लिए उस बिल्डिंग में जाना किसी सपने से कम नहीं है। उसने कितनी ही बार कोशिश की वो अंदर जा सके पर गॉर्ड हमेशा भगा देता है , जैसे वो कोई कुत्ता हो।
कल का दिन तो बहुत खास है उसके लिए, वह अपनी मां के साथ बैठकर फल बेच रहा है, लेकिन उसका ध्यान आनेवाले कल में घूम रहा है। वो चाहता है की जल्दी से रात हो और कल आ जाए। मां ने ज़ोर से डांटा आज तेरा ध्यान किधर है ?  ज़ोर से  आवाज लगा देख कितनी ग्राहक जा रहे हैं।
अमन मन मरकर फल बेचने में लग जाता है। पर थोड़ी ही देर बाद फिर वह अपने सपनों में खो जाता है।

मां, जल्दी करो गाड़ी आती ही होगी मुझे लगता है तुम्हारी वजह से मुझे देर हो जाएगी। अभी बहुत देर है,अमन गाड़ी नौ बजे आएगी और अभी सिर्फ आठ बजे हैं।  तू तैयार होकर बैठ गया। ये तो बता किसलिए तुझे बुलाया है? आज का स्कूल नागा करेगा। जैसे ही कार्यक्रम खत्म हो जाए। ठेले पर आ जाना समझ गया। मैं सीधे ठेले पर ही आऊंगा ,पहले तुम मुझे जाने तो दे।

वहां पर बहुत सारे स्कूल के बच्चे और सरकारी आदमी भी आएंगे। मै आज तक किसी सरकारी आदमी से नहीं मिला हूँ ।मैं उनसे मिलकर पूछूंगा कि हमारे स्कूल में कुर्सी -टेबल क्यों नहीं है? ठीक है ठीक है जो पूछना है पूछ लेना। पर सीधे ठेले पर आना इधर -उधर भाग मत जाना।

अमन, गांधी सभागार के गेट के सामने खड़ा है वह रोज ही खड़ा रहता है लेकिन अंदर नहीं जा  पाता है पर आज की बात कुछ अलग ही है, उसे अंदर जाने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि वह बड़े दीदी- भैया के साथ आया है। बहुत बड़ा हॉल जो इतना बड़ा था जिसमें अमन की पूरी बस्ती समा जाए, इतनी बड़ी जगह उसने कभी नहीं देखी थी। हॉल में 500 से ज्यादा बच्चे हैं और सामने बहुत सारे बड़े लोग बैठे थे
अमन का ध्यान पीछे रखें नाश्ते की तरफ है, मन में चल रहा है की कि डब्बे में क्या -क्या होगा ?   उसका ध्यान बिल्कुल भी कार्यक्रम की तरफ नहीं है आज उसका सपना पूरा हो गया है,गांधी सभागार को अंदर से देखें और यह बिल्कुल परियों की कहानी की तरह है।
मंच पर खड़ा एक व्यक्ति ने बच्चों से सवाल किया आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं? एक बच्चा खड़ा हुआ और उसने कहा मैं डॉक्टर बनूंगा। दूसरे ने कहा मैं पुलिस बनूँगा, किसी ने टीचर कहा।

अमन खड़ा हुआ मंच की तरफ देखकर बोला, मैं बड़ा होकर बड़ा चोर बनूंगा ,क्योंकि मुझे लगता है बड़ी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे ही बड़े होकर पुलिस टीचर या अफ़्सर बनाते है।  मेरे  बस्ती के जो भैया है वो कहते हैं, बड़े लोगों को पढ़ने -लिखने दो वह पैसा कमाएंगे और हम उनका पैसा चुराएंगे। सब उसकी बात सुनकर हंसने लगे वह भी हंसने लगा और बैठ गया।

पिछले एक महीने से सभी बाजार बंद है।  मां बाहर फल बेचने नहीं जा सकती अगर जाती भी है, तो पुलिस वाले मना करते हैं, उसके पिता बहुत मुश्किल से दिल्ली से वापस आए हैं। उन्होंने बताया कि जो भी पैसा कमाया था दिल्ली से वापस आने में खर्च हो गया है। घर में बचे जमा पूंजी से ही परिवार चल रहा था। आज माँ के गहने बेचकर लाए पैसे से घर में खाने का सामान आया है। अब पहले जैसा खाना नहीं मिलता ,जो बनता है खाना पड़ता है। ज़िद्द करने पर डाँट पड़ती  है। 
अमन को बस इतना पता है कि कोई बीमारी फैली हुई है पर उसे आस -पास कोई बीमार नजर नहीं आता है।मां से उसने कई बार पूछा की स्कूल कब खुलेगा हम बाजार कब जाएंगे ? इन सभी सवालों का जवाब उसके माता-पिता नहीं देते हैं।

कुछ दिनों में, अमन ने नए सपने बुने है उन्ही में उलझा रहता है। वो एक बार फिर गांधी सभागार जाएगा और अपने नए सपने के बारे में सबको बताएगा। अब वह बड़ा होकर डॉक्टर बनना चाहता है क्योंकि उसने सुना है कि आजकल डॉक्टर भगवान बन गए हैं वह लोगों की जान बचा रहे हैं। उसके बड़े भैया ने बताया है।


Monday, June 15, 2020

रब की तलाश

पहला कदम था प्यार का , दिल में जागी एक चाहत , किसी का नाम मालूम न था , बस मन में थी तड़प-इबादत। फिर पास आने की आरज़ू जगी ,   याद म...