Monday, September 16, 2013

Three Bandar of Gandhi ji



गाँधी जी को स्वर्ग में रहते हुए बहुत अरसा हो गया है ये तो हम सब जानते है उनका परलोक सुखमय बीत रहा था एक दिन उन्हें अपने तीनो बंदरो की याद आई उन्होंने चित्रगुप्त से पूछा मेरे तीनो बन्दर कहा है?
चित्रगुप्त ने कहा देखिये आप ऐसे ही सोच में पड़े है मेरे पास समय नहीं है बहुत वर्क लोड है मैं अकेला सदियों से लेखा जोखा कर रहा हूँ आप आराम करे उनकी चिंता ना करे इतना सुनते ही गाँधी जी उठे और अनशन पर बैठ गए.
चित्रगुप्त ने सोचा ये आदमी लगता है मुझे भी यहाँ से निकलवाये गा इसके सवालो के जबाब दे कर वापस भेज देता हूँ
चित्रगुप्त ने गाँधी जी से कहा आप का पहेला बन्दर कानून बन गया है उसे अच्छा- बुरा दिखाई नहीं देता है
दूसरा बन्दर तो सरकार बन गया है किसी की सुनता ही नहीं और आप के तीसरे बन्दर ने तो कमाल कर दिया है वो तो प्रधानमंत्री बन गया है.

Sunday, September 8, 2013

मेरे शब्द रूठे है

कुछ लिख नहीं पाने की बेबसी
शब्द खो जाने की उलझन सी
भीतर के अरमान टूट  है
मेरे शब्द मुझसे रूठे है

ये मेरा जो सहारा था
मेरे शब्दों ने जिसे गरोंदे में ढला था
वो सब बिखर गए
पानी के धार में बह गए
अब सिर्फ मैं, एक खली पन्ना
नीली सियाही बची है
मेरे संग कल तक थी जो
मेरे मान का रंग थी जो

वो मेरी कविता मुझसे रूठी है
ये भी इंसानों की तरह झूठी है

अपनी ही बगिया में छाव को तरसता बागवान

स्वतंत्रता दिवस के उत्सव की छठा देखेने की लिए मैं अपने गाँव को चल पड़ा अपने बचपन की स्मृतियों को टटोलने लगा की कैसे १५ अगस्त से हफ्तों पहले से ही बच्चे आज़ादी की गीत गाना शुरु कर देते थे स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयरी शुरु हो जाया करती थी बच्चे बहुत उत्साहित रहते थे,बच्पन की मीठी यादो में खोया ही था की सामने गाँव के मुखिया जी दिख गए,बात दुया राम सलाम से शुरु हुई,वो बड़ी गंभीर मुद्रा में दिखाई दे रहे थे मैंने पूछा क्या बात है? “समाज का रंग –ढंग खराब होते जा रहा है मुझे इस का कोई हल समझ नहीं आता कहा कर वो चुप हो गए.उनकी बात तो मेरी समझ में आयी पर उसका मतलब समझ ने के लिए मैंने उनसे पूछा कुछ हुआ है क्या ? आज के दिन बहुत उदास दिखाई दे रहे है . उन्होंने कहा –अब क्या बताऊ आप को,अंग्रेज देश छोड़ गए पर अपने मन का कपट –छल यही छोड़ गए है पता नहीं क्या हो गया है आज़ादी का क्या मतलब किसी के साथ कुछ भी कर सकते है क्या? आज के बेटा-बहु बुजुग माँ-बाप को देखना ही नहीं चाहते,बेचारे दीवाकर जी आखिर कर जुर्म से तंग आकर दम तोड़ दिए. मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए खुद भी पास वाली कुर्सी पर बैठ गए,मैंने गंभीर होते हुए पूछा कौन है दिवाकर जी ? उन्होंने एक गहरी सी साँस लेकर कहा बड़े भले व्यक्ति थे शरीर से तंदरुस्त मिजाज़ से खुश साथ में मेहनती भी थे खेती बड़ी के साथ दुकान भी चलाते थे, बीवी का स्वर्गवास हुए अरसा हो गया था दोनों बेटे के सहारे जीवन चला रहे थे जब तक शारीर ने साथ दिया खेती की देखभाल किया उन्होंने उसके बाद बस दुकान में बैठने लगे, बड़ा लड़का और बहु स्कूल में टीचर है एक पोता भी है और छोटा दिल्ली में काम करता है पूरी तरह से संपन्न परिवार था एक दिन दिवाकर जी मेरे पास आये उदास मन से कहने लगे बेटे ने जीना मुश्किल कर दिया है रोज़ पैसे के लिए गली –गलोज करता है मेरे शारीर अब काम नहीं करता खान-पीना का भी ठिकाना नहीं क्या करू? मुखिया जी ने आगे की बात सुनाई- हमने उनसे कहा की ये तो हर घर की कहानी है अब आप का शारीर कमज़ोर हो गया है बेटे से लड़ाई करके क्या मिलेगा अब जैसा है आप को इसी के साथ रहना है तो थोड़ा सहन करना पड़ेगा इसके बाद दिवाकर जी चले गए .. ठीक दस दिन बाद दिवाकर जी रोते हुए हमारे पास आये आते ही बोले हमको मार पिट के हमारे हस्ताक्षर कराकर बैंक से पचास हज़ार रूपया निकल लिया है बेटा –बहु ने दोनों मिलकर हमको पीता है तुम ही फैसला करो मेरे बुढ़ापे का सहारा छीन लिया ....दिवाकर जी बात सुन कर मैं कुछ पंचो के साथ उनके घर गया पूछने पर बेटे ने कहा पिता जी पैसे नहीं दे रहे थे मुझे जरुरी काम था,ये अब रुपयों का क्या करेगे सब तो हम बच्चो का है पर मागने पर नहीं देते इसलिए ज़बरदस्ती करनी पड़ी. सबकी बात सुन कर हम पंचो ने निर्णय लिया की आगे से दीवाकर जी का परिवार उनकी देख-भाल सही ढंग से करेगा कोई शिकायत होने पर कारवाही होगी इसके बाद महीने दो महीने सब ठीक रहा एक दिन दोपहर के समय दिवाकर जी अधमरे हालत में मेरे घर आये और घर के बरांडे में आकर गिर पड़े मैंने पीनी पिलाकर उन्हें बैठाया.... उन्होंने आपबीती बताई की पिछले तीन दिनों से उनके बेटे ने उन्हें कमरे में बंद कर रखा है खाना,दवाई सब बंद कर दिया है आज दोनों काम पर गए है तो पोते को रूपये का लालच दे कर कमरे का दरवाज़ा खुलवाकर तुम्हारे पास आया हूँ मेरी मदद करो नहीं ये दोनों मुझे मार देंगे. मैंने उन्हें खाना खिलाया और मेरे घर पर ही रूक जाने को कहा साथ में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करने की सलाह भी दी पर उन्हें अपने पोते की फ़िकिर थी की बेटा उनको मरेगा इतना कहा कर वो घर चले गए ,उसी शाम मैं गाँव के लोगे के साथ उनके घर गया उनके बेटे से उनकी हालत के बारे में पूछने लगा तबही उनकी बहु गुस्से में वोली: ये हमारी घर की बेइज्जती करते फिरते है, हमारा खाना खाते है हमारी ही शिकायत करते है लगाओ दो हाथ बूढ़े को इतना सुनते ही उनके बेटे ने सब के सामने अपने बुजुग पिता पर हाथ उठा दिया मुझे से बर्दास्त नहीं हुआ मेरे साथ में आये लोगो में से एक ने चप्पल उठाकर दिवाकर जी के बेटे की पिटाई करनी शुरु कर दी मैंने किसी को नहीं रोका में चाहता था की उनकी बेटे –बहु को पता चले की गाँव-समाज दिवाकर जी के साथ है तभी उनकी बहु रोने लगी माफ़ी मागने लगी,दीवाकर जी का बेटा पुलिस स्टेशन जाने की धमकी देने लगा उसने कहा आप लोग मेरे घर में घुस कर मुझे बिना मतलब के मार रहे है,इसपर हमने कहा तुमने अपने पिता जी से साथ हिंसा की है उन्हें मारा-पीता है समाज के सीमा दोडी है तुम्हे सजा मिलनी चाहिए,आप लोग कौन होते है सजा देने वाले कानून है सजा देने की लिए आप लोग पंच के नाते मुझ पर जोर जबरजस्ती नहीं कर सकते पंच किसी पर हाथ नहीं उठा सकते. हमने दिवाकर जी को अपने साथ पुलिस स्टेशन चल कर बेटे –बहु के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने को कहा वो तैयार होगये पर बहु के माफ़ी मागने पर वो रूक गए, बेटे-बहु ने उनका ठीक से देखभाल करने का वादा किया और हम सब वहा से चले आये उस घटना के बाद से एक डेढ़ महीने सब ठीक रहा पर आखिर के दस दिन से तबियत बहुत ख़राब रहती थी पडोसी बताते है की खाना-पानी,दवाई के बिना उनकी ये हालत हुई थी. अगर मुझे कोई पूछे तो मुझे लगता है दिवाकर जी ने उसी दिन से देह त्याग दिया जिस दिन उनके बेटे ने उनपर हाथ उठाया था एक बुजुग बाप अपनी दुर्दशा से तंग आ गया था. मुखिया जी की बात सुन कर हम सब चुपचाप शुन्य की का ख़ामोशी से एक दूसरें दो देख रहे थे सभी को पता था गाँव में कोई –कोई बुगुर्ग अपने बच्चो की ऐसी ही शिकायत लिए अक्सर आते रहते है और इस समस्या का कोई समाधान नज़र नहीं आया रहा है

Wednesday, August 21, 2013

Uttrakhand Flood-देव्याः आपदा या इन्सान का प्रकृति पर अत्याचार


उत्तराखंड देव भूमि के नाम से विख्यात है चार धाम,अति प्राचीन धार्मिक स्थल एवम् अतुलनीय प्राकृतिक सौंदर्य इस राज्य की पहचान है जैसे –जैसे हम पहाड़ो sकी ऊचाई पर पहुचते है खूबसूरती का दायरा बढ़ता जाता है भूस्खलन,अधिक बारिश यहाँ के लिए समान्य बात है लेकिन इस बार आयी त्रासदी ने पुरे राज्य को हाशिए पर ला कर खड़ा कर दिया है,आपदा के  लगभग दो  महीने के बाद भी पीड़ितो तक राहत सामग्री पहुचना आसान नहीं है,लगातार हो रही बारिश और भूस्खलन ने सुदूर बसे गाँव तक पहुचना मुश्किल कर दिया है.केदारनाथ में हुई तबाही का पैमाना बहुत व्यापक था जान –माल की हानि का सही –सही अनुमान लगाना नामुमकिन है इससी के साथ उत्तराखण्ड के अन्य जिला जैसे  उत्तरकाशी,चमोली,तेहरी,  और पिथोरागढ़ में भी  नुकसान बहुत हुआ है.
सरकार ने सेना की मदद से केदारनाथ से तीर्थयात्री और ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दिया लेकिन अन्य आपदा ग्रस्त क्षेत्र जैसे बद्रीनाथ,पन्दुकेश्वर,गोविन्दघाट और लम्बागढ़ गाँव में बाढ़ ने नदी किनारे बसे होटल और घरो को ताश के पत्तो की तरह अपने साथ बहा दिया इन होटल और लॉज में रुके तीर्थयात्री कुल संख्या किसी को नहीं पता.गाँव के लोग बताते है की रात के दो बजे वो अपनी जान बचा के अपने घरो को छोड़ कर ऊपर पहाड़ो की तरफ भागे पर होटल में रुके कुछ यात्री इससे पहले संभल पाते नदी उन्हें अपने साथ बहा ले गई.
सरकार अपने स्तर पर कोशिश कर रही है बचाव का कार्य व्यापक रूप से किया गया है पर राहत समाग्री उन्ही गाँव तक पहुच पा रही है जहां तक सड़क साथ देती है,उसके बाद लोगो को सामान अपने पीठ पर बांध अपनी जान को खतरे में डाल कर पहाड़ी के रास्ते आपने घर तक जाना पड़ता है.
हर अख़बार और न्यूज़ चैनल में प्रकृति को ही  तबाही का ज़िम्मेदार ठहरया जा रहा है,नदी ने तबाही मचाई
असमान से आफत आयी लेकिन स्थानीय लोगो की सुने तो कहानी कुछ और ही समझ आती है उनके अनुसार
पहाड़ो ने बहुत समय से बहुत सहन करने के बाद संतुलन का रास्ता अपनाया.विकास के लिए बनाएं जा रहे हजारो जलविधुत परियोजनाओं ने नदियों के मार्ग में दीवार बना कर मानवी आपदा की तरफ़ कदम बढ़ा दिया था  साथ ही पर्यटन को विकसित करने के लिए पहाड़ो को काटकर लॉज,होटल और रास्ते बनाएं जा रहे है जिसके परिणाम स्वरुप पहाड़ो को व्यापक तौर से नुकसान पहुच रहा है.हिमालय की त्रासदी की जिमेदारी प्रकृति नहीं बल्कि पूरी तरह हम इंसानों द्वारा अपनों नदियों और जंगलो का बिना सोचा समझा किया गया दोहन है.एक रिपोर्ट के अनुसार केदारनाथ में हुए तबाही की चेतावनी २००४ में ही एक भू-विज्ञान संस्थान ने दे दी थी साथ में यह सुझाव दिया गया था की  केदारनाथ के पीछे बने झील और ग्लेशियर का लगातार निगरानी और रखरखाव नहीं हुआ तो बड़ी त्रासदी की सम्भवना है  पर सरकार ने इस रिपोर्ट की कोई ध्यान नहीं दिया  जिसका परिणाम  १६-१७ जून २०१३ को एक बड़ी तबाही के रूप में सब के सामने है.

विकास की होड़ ने विनाश का रूप ले लिया पर्वत में रास्ता बनाने के लिए बिस्फोटक का इस्तमाल किया जाता है जिससे ना केवल पहाड़ का एक हिस्सा टूटता है बल्क़ि पुरे पर्वत की नीव को कमजोर कर देता है, लगातार बर्षा कमज़ोर हिस्से भूस्खलन के रूप में गिर जाते है. उत्तरखंड में लगभग कई छोटे बड़े विधुत केंद्र का निर्माण चल रहा है इनके उतर्गत नदियों की दिशा को बदला जा रहा है पहाड़ो में सुरंग बना कर उन्हें भीतर से खोखला किया जा रहा है  बात केवल पहाड़ो के साथ हो रहे छेड़-छाड़ तक सिमित नहीं है.ग्लोबल वार्मिंग का असर भी आसानी से देखा जा सकता है पहाड़ो में गर्मी से पड़े दरार, ग्लेशियर के पिघलने के दर में तेज़ी  और सर्दियों के मोसम का अपेक्षाकृत छोटा होना गंभीरता से सोचने वाले मुद्दा है.क्यूंकि हिमालय से ही हमारे देश की मुख्य नदिया निकलती है यदि ये नदिया समय से पहले सुख जाये तो देश में पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है हिमालय जिसे नाजुक परिस्तिथि क्षेत्र के लिए स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर विकास की रूप रेखा तैयार करने की आवश्यकता है.
 

Tuesday, June 25, 2013

दास्ताँ है ज़िन्दगी की

रोज़ सुबह जग कर
संकल्प नया करना
दिन- भर भगना दौड़ना
सपनो का पीछा करना
की गई कोशिशों पर पछताना
अपनी नाकामी का ज़िम्मेदार
दूसरो को ठहराना
ये ही दास्ताँ है ज़िन्दगी की
रोज़  नए अरमान है ज़िन्दगी की

रब की तलाश

पहला कदम था प्यार का , दिल में जागी एक चाहत , किसी का नाम मालूम न था , बस मन में थी तड़प-इबादत। फिर पास आने की आरज़ू जगी ,   याद म...